Sunday, 15 February 2015

इंसान है ही सेवा के लिए

आलेख ( 15 फरवरी 2015 के लिए)
इंसान है ही सेवा के लिए
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

संसार भर में हर तरफ अभावग्रस्तों की कोई कमी नहीं है। हर कोई इंसान किसी न किसी रूप में अभावग्रस्त होता ही है। कोई किसी एक सुख या सुविधा में सम्पन्न होता है तो दूसरी किसी सुविधा में विपन्नता का अभिशाप भोगता है।
कोई भी इंसान ऎसा देखने में नहीं मिल सकता जो हर दृष्टि से सुखी और समृद्ध हो तथा जिसे किसी भी प्रकार के व्यक्ति, विषय या वस्तु की कोई इच्छा या अपेक्षा न हो।
संसार की यही नियति है। हर कोई एक मामले में समृद्ध है और दूसरों में विपन्न।  हर दृष्टि से पूर्णतया सम्पन्न इंसान कोई हो ही नहीं सकता। हाँ, संसार से दूर रहने वाले वीतरागी, संन्यासी और परमहंसों को अपवाद माना जा सकता है।
आम सांसारिक इंसान के लिए यह संभव है ही नहीं कि वह पूर्णतया स्वस्थ, मस्त और आनंदमग्न हो। हम सभी लोग आधे-अधूरे माने जा सकते हैं और यही कारण है कि हमें कोई सा सुकून पाने के लिए किसी न किसी की तलाश हर क्षण बनी रहती है, चाहे फिर वह व्यक्ति, विषय या वस्तु हो अथवा कोई सा संयोग-वियोग।
यही स्थिति हर मामले में शाश्वत रूप से लागू रहती ही है। इंसान मरते दम तक अपने अभावों या कमियों को पूर्ण करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। इंसान की इस कमी को पूरी करने के लिए भगवान ने सजातीय आकर्षण का विधान भी बनाए रखा है जहाँ हर समान विचार और व्यवहार अपनी तरह के दूसरे वैचारिक धरातल की भावभूमि पाकर अदृश्य तरंगों का तंतु संबंध स्थापित कर ही लिया करता है और यहीं से शुरू हो जाती है अभावों और अधूरेपन के समाप्त होने की प्रक्रिया।
दुनिया भर में अपनी ही तरह के विचारों, कृत्यों, हलचलों, हरकतों, वृत्तियों और भावनाओं वाले लोगों की तलाश कोई असाध्य नहीं है, सिर्फ मानसिकता के धरातल पर जाकर संकल्प अभिव्यक्त करने की जरूरत होती है। फिर वैचारिक तरंगों का ऎसा सेतु अपने आप बन जाया करता है कि संकल्पों के पाश से आबद्ध होकर इंसान एक-दूसरे के करीब खींचे चले आते हैं और इस प्रकार भगवान अभावों व इच्छाओं को पूर्ण करता हुआ मनुष्यों को आनंद की प्राप्ति कराता है। 
वस्तुतः हर इंसान का यह प्राथमिक कत्र्तव्य है कि संसार में अपने कत्र्तव्य कर्म करते रहकर हमेशा इस बात का प्रयास करे कि समाज, क्षेत्र और देश में जहाँ जो कोई जिस किसी अभाव से त्रस्त है उसके अभाव को दूर करने में हरसंभव मदद करे, भागीदारी निभाए और सम्बल प्रदान करे।
यही सच्ची सेवा, परोपकार और पुण्य कार्य है जिससे भगवान जल्दी प्रसन्न होते हैं और आनंददायी जीवन के लिए आशीर्वाद की वृष्टि करते रहते हैं। किसी के जीवन से अभावों को दूर करना, सेवाओं और सुविधाओं का स्वस्थ और भरपूर माहौल उपलब्ध कराकर सुकून प्रदान करने से बढ़कर वर्तमान युग में आत्मतुष्टि और भगवत्प्राप्ति का कोई और माध्यम हो ही नहीं सकता।
यह सब निर्भर करता है हमारी उदारता, जनोन्मुखी सहृदयता और मानवीय संवेदनाओं से। हालांकि सेवा, सुविधा और परोपकार का यह मार्ग सहज और सरल नहीं कहा जा सकता, तथापि हमारी दिली भावनाओं, लोक कल्याण और दूसरों को सुख प्रदान करने के महान लक्ष्य को डिगाने में चाहे कितने अवरोध आएं, उनके प्रति बेपरवाह रहने का साहस बनाए रखें।  सारी चुनौतियों के बावजूद अपने सेवा-परोपकार भरे कर्मों में लगे रहने के लिए भगवान की ओर से हरसंभव अदृश्य मदद अपने आप मिलती रहती है।
जो लोग दूसरों के अभावों को दूर करने, सेवा और परोपकार करने के पथिक हैं, उन्हें हमेशा ईश्वर मदद करता ही है। इसलिए औरों के अभावों को दूर करने के प्रयासों को ईश्वरीय कार्य मानकर करते रहना चाहिए।

संसार में वे ही लोग धन्य हैं जो औरों के अभावों को जानकर अपनी ओर से भरपूर मदद करते हैं और अभावों से मुक्ति दिलाने का इतिहास रचते हैं। ईश्वर इन सेवाभावी और सुविधादाताओं का पूरा ख्याल रखता है और इन्हें समय-समय पर महा आनंद का अनुभव भी कराता रहता है। 

Saturday, 14 February 2015

हर क्षण बरसता रहे प्यार ही प्यार

आलेख ( 14 फरवरी 2015 के लिए)
हर क्षण बरसता रहे
प्यार ही प्यार
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

