Sunday, 15 February 2015

इंसान है ही सेवा के लिए

आलेख ( 15 फरवरी 2015 के लिए)
इंसान है ही सेवा के लिए
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

संसार भर में हर तरफ अभावग्रस्तों की कोई कमी नहीं है। हर कोई इंसान किसी न किसी रूप में अभावग्रस्त होता ही है। कोई किसी एक सुख या सुविधा में सम्पन्न होता है तो दूसरी किसी सुविधा में विपन्नता का अभिशाप भोगता है।
कोई भी इंसान ऎसा देखने में नहीं मिल सकता जो हर दृष्टि से सुखी और समृद्ध हो तथा जिसे किसी भी प्रकार के व्यक्ति, विषय या वस्तु की कोई इच्छा या अपेक्षा न हो।
संसार की यही नियति है। हर कोई एक मामले में समृद्ध है और दूसरों में विपन्न।  हर दृष्टि से पूर्णतया सम्पन्न इंसान कोई हो ही नहीं सकता। हाँ, संसार से दूर रहने वाले वीतरागी, संन्यासी और परमहंसों को अपवाद माना जा सकता है।
आम सांसारिक इंसान के लिए यह संभव है ही नहीं कि वह पूर्णतया स्वस्थ, मस्त और आनंदमग्न हो। हम सभी लोग आधे-अधूरे माने जा सकते हैं और यही कारण है कि हमें कोई सा सुकून पाने के लिए किसी न किसी की तलाश हर क्षण बनी रहती है, चाहे फिर वह व्यक्ति, विषय या वस्तु हो अथवा कोई सा संयोग-वियोग।
यही स्थिति हर मामले में शाश्वत रूप से लागू रहती ही है। इंसान मरते दम तक अपने अभावों या कमियों को पूर्ण करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। इंसान की इस कमी को पूरी करने के लिए भगवान ने सजातीय आकर्षण का विधान भी बनाए रखा है जहाँ हर समान विचार और व्यवहार अपनी तरह के दूसरे वैचारिक धरातल की भावभूमि पाकर अदृश्य तरंगों का तंतु संबंध स्थापित कर ही लिया करता है और यहीं से शुरू हो जाती है अभावों और अधूरेपन के समाप्त होने की प्रक्रिया।
दुनिया भर में अपनी ही तरह के विचारों, कृत्यों, हलचलों, हरकतों, वृत्तियों और भावनाओं वाले लोगों की तलाश कोई असाध्य नहीं है, सिर्फ मानसिकता के धरातल पर जाकर संकल्प अभिव्यक्त करने की जरूरत होती है। फिर वैचारिक तरंगों का ऎसा सेतु अपने आप बन जाया करता है कि संकल्पों के पाश से आबद्ध होकर इंसान एक-दूसरे के करीब खींचे चले आते हैं और इस प्रकार भगवान अभावों व इच्छाओं को पूर्ण करता हुआ मनुष्यों को आनंद की प्राप्ति कराता है। 
वस्तुतः हर इंसान का यह प्राथमिक कत्र्तव्य है कि संसार में अपने कत्र्तव्य कर्म करते रहकर हमेशा इस बात का प्रयास करे कि समाज, क्षेत्र और देश में जहाँ जो कोई जिस किसी अभाव से त्रस्त है उसके अभाव को दूर करने में हरसंभव मदद करे, भागीदारी निभाए और सम्बल प्रदान करे।
यही सच्ची सेवा, परोपकार और पुण्य कार्य है जिससे भगवान जल्दी प्रसन्न होते हैं और आनंददायी जीवन के लिए आशीर्वाद की वृष्टि करते रहते हैं। किसी के जीवन से अभावों को दूर करना, सेवाओं और सुविधाओं का स्वस्थ और भरपूर माहौल उपलब्ध कराकर सुकून प्रदान करने से बढ़कर वर्तमान युग में आत्मतुष्टि और भगवत्प्राप्ति का कोई और माध्यम हो ही नहीं सकता।
यह सब निर्भर करता है हमारी उदारता, जनोन्मुखी सहृदयता और मानवीय संवेदनाओं से। हालांकि सेवा, सुविधा और परोपकार का यह मार्ग सहज और सरल नहीं कहा जा सकता, तथापि हमारी दिली भावनाओं, लोक कल्याण और दूसरों को सुख प्रदान करने के महान लक्ष्य को डिगाने में चाहे कितने अवरोध आएं, उनके प्रति बेपरवाह रहने का साहस बनाए रखें।  सारी चुनौतियों के बावजूद अपने सेवा-परोपकार भरे कर्मों में लगे रहने के लिए भगवान की ओर से हरसंभव अदृश्य मदद अपने आप मिलती रहती है।
जो लोग दूसरों के अभावों को दूर करने, सेवा और परोपकार करने के पथिक हैं, उन्हें हमेशा ईश्वर मदद करता ही है। इसलिए औरों के अभावों को दूर करने के प्रयासों को ईश्वरीय कार्य मानकर करते रहना चाहिए।

संसार में वे ही लोग धन्य हैं जो औरों के अभावों को जानकर अपनी ओर से भरपूर मदद करते हैं और अभावों से मुक्ति दिलाने का इतिहास रचते हैं। ईश्वर इन सेवाभावी और सुविधादाताओं का पूरा ख्याल रखता है और इन्हें समय-समय पर महा आनंद का अनुभव भी कराता रहता है। 

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