Monday, 9 February 2015

ड्यूटी से जी चुराने वाले भाग्यहीन हैं या वर्णसंकर

आलेख (9 फरवरी 2015 के लिए)
ड्यूटी से जी चुराने वाले
भाग्यहीन हैं या वर्णसंकर
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

मनुष्य मात्र का पूरा जीवन कर्मप्रधान है। उसे मरते दम तक कर्म करते रहना है और इसी के सहारे जीवनयात्रा का आनंद पाते रहना है।
कर्म करना मनुष्य की आरंभिक अनिवार्यता है, जिसके बगैर मनुष्य के रूप में वह अपने किसी लक्ष्य में सफलता अर्जित नहीं कर सकता, आनंद या आत्मतोष पाने की बातें को दूर की कौड़ी ही हैं।         अक्सर हम तरह-तरह की चहारदीवारियों और किसम-किसम के दड़बों में रह रहे ऎसे-ऎसे लोगों को देखते हैं जो बाड़ों में जायज-नाजायज गलियों या पिछले दरवाजों से घुस तो आए हैं मगर कोई काम करना नहीं चाहते।
यों कहें कि किसी भी काम में उनका मन नहीं लगता। जब भी नाकाबिल लोगों का जमावड़ा कहीं हो जाता है वहाँ कर्म की प्रधानता समाप्त हो जाती है और उसका स्थान ले लिया करता है सस्ता मनोरंजन और टाईमपास।
इस कारण से जो शक्ति और समय कत्र्तव्य कर्म यानि ड्यूटी के प्रति समर्पित होना चाहिए वह फिजूल की चर्चाओं और निन्दाओं में जाया होता रहता है। फिर एक बार जब किसी इंसान को निन्दा, चुगली और नकारात्मक हरकतों से औरों को तंग करने में मजा आने लगता है, तब इनका पूरा ध्यान कत्र्तव्य कर्म की ओर से हट जाता है।
यह स्थिति अनपढ़ों से कहीं ज्यादा उन लोगों में देखने को मिलती है जो अधकचरे और स्वयंभू ज्ञानी तथा अपने आप को अभिजात्य मानते हैं। जो आदमी पढ़ा-लिखा नहीं है वह भोला होता है तथा उसे औरों की जिन्दगी के बारे में कुछ भी सुनने की जिज्ञासा नहीं होती, वह अपने ही काम में लगा रहता है क्योंकि उसकी जिन्दगी का लक्ष्य कमा कर खाना है, बिना काम-काज किए बंधी-बंधाई कमायी पर मौज उड़ाना नहीं।
और ऎसे ही कत्र्तव्यहीन लोग खाली दिमाग शैतान का घर जैसी स्थिति में आकर अपने अधिकारों की मांग करते हैं, धींगामस्ती से सारा माहौल खराब करते हैं।
असल में देखा जाए तो उधम वे ही अधिक करते हैं जो फालतू बैठे होते हैं, जिनके पास कोई काम-काज नहीं होता है अथवा होते हुए भी करना नहीं चाहते हैं।  ऎसे लोगों के रहते हुए किस मुँह से हम समाज, क्षेत्र और देश की तरक्की की बात कर सकते हैं, कौनसे राष्ट्रीय चरित्र की हम बात करें, जब कत्र्तव्यपरायणता और निष्ठा ही शेष नहीं बची है हममें।
एक अच्छा और सच्चा इंसान वही है जो अपने कर्म के प्रति निष्ठा रखे और ईमानदारी से अपने कत्र्तव्यों को पूर्ण करता रहे। ऎसे लोगों का भाग्य भी साथ देता है और वे जीवन में हर मोर्चे पर सफलता हासिल करते हैं।
दूसरी ओर उन लोगों की भरमार है जिनके जिम्मे खूब सारे कर्म हैं लेकिन वे करना नहीं चाहते। इसमें उनका मन ही नहीं लगता। लगे भी कैसे, जब बिना कुछ किए धराए पैसा मिलता रहे, भोग और विलास प्राप्त होते रहें तथा  सब कुछ मुफत में मिलता रहे, तो यह शरीर, मन और मस्तिष्क सब कुछ निकम्मे, नालायक और नाकारा हो ही जाते हैं। 
रोजमर्रा की जिन्दगी में कोई अभाव आ जाए या मेहनत करनी पड़े तो नानी याद आ जाए, लोगों के सामने दुखड़ा रोना शुरू कर दें, और तब पता चले कि मेहनत कितनी जरूरी है। लेकिन यह बोध उन लोगों को कभी नहीं हो सकता जो किसी न किसी बाड़े में ठाठ में जमे हुए हैं और हर माह बंधी-बंधायी कमायी मिल जाया करती है, काम करें या न करें, कोई देखने-सुनने या पूछने वाला नहीं है।