आज 14 फरवरी है। वेलेंटाईन डे के नाम से दुनिया भर में धूम है। अपने यहाँ भी।  पाश्चात्यों में प्रकृति के परिवर्तन से लेकर जीवन का हर कर्म और भावनाएं, रिश्ते-नाते और व्यवहार के लिए कोई न कोई दिन निश्चित किया गया है जहाँ पूरे साल भर की उन संबंधों से भरी भावनाओं और विषयों का घनीभूत स्वरूप किसी ज्वार की तरह पसर जाता है, धूमधड़ाके के साथ दिन और रात गुजार लिये जाते हैं, फिर अगले दिन से साल भर के लिए उसे याद करने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।
वहाँ संबंधों की बुनियाद दिल से कहीं अधिक दिमाग और अपनी अनुकूलताओं से जुड़ी है, संबंधों का व्यवसायिक धरातल है जो सम सामयिक हलचलों के सिवा आगे की कभी नहीं सोचता।  संवेदनाओं का जुड़ाव एक निश्चित समयावधि के दायरे में बंधा हुआ है जहां अवसर आने पर सभी प्रकार इज़हार हो जाता है, फिर उसका कोई चिह्न बाद में ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलता।
आजकल सभी स्थानों पर दो तरह की धाराएं चल रही हैं। भोगवादी पाश्चात्य मनोवृत्तियां शरीर को प्रधान मानकर चल रही हैं और उनकी सोच शरीर के आनंद के साथ ही समाप्त हो जाती हैं। भारतीय मनीषा में आत्मा के संबंधों को तवज्जो दी जाती है जहाँ शरीर और उससे जुड़े तमाम सुख माध्यम हो सकते हैं, लक्ष्य कभी नहीं।
दोनों प्रकार के संघर्ष में खूब सारे लोग अपने-अपने मतलब और स्वार्थों तथा आनंद की प्राप्ति के लिए मनमर्जी से सभी को स्वीकार कर लिया करते हैं। एक धारा पाश्चात्यों के करीब हैं जबकि दूसरी धारा भारतीय संस्कृति की जड़ों से संतृप्त होकर बहती रही है।
वेलेंटाईन डे का सीधा संबंध प्रेम और इसके भावपूर्ण इज़हार से है जहां दो ध्रुव परस्पर मिलकर एक-दूसरे के प्रति सुदीर्घ प्रेम की अभिव्यक्त करते हैं और इस पर सार्वजनीन या वैयक्तिक मोहर लगने लगती है। 
साल भर में बहुत सारे डे आते हैें जो वैश्विक माहौल में अपने आपको जिंदा रखे हुए हैं। इन्हीं मेंं वेलेन्टाईन डे भी है जिसके प्रति उन सभी लोगों की श्रद्धा है जिनका विश्वास प्रेम में रहा है अथवा पाना चाहते हैं। बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो इस दिन को अपने हक में भुनाने भर के लिए माहौल के साथ खड़े हो जाते हैं।
खूब सारे ऎसे हैं जो प्रेम में विफलता या धोखा खा जाने के कारण इसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। और बहुत से ऎसे हैं जो भारतीय संस्कृति और परंपराओं का मर्म समझते हैं और इन्हें पता है कि भोगवादी पाश्चात्यों का कुप्रभाव कितना आत्मघाती है। इसलिए वे विरोध करते हैं।
वेलेंटाईन डे का समर्थन या विरोध जिन्हें करना है वे करते रहें। यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न इस बात का है कि प्रेम या इसका इज़हार सिर्फ एक दिन की बात ही क्यों रहे, यह एक दिन तक सिमटा क्यों रहे। एक दिन की आयु पाने वाला वेलेंटाईन डे साल  भर तक प्रेम की सुगंध को कैसे बरकरार रख सकता है जबकि प्रेम तत्व हर क्षण से जुड़ा हुआ होना चाहिए। इसे किसी दिन या घण्टों में बांधना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
सृष्टि में प्रेम तत्व हर पल पूरे वेेग के साथ बहता रहना चाहिए। यह प्रेम किसी दैहिक संबंधों का नाम नहीं है बल्कि  हमारी आत्मा से जुड़ा प्रत्येक तत्व, व्यक्ति, विषय और स्थान प्रेम धाराओं से सिक्त होना चाहिए। पर साल भर हम प्रेम न दे पाते हैं, न ले पाते हैं।
हम जिसे प्रेम कहते हैं वस्तुतः वह दैहिक संबंधों, लाईफ मैनेजमेंट के फण्डों या कि नफे-नुकसान के संबंधों का पर्याय होकर रह गया है जहाँ हमारा प्रेम तभी तक बरकरार रहता है जब तक हमारा कोई न कोई मकसद या स्वार्थ पूरा नहीं हो जाता। फिर इसके लिए वेलेंटाईन डे जैसे मौके अभिव्यक्ति को परिपुष्ट करने का अवसर प्रदान करते हैं। 
हर संबंध प्रेम से भरा होना चाहिए तभी इसमें ताजगी और सुगंध बनी रह सकती है।  एक दिन पर््रेम का इजहार कर दिया जाए, और साल भर तक हमारे दिलों में प्रेम की ज्योत की बजाय स्वार्थ और लाभ-हानि के समीकरणों का गणित चलता रहे, इसे प्रेम नहीं कहा जा सकता। फिर प्रेम अपने आपके परिपूर्ण है। किसी एक से प्रेम होने का अर्थ उसी से प्रेम नहीं होता बल्कि जो लोग सच्चे अर्थों में प्रेम करते हैं वे सृष्टि के हर प्राणी, स्थान और परिवेश से प्रेम करने वाले होते हैं। यदि ऎसा है तभी प्रेम वास्तविक है, अन्यथा हम किसी एक से प्रेम करें और दूसरों से नफरत करने लगें, औरों के प्रति उदासीन और प्रतिशोधात्मक रवैये का परिचय दें, उसे प्रे्रम की संज्ञा नहीं दी सकती। वहाँ सिर्फ दैहिक भोग और किसी न किसी प्राप्ति का छिपा हुआ एजेण्डा ही होता है।
इस प्रकार का प्रेम अपने आपमें कृत्रिम और दोहरे चरित्र का आभास कराता है और ऎसा प्रे्रम समय पाकर मुरझा जाता है। पर््रेम सिर्फ एक दिन का विषय नहीं है।  जीवन का हर क्षण प्रेम से सराबोर होना चाहिए। प्रेम सिर्फ प्रेमी-पर््रेमिका के संबंधों तक ही सीमित नहीं है बल्कि हमारे माता-पिता, भाई-बहन, गुरु, शिष्य और हमारे साथ काम करने वाले सहकर्मियों से लेकर उन सभी के प्रति होना चाहिए जिनके साथ हम रहते हैं, जिनसे हमारा व्यवहार है।
जिस इंसान के भीतर जितना अधिक प्रेम तत्व होता है वह उतना ही अधिक संवेदनशील, उदार और मस्त होता है। पिण्ड से जो सच्चा प्रेम करता है वह समूचे ब्रह्माण्ड से पर््रेम करने वाला होता है। प्रेम सभी को मुक्त करता है, बांधता कभी नहीं। जो प्रेम आदमी को बांधकर कुछ देहों तक सीमित कर दे, वह पर््रेम न होकर वासना है और जो लोग ऎसा करते हैं वे जीवन में भले ही प्रेम की कैसी भी महानतम व्याख्या क्यों न कर डालें, कितने ही कुछ व्याख्यान क्यों न दे डालें, कितना ही कुछ लिख क्यों न डालेंं, वे पर््रेम की एबीसीडी भी नहीं जान सकते हैं और पर््रेम के अनुभवों से वंचित रहते हुए ही अन्ततोगत्वा सिधार जाते हैं। 

