आलेख (8 फरवरी 2015 के लिए)
बिना
पाये के दोपाये
कभी
दोस्ती, कभी दुश्मनी
-
डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
इंसान दुनिया
में ऎसा विचित्र प्राणी है जिसके बारे में कभी कोई पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि वह
इसका मित्र है अथवा उसका दुश्मन। मित्रता और
शत्रुता के पुराने और परंपरागत सारे समीकरणों को आदमी के स्वार्थ और खुदगर्जी ने ध्वस्त
कर दिए हैं।
अब अपने काम
या स्वार्थ के आधार पर संबंधों का सृजन और विखण्डन होने लगा है। जहाँ जिस किसी से हमारा
काम पड़ता है हम सारे सिद्धान्तों, आदर्शों और शत्रुता को भुलाकर मित्रता स्थापित कर
लिया करते हैं। फिर जब कभी कोई काम नहीं हो पाता है, अपने पाक-नापाक मंसूबे पूरे नहीं
हो पाते हैं तब संबंधों में ऎसी दरार आ जाती है कि दुश्मनी भी हार जाती है। और फिर
कोई सा काम आ जाने पर दुबारा दोस्ती गाँठ ली जाती हैं।
मित्रता और शत्रुता
अब स्वार्थ सापेक्ष हो गए हैं। इसके लिए आदमी
का अपना कोई सिद्धान्त या आदर्श नहीं होता। जिसका जब कोई काम सामने आ जाए वह हमारे
लिए मित्र तुल्य, भ्राता तुल्य, पिता तुल्य से लेकर दादा तुल्य हो जाता है। और काम
नहीं हो पाने पर वह घोर शत्रु की श्रेणी में आ जाता है।
बात किसी भी
क्षेत्र की हो, हर तरफ शत्रुता और मित्रता के मानदण्डों पर स्वार्थ और लोभ-लालच हावी
है और वह भी इतनी कि आदमी खुद तय नहीं कर पाता है कि असल में वह है क्या, और उसे क्या
होना चाहिए।
इस मामले में
हर तरफ ऎसे लोगों का जबर्दस्त जमघट है जिन्हें अपने काम की ही पड़ी होती है। काम पड़े
तो गधे और सूअर को भी बाप-दादा मानकर पूरी की पूरी श्रद्धा उण्डेलते हुए साष्टांग दण्डवत
कर डालेंगे और सब कुछ कर या करवा लेंगे। और काम निकल जाने के बाद खुद गधे की भूमिका
में आकर दुलत्ती झाड़ने लगते हैं। सारे के सारे गधे मुफत के गुलाबजामुन खा-खाकर तगड़े
होते जा रहे हैं और वो सब कुछ करने लग गए हैं जो गधों को भी शोभा नहीं देता।
आजकल सब तरफ
यही सब कुछ हो रहा है। संसार में काफी सारे
लोग तो इसीलिए पैदा हुए हैं। उन्हें अपने ईमान-धरम, उसूलों और न्याय से कोई मतलब नहीं
है। जिंदगी भर उनका एकसूत्री लक्ष्य यही होता है कि चाहे जिस तरह भी हो सके, उनके अपने
काम निकलने चाहिएं और अपना काम निकालने के लिए वे आदमीयत को छोड़ कर सब कुछ बनने को
तैयार रहते हैं।
कभी शहदिया चापलुूसी
करते हैं, कभी एलास्टिक की तरह खींच कर लम्बे होकर सबके आगे पसर जाते हैं और कभी अपने
आपको उनकी कृपा पर जिंदा रहने के लिए गिरवी रख दिया करते हैं।
ऎसे लोग हमारे
आस-पास और संपर्क में भी खूब हैं जिनकी समृद्धि का राज ही दूसरे लोग हैं। परायों की दया, करुणा और कृपा पर निर्भर ये लोग
जीवन भर याचकों की तरह जीते हैं और अपने स्वार्थ पूरे करने के लिए मरने-मारने पर उतारू
हो जाते हैं।
इन लोगों के
लिए कोई ऎसा इंसान नहीं होता जो कि निरन्तर और स्थायी मित्र या शत्रु हो। इनकी मित्रता
और सामीप्य भी तभी संभव है जब इनका कोई न कोई काम हो या आने वाले समय में काम पड़ने
की संभावना हो। फिर शत्रुता के मामले में भी इन पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता। कोई लाख
गालियां बके, जलील करें, भला-बुरा कहते हुए अपमान करें या फिर ठुकाई ही क्यों न कर
दे।
इन नालायकों
और बेशर्मों पर कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि इनका लक्ष्य दूसरा ही कुछ होता है और इस
लक्ष्य को हासिल करने के लिए ये कितने ही नीचे गिर जाने के लिए सदैव तैयार रहते हैं।
कई सारे लोग
ऎसे हैं जिन्हें किसी का शत्रु माना जाता रहा होता है लेकिन कोई सा स्वार्थ सामने आ
जाने पर वे मित्र हो जाते हैं, खूब सारे लोग ऎसे हैं जिन्हें मित्र माना जाता रहा होता
है और अचानक वे दूसरे पाले में खड़े दिखाई देते हैं और ऎसी प्रतिद्वन्दि्वता पाल लिया
करते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता।
कभी शत्रुता,
फिर मित्रता, फिर यही क्रम जिंदगी भर बना रहता है। और ऎसे बिना पाये के पैण्डुलम हमेशा अपने स्वार्थ के मारे कुछ न कुछ करते ही रहते हैं।
कुछ लोग अपने
किसी न किसी स्वार्थ के मित्रता स्थापित कर लिया करते हैं फिर शोषक की भूमिका में रहकर
शोषण करते हैं और काम सध जाने के बाद दूरी बना लिया करते हैं।
इन लोगों के
लिए मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों का कोई महत्त्व नहीं होता। ये हमेशा अपनी खुदगर्जी
को पूरा करने के लिए नए-नए संबंध तलाशते हैं और उनका लाभ लेते रहते हुए समृद्धि के
शिखरों तक पहुंच कर सफलता का कीर्तिगान करते हुए श्रेय प्राप्त कर लिया करते हैं।
इन लोगों के लिए मित्रता या शत्रुता काम निकालने
का साधन मात्र होकर रह जाती है। असल में अपने कामों के लिए ये इन दोनों स्थितियों से
परे होते हैं।
ऎसे खूब सारे
स्वार्थी लोगों का जमावड़ा हमेशा रहता है जो सिद्धान्तहीन व मूल्यहीन जीवन जीते हैं।
इनके लिए सिद्धान्त, त्याग, ईमानदारी और मानवीय संवेदनाओं से बढ़कर होता है अपना स्वार्थ। अपने आस-पास भी ऎसे स्वनाधन्य खूब लोग हैं जो अवसरवादी
होकर जी रहे हैं तथा दूसरों के अवसरों पर डाका डाल रहे हैं।
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