फिर कौन किससे पूछे, खूब सारे दूसरे लोग भी तो यही सब करते आ रहे हैं। एक गरीब आदमी जितनी मेहनत दिन भर में करता है उसका सौवाँ हिस्सा परिश्रम भी न हम करते हैं, न कर पाते हैं। लेकिन चाहिए सब कुछ पूरा का पूरा।
असली इंसान हमेशा पुरुषार्थी होता है, परिश्रम करता है और ईमानदारी से कत्र्तव्य पूर्ण कर मेहनत की कमाई पर निर्भर रहता है। उसे बिना पुरुषार्थ के कुछ भी प्राप्त करना स्वीकार नहीं होता क्योंकि उसकी रगों में उन पूर्वजों का खून है जो बिना मेहनत के कुछ भी पाना या उपभोग करना हराम मानते थे और जिनके समाज व देश के प्रति किए गए परिश्रम और सर्वस्व समर्पण की कहानियां आज भी सुनाई देती हैं। 
पर ऎसा अब नहीं रहा। हममें से अधिकांश लोग चाहते हैं कि कुछ भी करना न पड़े और आवक यों ही बनी रहे। इस मायने में आजकल लोग अपने निर्धारित कत्र्तव्यों के प्रति तो लापरवाह हैं लेकिन एक्सट्रा इंकम के तमाम स्रोतों के लिए ललचाये हुए लपकते और जी जान लगाकर काम करने को ही कत्र्तव्य कर्म मानने लगे हैं।
यह दोहरा मापदण्ड ही है जो आदमी को आदमी के रूप में स्वीकार नहीं करता बल्कि कभी बहुरूपिया, हरामखोर और कभी नौटंकीबाज मानने को विवश कर देता है। कत्र्तव्य कर्म अर्थात ड्यूटी से जो लोग जी चुराते हैं, जिन्हें अपनी ड्यूटी रास नहीं आती, उन सभी के बारे में यह निश्चित ही मान लेना चाहिए कि वे पूर्ण मनुष्य नहीं हैं बल्कि आधे-अधूरे ही हैं और जिनकी रगों में इंसानियत की बजाय कोई न कोई विजातीय द्रव्य मिला खून बह रहा है।
साफ-साफ कहा जाए तो यह कहने में किसी को कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि जो लोग समाज-जीवन के प्रबन्धन और देश में जहाँ कहीं हैं लेकिन अपनी ड्यूटी के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं रखते हैं वे या तो वर्णसंकर हैं या फिर भाग्यहीन। तीसरा कोई सा कारण नहीं हो सकता।
दुनिया भर के तमाम कामचोरों, निकम्मों और नालायकों की कुण्डलियां खंगाली जाएं, उनके जीवन का मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाए तो यह सामने आ ही जाएगा।  और इन पर भी विश्वास न हो तो ऎसे लोगों के लिए वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग कर लिया जाए, डीएनए टेस्ट करा लिया जाए तो सारी स्थितियां अपने आप सामने आ ही जाएंगी।
ऎसे भाग्यहीनों और वर्णसंकरों का सान्निध्य और उनकी छाया तक का संस्पर्श दूसरों के भाग्य को दूषित कर देने वाला होता है। कोई लाख कितना ही समझाये मगर हकीकत यही है कि जो पुरुषार्थ नहीं करता है वह निश्चित रूप से न समाज के काम का है, न देश के।
ऎसे लोगों के कारण ही हमारा महान भारत सब कुछ होते हुए भी तरक्की नहीं कर पा रहा है। वास्तव में देखा जाए तो ये ही लोग असली आतंकवादी हैं जो न खुद कुछ करते हैं, न औरों को करने देने लायक माहौल छोड़ते हैं।

भगवान से प्रार्थना करें कि ऎसे नालायकों और कामचारों को वापस बुला ले और पड़ोसी देशों में इनके पुनर्जन्म की व्यवस्था कर दे ताकि हमारी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता बरकरार रहे और देश की तरक्की के रोडे भी समाप्त हो  जाएं।

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