कर्म, व्यवहार और जीवन निर्माण की धाराओं को इस प्रकार बनाएं कि पर््रेम या प्रेम का इजहार करने के लिए साल भर में एक बार किसी वेलेंटाईन डे की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़े बल्कि हर दिन वेलेंटाईन डे हो, हर दिन मोहब्बत का पैगाम देने वाला हो और प्यार बाँटने वाला भी। 

Friday, 13 February 2015

छोड़ें काजल की कोठरियाँ

आलेख (13 फरवरी 2015 के लिए)
छोड़ें काजल की कोठरियाँ
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
इंसान का जीवन सकारात्मक और श्रेष्ठ कर्मों के लिए हुआ है और ऎसे में हम सभी का परम ध्येय समष्टि और व्यष्टि सभी के लिए उपादेयता भरे और लोकमंगलकारी रचनात्मक गतिविधियाँ ही हैं जिनके लिए जीवन भर कुछ न कुछ ऎसे प्रयास करते रहना चाहिए कि अपनी सर्जनात्मक शक्ति और प्रगतिकारी ऊर्जा का प्रवाह भी बना रहे और समाज, क्षेत्र तथा देश के हित में ऎसा कुछ हमेशा होता रहे जो उल्लेखनीय भी हो और उपयोगी भी। इस दृष्टि से वैयक्तिक प्रतिभाओं और बहुआयामी हुनर का इस्तेमाल समुदाय के लिए होना जरूरी है।
सकारात्मक चिंतन और निरन्तर वैकासिक प्रवाह में स्थान विशेष का अपना महत्त्व होता है। कुछ स्थान सदियों और युगों से अभिशप्त रहे होते हैं जबकि कई सारे क्षेत्र ऎसे भी होते हैं जहाँ नकारात्मक चिन्तन की भावभूमि जर्रे-जर्रे में विद्यमान रहती है और इस दृष्टि से उन स्थान विशेष व क्षेत्रों में रचनात्मकता का प्रवाह बना पाता संभव नहीं हो पाता है चाहे लाख कोशिशें की जाएं।
इसका यह अर्थ कदापि नहीं लिया जाना चाहिए कि हममें क्षमताओं और ऊर्जाओं का किसी भी प्रकार से कोई अभाव है। भरपूर सामथ्र्य होने के बावजूद कई सारे स्थान विशेष ऎसे ही होते हैं जहाँ न आदमी की प्रतिभाओं का कोई मूल्य होता है न ईमानदारी से किए जाने वाले किसी भी लोक कल्याणकारी या सामुदायिक विकास की गतिविधियों का।
इसके पीछे किसी को न तो नासमझ कहा जा सकता है, न अज्ञानी। दोष भूमि विशेष का होता है। जहाँ की भूमि अर्वाचीन काल से किसी न किसी प्रकार से शापित होती है, वहाँ अक्सर काम में मन नहीं लगने, अरुचि होने तथा मन-मस्तिष्क एवं शरीर में मलीनता का प्रवेश हो जाना स्वाभाविक ही है क्योंकि क्षेत्र विशेष की आबोहवा, पानी, अन्न आदि का सीधा प्रभाव दिल और दिमाग पर पड़ता ही है।
इस कुप्रभाव का परिणाम यह होता है कि सामने वालों को न इंसान में प्रतिभा नज़र आती है, न ईमानदारी से किया जाने वाला कोई सा कर्मयोग। फिर मलीन मन-मस्तिष्क वाले लोगों को किसी भी इंसान में अच्छाई कभी भी नज़र नहीं आ सकती क्योंकि उनकी सभी ज्ञानेन्दि्रयों पर मैले चश्मे चढ़े होते हैं, दिमाग में प्रदूषण भरा होता है तथा आभामण्डल नकारात्मक व अभिशप्त आबोहवा से रह-रहकर टकराता हुआ अपनी अस्मिता खो बैठता है।
यही कारण है कि दुनिया भर में आदर, सम्मान और श्रद्धा पाने वाले कर्मयोगी भी किसी अभिशप्त धरा पर आकर या तो उदासीन हो जाते हैं अथवा उनकी कोई कद्र नहीं हो पाती। फिर अभिशप्त स्थानों पर पहले से रहने वाले लोगों का संसर्ग पाकर बिगड़ जाने के खतरे भी हमेशा बने रहते हैं।
दुनिया में खूब सारे क्षेत्र किसी न किसी वजह से वैदिक और पौराणिक काल में अभिशप्त रहे हैं और इनके बारे में पुराणों और लोकगाथाओं में भरपूर जिक्र भी आता है।
इस स्थिति में किसी भी व्यक्ति को बुरा नहीं ठकराया जा सकता क्योंकि जो लोग श्रेष्ठ होते हैं उनका अपना शुभ्र इतिहास होता है जो उनके साथ चलता है। यों कहें कि उनके आगमन से पूर्व उनकी सुगंध आने लगती है।
ऎसे लोगों के भी अभिशप्त स्थलों में आ जाने में बाद व्यवहार और कर्म में परिवर्तन आ जाए तो उसके दो ही कारण होते हैं। या तो संगी साथियों का कुसंग अथवा उस भूमि विशेष के अन्न-जल का दुष्प्रभाव।
हममें से खूब सारे लोग जीवन में अक्सर ऎसा अनुभव करते ही रहते हैं। इसका यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि हम हमारे व्यक्तित्व, कर्म, व्यवहार या सिद्धान्तों के साथ कोई समझौता करने लग गए हैं। बल्कि स्थानिक प्रभाव ही कहा जाना चाहिए।
इस स्थिति में कोई भी क्षेत्र कितना ही समृद्ध क्यों न हो, उसे सायास त्याग देने में ही भला होता है। कभी भी अभिशप्त क्षेत्रों और शापित लोगों को सुधारने की गलती नहीं की जानी चाहिए। यह अपने आप में हमारी ऊर्जाओं और शक्तियों का सीधा क्षरण और समय की बरबादी ही है, इसका कोई प्रभाव सामने नहीं आने वाला।
  भारतीय परंपरा में इसीलिए स्पष्ट कहा गया है कि जहाँ जिस किसी क्षेत्र में अभिशाप हो, शापितों का निवास हो, सुकून का अभाव हो, उसे त्याग देने में ही भला है। इससे हम स्थान विशेष के अभिशाप से भी बचे रह सकते हैं और उन लोगों से भी दूर हो जाते हैं जो लोग शापित होने की वजह से मलीन मन और नकारात्मक चिंतन भरे दिमाग को ढोते हुए दिन काट रहे हैं।
व्यक्ति और स्थान के बीच यह संघर्ष सदियों से चला आ रहा है। कई बार भूमि भी अपनी ओर खिंचती है तथा भाग्य का फलन करती है। इसी प्रकार भाग्य और कर्म का संघर्ष भी निरन्तर बना रहता है।  लेकिन इन सभी  मिथकों के बीच यह तो निश्चित ही माना जाना चाहिए कि अपनी शुचिता के बरकरार रहते हुए, निरपेक्षता को अपनाए रखने  और निरन्तर कर्मयोग को अंगीकार करने के बावजूद यदि कहीं सुकून का अभाव रहता है तो इसका सीधा सा अर्थ यही निकाला जाना चाहिए कि यह उस स्थान विशेष की भूमि का दोष है जो किसी न किसी वजह से अभिशप्त है और यह उन लोगों के लिए ही अनुकूल है जो स्वयं भी किसी न किसी ग्रह-नक्षत्र या पूर्वजन्म के शाप के कारण वहाँ बने हुए हैं।
अभिशप्त स्थान अपने आप में काजल की कोठरियों से कम नहीं हैं जहाँ विघ्नसंतोषियों की भरमार रहती है, नकारात्मक चिंतन और एक-दूसरे की पीठ में छुरा भौंकने, किसी न किसी प्रकार से लोगों का नुकसान करने और चोट पहुँचाने की भावनाएं हावी होती हैं।
यह स्थितियां इस बात को स्पष्ट करती हैं कि धरा का पुरातन अभिशाप अभी बरकरार है। तरक्की या आत्म आनंद चाहें तो इन अभिशप्त स्थानों को तन-मन से त्याग दें। इसे न दीनता या पलायन की बजाय विवेक कहा जाना ज्यादा उपयुक्त है। ऎसा करने मात्र से हमारी जिन्दगी में आया ठहराव समाप्त हो जाता है और तरक्की की गति तीव्रतर होने लगती है।

यह ऎसा सत्य है जिसे अपना लेने पर जीवन के सारे सुकून अपनी ओर आकर्षित होने लगते हैं और जीने का महा आनंद हमेशा बना रहकर यश, कीर्ति और ऎश्वर्य प्रदान करने लगता है।

Wednesday, 11 February 2015

समझें नियति के संकेत

आलेख ( 11 फरवरी 2015 के लिए)
समझें नियति के संकेत
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक की कोई सी गतिविधि हो, घटित होने से पहले प्रकृति कम से कम तीन बार उसका सांकेतिक अहसास किसी न किसी प्रकार से हमें कराती ही है और संभलने का वक्त देती ही है, इसके बाद ही परिवर्तन की शुरूआत होती है।
प्रकृति या विधाता कोई सी अच्छी-बुरी घटना हो, इसे अपने पर नहीं लेते बल्कि उसके लिए उन्हें ही जिम्मेदार मानने का अवसर प्रदान करते हैं जिनसे यह परिवर्तन संबंधित होता है।
प्रकृति में होने वाले मौसमी परिवर्तन हों चाहे किसी भी प्रकार के हों। कोई से भौगोलिक, स्वाभाविक या अस्वाभाविक, सामान्य या असाधारण परिवर्तन हों।
हर मामले में घटना-दुर्घटना या परिवर्तन से पहले आभास हो ही जाता है। यह अलग बात है कि हम उसका अहसास नहीं कर पाते अथवा संकेतों को समझ पाने का माद्दा पैदा नहीं कर पाते।
आमतौर पर होता यह है कि हम संकेतों की अवहेलना कर दिया करते हैं और आभासों के प्रति उपेक्षा का भाव दर्शाते हुए उदासीन बने रहते हैं।  इसके बाद प्रकृति या विधाता का कोई दोष नहीं होता, वे अपना काम नियत समय पर कर ही डालते हैं और यह काम ऎसा है जो कि किसी भी प्रकार से टलने वाला नहीं है, अवश्यंभावी ही है।
कई बार यह संकेत कभी स्वप्न के रूप में सामने आते हैं, कभी शगुन के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। इसी प्रकार मन, मस्तिष्क और शरीर के धरातल पर भी ये संकेत किसी न किसी रूप में सामने आते ही हैं।
हममें से अधिकतर लोग इन संकेतों को समझने की या तो कोशिश ही नहीं करते अथवा अनसुना कर दिया करते हैं। कई बार जब  पितर या ईश्वरीय शक्तियाँ हम पर  किसी वजह से अधिक मेहरबान होती हैं तब  वे बार-बार किसी न किसी उपाय से हमें सतर्क करती हैं अथवा स्पष्ट संकेत देने का प्रयास करती हैं।
इसके बावजूद हम न समझ पाएं तो इसका सीधा सा अर्थ यही है कि जो होने वाला है वह हमारे प्रबल भाग्य की निशानी है और इसी वजह से हम संकेतों को समझ पाने का विवेक हमारे भीतर पैदा नहीं कर पाए हैं।
जीवन की खूब सारी घटनाएं और दुर्घटनाएं ऎसी होती हैं जो घटित तो हो सकती हैं मगर अपने ज्ञान और विवेक से इनका समय पर निराकरण किया जा सकता है। इस दृष्टि से विधाता का विधान कुछ लचीला ही होता है।  जो होना होता है वह होकर ही रहता है लेकिन अपनी बुद्धि और विवेक से हम अच्छे प्रभाव के घनत्व में अभिवृद्धि कर सकते हैं और बुरे प्रभाव के अनिष्ट को कम जरूर किया जा सकता है।
इस लिहाज से संकेतों का महत्त्व स्वयंसिद्ध है। भविष्य को जानने की जिज्ञासा और ज्योतिषीय या आध्यात्मिक उपायों को इसीलिए लोक जीवन में युगों-युगों से अहम स्थान प्राप्त है। इससे भावी को अपने अनुकूल बनाने के उपायों को अमल में लाया जा सकता है या इसके लिए समय से पूर्व अपने आपको तैयार किया जा सकता है।
कोई प्राणी ऎसा नहीं होता जिस तक इन संकेतों की प्राप्ति नहीं होती है। दूसरे प्राणियों के पास इन संकेतों के अनुरूप कुछ करने या न करने के लिए कोई अवसर नहीं होता लेकिन मनुष्य को भगवान ने बुद्धि दी है और वह इसका भरपूर उपयोग करने के लिए स्वतंत्र भी है।
अब हम कोई ध्यान ही न दें, हर संकेत की उपेक्षा करते रहें, तो इसके लिए किसी के पास कोई चारा नहीं है। कोई इंसान यह नहीं कह सकता कि उस तक किसी प्रकार के संकेत नहीं पहुंचे अथवा पूर्वाभास नहीं हो पाया।  
बात पूर्वाभास या संकेतों की ही क्यों करें, जिन विषयों और वस्तुओं को इंसान की जिन्दगी के लिए वज्र्य या हीन कहा गया है उसे भी हम सहर्ष स्वीकारते हैं और आनंद पाते हैं जबकि यह किसी भी प्रकार से हमारे जीवन के लिए उपयोग नहीं कहे जा सकते।
सब कुछ ज्ञान होते हुए भी हम इन बुराइयों को स्वीकार कर ही रहे हैं। यह हमारी अज्ञानता और विवेकहीनता ही कही जा सकती है। जो दृश्यमान और अनुभवातीत है उसी की हम उपेक्षा करने लगते हैं फिर उन विषयों के बारे में चर्चाएं फिजूल ही हैं जिन्हें हम संकेत मानते हैं।
हर संकेत हमारे जीवन के लिए प्रेरणादायी और सकारात्मक परिवर्तन लाने वाला होता है। हमें चाहिए कि जो भी परा संकेत हैं उन पर ध्यान दें तथा उसी के अनुरूप जीवनयात्रा में बदलाव लाने के लिए हमेशा सचेष्ट रहें।
किसी भी संकेत की किसी भी स्तर पर अवहेलना न करें क्योंकि जो संकेत आज हमारी कल्पनाओं में सूक्ष्म रूप में हैं वे किसी न किसी दिन निश्चित रूप से स्थूल रूप में आकार प्राप्त करने वाले हैं ही।

हर संकेत आने वाले समय का चेहरा होता है इसलिए जीवन में किसी न किसी रूप में हम तक पहुंचने वाले प्रत्येक संकेत के प्रति गंभीरता बरतें और अपने भीतर वह क्षमता विकसित करें कि नियति और प्रकृति से आने वाली हर तरंग बिना किसी बाधा के हम तक पहुंचे और हमें समय-समय पर सचेष्ट करती रहे।

Monday, 9 February 2015

ड्यूटी से जी चुराने वाले भाग्यहीन हैं या वर्णसंकर

आलेख (9 फरवरी 2015 के लिए)
ड्यूटी से जी चुराने वाले
भाग्यहीन हैं या वर्णसंकर
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

मनुष्य मात्र का पूरा जीवन कर्मप्रधान है। उसे मरते दम तक कर्म करते रहना है और इसी के सहारे जीवनयात्रा का आनंद पाते रहना है।
कर्म करना मनुष्य की आरंभिक अनिवार्यता है, जिसके बगैर मनुष्य के रूप में वह अपने किसी लक्ष्य में सफलता अर्जित नहीं कर सकता, आनंद या आत्मतोष पाने की बातें को दूर की कौड़ी ही हैं।         अक्सर हम तरह-तरह की चहारदीवारियों और किसम-किसम के दड़बों में रह रहे ऎसे-ऎसे लोगों को देखते हैं जो बाड़ों में जायज-नाजायज गलियों या पिछले दरवाजों से घुस तो आए हैं मगर कोई काम करना नहीं चाहते।
यों कहें कि किसी भी काम में उनका मन नहीं लगता। जब भी नाकाबिल लोगों का जमावड़ा कहीं हो जाता है वहाँ कर्म की प्रधानता समाप्त हो जाती है और उसका स्थान ले लिया करता है सस्ता मनोरंजन और टाईमपास।
इस कारण से जो शक्ति और समय कत्र्तव्य कर्म यानि ड्यूटी के प्रति समर्पित होना चाहिए वह फिजूल की चर्चाओं और निन्दाओं में जाया होता रहता है। फिर एक बार जब किसी इंसान को निन्दा, चुगली और नकारात्मक हरकतों से औरों को तंग करने में मजा आने लगता है, तब इनका पूरा ध्यान कत्र्तव्य कर्म की ओर से हट जाता है।
यह स्थिति अनपढ़ों से कहीं ज्यादा उन लोगों में देखने को मिलती है जो अधकचरे और स्वयंभू ज्ञानी तथा अपने आप को अभिजात्य मानते हैं। जो आदमी पढ़ा-लिखा नहीं है वह भोला होता है तथा उसे औरों की जिन्दगी के बारे में कुछ भी सुनने की जिज्ञासा नहीं होती, वह अपने ही काम में लगा रहता है क्योंकि उसकी जिन्दगी का लक्ष्य कमा कर खाना है, बिना काम-काज किए बंधी-बंधाई कमायी पर मौज उड़ाना नहीं।
और ऎसे ही कत्र्तव्यहीन लोग खाली दिमाग शैतान का घर जैसी स्थिति में आकर अपने अधिकारों की मांग करते हैं, धींगामस्ती से सारा माहौल खराब करते हैं।
असल में देखा जाए तो उधम वे ही अधिक करते हैं जो फालतू बैठे होते हैं, जिनके पास कोई काम-काज नहीं होता है अथवा होते हुए भी करना नहीं चाहते हैं।  ऎसे लोगों के रहते हुए किस मुँह से हम समाज, क्षेत्र और देश की तरक्की की बात कर सकते हैं, कौनसे राष्ट्रीय चरित्र की हम बात करें, जब कत्र्तव्यपरायणता और निष्ठा ही शेष नहीं बची है हममें।
एक अच्छा और सच्चा इंसान वही है जो अपने कर्म के प्रति निष्ठा रखे और ईमानदारी से अपने कत्र्तव्यों को पूर्ण करता रहे। ऎसे लोगों का भाग्य भी साथ देता है और वे जीवन में हर मोर्चे पर सफलता हासिल करते हैं।
दूसरी ओर उन लोगों की भरमार है जिनके जिम्मे खूब सारे कर्म हैं लेकिन वे करना नहीं चाहते। इसमें उनका मन ही नहीं लगता। लगे भी कैसे, जब बिना कुछ किए धराए पैसा मिलता रहे, भोग और विलास प्राप्त होते रहें तथा  सब कुछ मुफत में मिलता रहे, तो यह शरीर, मन और मस्तिष्क सब कुछ निकम्मे, नालायक और नाकारा हो ही जाते हैं। 
रोजमर्रा की जिन्दगी में कोई अभाव आ जाए या मेहनत करनी पड़े तो नानी याद आ जाए, लोगों के सामने दुखड़ा रोना शुरू कर दें, और तब पता चले कि मेहनत कितनी जरूरी है। लेकिन यह बोध उन लोगों को कभी नहीं हो सकता जो किसी न किसी बाड़े में ठाठ में जमे हुए हैं और हर माह बंधी-बंधायी कमायी मिल जाया करती है, काम करें या न करें, कोई देखने-सुनने या पूछने वाला नहीं है।
फिर कौन किससे पूछे, खूब सारे दूसरे लोग भी तो यही सब करते आ रहे हैं। एक गरीब आदमी जितनी मेहनत दिन भर में करता है उसका सौवाँ हिस्सा परिश्रम भी न हम करते हैं, न कर पाते हैं। लेकिन चाहिए सब कुछ पूरा का पूरा।
असली इंसान हमेशा पुरुषार्थी होता है, परिश्रम करता है और ईमानदारी से कत्र्तव्य पूर्ण कर मेहनत की कमाई पर निर्भर रहता है। उसे बिना पुरुषार्थ के कुछ भी प्राप्त करना स्वीकार नहीं होता क्योंकि उसकी रगों में उन पूर्वजों का खून है जो बिना मेहनत के कुछ भी पाना या उपभोग करना हराम मानते थे और जिनके समाज व देश के प्रति किए गए परिश्रम और सर्वस्व समर्पण की कहानियां आज भी सुनाई देती हैं। 
पर ऎसा अब नहीं रहा। हममें से अधिकांश लोग चाहते हैं कि कुछ भी करना न पड़े और आवक यों ही बनी रहे। इस मायने में आजकल लोग अपने निर्धारित कत्र्तव्यों के प्रति तो लापरवाह हैं लेकिन एक्सट्रा इंकम के तमाम स्रोतों के लिए ललचाये हुए लपकते और जी जान लगाकर काम करने को ही कत्र्तव्य कर्म मानने लगे हैं।
यह दोहरा मापदण्ड ही है जो आदमी को आदमी के रूप में स्वीकार नहीं करता बल्कि कभी बहुरूपिया, हरामखोर और कभी नौटंकीबाज मानने को विवश कर देता है। कत्र्तव्य कर्म अर्थात ड्यूटी से जो लोग जी चुराते हैं, जिन्हें अपनी ड्यूटी रास नहीं आती, उन सभी के बारे में यह निश्चित ही मान लेना चाहिए कि वे पूर्ण मनुष्य नहीं हैं बल्कि आधे-अधूरे ही हैं और जिनकी रगों में इंसानियत की बजाय कोई न कोई विजातीय द्रव्य मिला खून बह रहा है।
साफ-साफ कहा जाए तो यह कहने में किसी को कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि जो लोग समाज-जीवन के प्रबन्धन और देश में जहाँ कहीं हैं लेकिन अपनी ड्यूटी के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं रखते हैं वे या तो वर्णसंकर हैं या फिर भाग्यहीन। तीसरा कोई सा कारण नहीं हो सकता।
दुनिया भर के तमाम कामचोरों, निकम्मों और नालायकों की कुण्डलियां खंगाली जाएं, उनके जीवन का मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाए तो यह सामने आ ही जाएगा।  और इन पर भी विश्वास न हो तो ऎसे लोगों के लिए वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग कर लिया जाए, डीएनए टेस्ट करा लिया जाए तो सारी स्थितियां अपने आप सामने आ ही जाएंगी।
ऎसे भाग्यहीनों और वर्णसंकरों का सान्निध्य और उनकी छाया तक का संस्पर्श दूसरों के भाग्य को दूषित कर देने वाला होता है। कोई लाख कितना ही समझाये मगर हकीकत यही है कि जो पुरुषार्थ नहीं करता है वह निश्चित रूप से न समाज के काम का है, न देश के।
ऎसे लोगों के कारण ही हमारा महान भारत सब कुछ होते हुए भी तरक्की नहीं कर पा रहा है। वास्तव में देखा जाए तो ये ही लोग असली आतंकवादी हैं जो न खुद कुछ करते हैं, न औरों को करने देने लायक माहौल छोड़ते हैं।

भगवान से प्रार्थना करें कि ऎसे नालायकों और कामचारों को वापस बुला ले और पड़ोसी देशों में इनके पुनर्जन्म की व्यवस्था कर दे ताकि हमारी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता बरकरार रहे और देश की तरक्की के रोडे भी समाप्त हो  जाएं।

Sunday, 8 February 2015

बिना पाये के दोपाये कभी दोस्ती, कभी दुश्मनी

आलेख (8 फरवरी 2015 के लिए)

बिना पाये के दोपाये
कभी दोस्ती, कभी दुश्मनी
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
इंसान दुनिया में ऎसा विचित्र प्राणी है जिसके बारे में कभी कोई पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि वह इसका मित्र है अथवा उसका दुश्मन।  मित्रता और शत्रुता के पुराने और परंपरागत सारे समीकरणों को आदमी के स्वार्थ और खुदगर्जी ने ध्वस्त कर दिए हैं।
अब अपने काम या स्वार्थ के आधार पर संबंधों का सृजन और विखण्डन होने लगा है। जहाँ जिस किसी से हमारा काम पड़ता है हम सारे सिद्धान्तों, आदर्शों और शत्रुता को भुलाकर मित्रता स्थापित कर लिया करते हैं। फिर जब कभी कोई काम नहीं हो पाता है, अपने पाक-नापाक मंसूबे पूरे नहीं हो पाते हैं तब संबंधों में ऎसी दरार आ जाती है कि दुश्मनी भी हार जाती है। और फिर कोई सा काम आ जाने पर दुबारा दोस्ती गाँठ ली जाती हैं।
मित्रता और शत्रुता अब स्वार्थ सापेक्ष हो गए हैं।  इसके लिए आदमी का अपना कोई सिद्धान्त या आदर्श नहीं होता। जिसका जब कोई काम सामने आ जाए वह हमारे लिए मित्र तुल्य, भ्राता तुल्य, पिता तुल्य से लेकर दादा तुल्य हो जाता है। और काम नहीं हो पाने पर वह घोर शत्रु की श्रेणी में आ जाता है।
बात किसी भी क्षेत्र की हो, हर तरफ शत्रुता और मित्रता के मानदण्डों पर स्वार्थ और लोभ-लालच हावी है और वह भी इतनी कि आदमी खुद तय नहीं कर पाता है कि असल में वह है क्या, और उसे क्या होना चाहिए।
इस मामले में हर तरफ ऎसे लोगों का जबर्दस्त जमघट है जिन्हें अपने काम की ही पड़ी होती है। काम पड़े तो गधे और सूअर को भी बाप-दादा मानकर पूरी की पूरी श्रद्धा उण्डेलते हुए साष्टांग दण्डवत कर डालेंगे और सब कुछ कर या करवा लेंगे। और काम निकल जाने के बाद खुद गधे की भूमिका में आकर दुलत्ती झाड़ने लगते हैं। सारे के सारे गधे मुफत के गुलाबजामुन खा-खाकर तगड़े होते जा रहे हैं और वो सब कुछ करने लग गए हैं जो गधों को भी शोभा नहीं देता।
आजकल सब तरफ यही सब कुछ हो रहा है।  संसार में काफी सारे लोग तो इसीलिए पैदा हुए हैं। उन्हें अपने ईमान-धरम, उसूलों और न्याय से कोई मतलब नहीं है। जिंदगी भर उनका एकसूत्री लक्ष्य यही होता है कि चाहे जिस तरह भी हो सके, उनके अपने काम निकलने चाहिएं और अपना काम निकालने के लिए वे आदमीयत को छोड़ कर सब कुछ बनने को तैयार रहते हैं।
कभी शहदिया चापलुूसी करते हैं, कभी एलास्टिक की तरह खींच कर लम्बे होकर सबके आगे पसर जाते हैं और कभी अपने आपको उनकी कृपा पर जिंदा रहने के लिए गिरवी रख दिया करते हैं।
ऎसे लोग हमारे आस-पास और संपर्क में भी खूब हैं जिनकी समृद्धि का राज ही दूसरे लोग हैं।  परायों की दया, करुणा और कृपा पर निर्भर ये लोग जीवन भर याचकों की तरह जीते हैं और अपने स्वार्थ पूरे करने के लिए मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं।
इन लोगों के लिए कोई ऎसा इंसान नहीं होता जो कि निरन्तर और स्थायी मित्र या शत्रु हो। इनकी मित्रता और सामीप्य भी तभी संभव है जब इनका कोई न कोई काम हो या आने वाले समय में काम पड़ने की संभावना हो। फिर शत्रुता के मामले में भी इन पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता। कोई लाख गालियां बके, जलील करें, भला-बुरा कहते हुए अपमान करें या फिर ठुकाई ही क्यों न कर दे।
इन नालायकों और बेशर्मों पर कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि इनका लक्ष्य दूसरा ही कुछ होता है और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ये कितने ही नीचे गिर जाने के लिए सदैव तैयार रहते हैं।
कई सारे लोग ऎसे हैं जिन्हें किसी का शत्रु माना जाता रहा होता है लेकिन कोई सा स्वार्थ सामने आ जाने पर वे मित्र हो जाते हैं, खूब सारे लोग ऎसे हैं जिन्हें मित्र माना जाता रहा होता है और अचानक वे दूसरे पाले में खड़े दिखाई देते हैं और ऎसी प्रतिद्वन्दि्वता पाल लिया करते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता।
कभी शत्रुता, फिर मित्रता, फिर यही क्रम जिंदगी भर बना रहता है।   और ऎसे बिना पाये के पैण्डुलम हमेशा  अपने स्वार्थ के मारे कुछ न कुछ करते ही रहते हैं।
कुछ लोग अपने किसी न किसी स्वार्थ के मित्रता स्थापित कर लिया करते हैं फिर शोषक की भूमिका में रहकर शोषण करते हैं और काम सध जाने के बाद दूरी बना लिया करते हैं।
इन लोगों के लिए मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों का कोई महत्त्व नहीं होता। ये हमेशा अपनी खुदगर्जी को पूरा करने के लिए नए-नए संबंध तलाशते हैं और उनका लाभ लेते रहते हुए समृद्धि के शिखरों तक पहुंच कर सफलता का कीर्तिगान करते हुए श्रेय प्राप्त कर लिया करते हैं।
 इन लोगों के लिए मित्रता या शत्रुता काम निकालने का साधन मात्र होकर रह जाती है। असल में अपने कामों के लिए ये इन दोनों स्थितियों से परे होते हैं।

ऎसे खूब सारे स्वार्थी लोगों का जमावड़ा हमेशा रहता है जो सिद्धान्तहीन व मूल्यहीन जीवन जीते हैं। इनके लिए सिद्धान्त, त्याग, ईमानदारी और मानवीय संवेदनाओं से बढ़कर होता है अपना स्वार्थ।  अपने आस-पास भी ऎसे स्वनाधन्य खूब लोग हैं जो अवसरवादी होकर जी रहे हैं तथा दूसरों के अवसरों पर डाका डाल रहे हैं।

Saturday, 7 February 2015

वो पाएँ जो दुर्लभ हो

आलेख ( 7 फरवरी 2015 के लिए)
वो पाएँ जो दुर्लभ हो
-  डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

जीने का मजा तब है जब ऎसा कुछ सच्चा और अच्छा किया जाए जो और किसी के बस में न हो। इस दृष्टि से जो कुछ किया जाता है वह अपने आप में अलग ही आनंद देने वाला है।
आमतौर पर हम सभी लोग परंपरा से चली आ रही धाराओं और उपधाराओं में बहते रहने के आदी हो गए हैं और इनकी वजह से हम भी उस भीड़ का हिस्सा मात्र होकर रह गए हैं जो सदियों से आती-जाती रही है लेकिन कोई याद नहीं करता।
 हम सभी लोग नकलची और परंपरावादी होकर जी रहे हैं और सामान्य जिन्दगी के लिए जद्दोजहद करते आ रहे हैं जबकि सामान्य तौर पर जो कुछ हमें प्राप्य है वह किसी न किसी माध्यम से प्राप्त हो ही जाता है।
एक आम से लेकर खास इंसान तक की वृत्तियों को देखा जाए तो यह तथ्य सामने आएगा कि हम हमारा बेशकीमती समय, धन-सम्पत्ति और श्रम उन कार्यों में अधिक से अधिक व्यय करने की लत बना चुके हैं जो हमें सहज ही प्राप्त हो जाया करते हैं।
इस दृष्टि से हमारी सोच और हमारे कर्म पुरातन अवधारणाओं और यथास्थितिवाद को ही व्यक्त करते हैं। बहुधा हम सामान्य कर्मों के लिए अपनी ऊर्जा नष्ट करते रहते हैं जबकि  वे सारे काम बहुत कम परिश्रम में अपने आप हमारे लिए लाभदायी हो सकते हैं।
जो प्रवाह चल रहा है उसका सम्मान करते हुए उपयोग और उपभोग होते रहना चाहिए लेकिन हम इस मामले में सामान्येतर होने का प्रयास करते हैं और बेवजह अपनी सारी शक्ति उन कामों में लगा दिया करते है जिन कामों को आसानी से करना संभव होता है।
मनुष्य जीवन के खूब सारे कामों को देख लिया जाए तो सामने आएगा कि लक्ष्योन्मुखी होते हुए हम जो कुछ प्राप्त करने के लिए लम्बा समय और धन लगाते हैं वह मामूली होता है।
सामान्य जिन्दगी जीते हुए भी हमें कुछ न कुछ उच्चतम लक्ष्यों और सेवा कार्यों की ओर ध्यान देना ही चाहिए क्योंकि जीवन उसी का गिना जाता है जो कुछ अलग हटकर दिखाते हैं।
हालांकि ऎसे लोग बिरले ही  होते हैं जो आम से हटकर कुछ खास करने का प्रयास करते हैं और सफलता के शिखर चूम लेने का माद्दा रखते हैं।
हमारे पूरे जीवन में कई सारे काम ऎसे होते हैं, खूब सारे लक्ष्यों को सामने रखकर किए जाते हैं और जब वह प्राप्त हो जाता है तब अधिकांश लक्ष्यों के बारे में हमें इस बात का पछतावा होता है कि इन कामों के लिए इतनी ज्यादा मशक्कत करने की जरूरत ही नहीं थी, कई मामलों में धन भी गया और धर्म भी, जैसे हालात पैदा हो जाया करते हैं।
दुनिया में भोग, आनंद और सफलता के मामले में गंभीरता से सोचा जाए तो हम जिन्दगी भर कुछ ऎसे विषयों में अपना समय गँवाते हैं जो बाजार में सहज उपलब्ध हैं, इनके लिए ज्यादा परिश्रम या खोजबीन की जरूरत भी नहीं होती।
दुनिया में जो सहज उपलब्ध है, कहीं से खरीदा जा सकता है, उसके लिए बेवजह समय, धन और अपनी शक्ति जाया करना नादानी के सिवा और कुछ नहीं है और हमारी यह मूर्खता ही है जिसका पता तब चलता है जब हम उस लक्ष्य को पा चुके होते हैं जो लक्ष्य दूसरे लोग भी आसानी से प्राप्त कर लिया करते हैं। फिर हमारे द्वारा किए गए परिश्रम और बर्बाद किए गए समय का कोई अर्थ नहीं होता, सब कुछ निरर्थक ही लगता है।
इस परम सत्य को जानते हुए भी हम अपने जीवन के बहुमूल्य वर्षो को यों ही गँवा दिया करते हैं और जब इन विषयों की हकीकत का पता चलता है तब इस बात का पछतावा होता है कि सहज उपलब्ध वस्तुओं या विषयों के लिए इतना लम्बा सफर तय करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी।
इसे हमारी बुद्धिमानी नहीं कहा जा सकता। दुनिया में जो व्यक्ति, वस्तु या विषय सहज उपलब्ध हैं, खरीदे जा सकते हैं उनके लिए समय बर्बाद करना किसी भी प्रकार से न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। चाहे फिर वे किसी भी प्रकार के भोग-विलास और आनंद के उपादान हों या फिर ऎसे कारक, जो आम हैं।

संसार में आने वाला हर इंसान अपने आपमें संप्रभु है और उसे चाहिए कि ऎसे काम करें कि आने वाली पीढ़ियां याद करें, स्वयं भी आनंद में रहे, उपलब्धियों के साथ जीये और दूसरों को भी आनंद देने का सामथ्र्य हो। ऎसा कुछ करें कि जो नया हो, दुनिया के लिए उल्लेखनीय हो।