Saturday, 7 February 2015

वो पाएँ जो दुर्लभ हो

आलेख ( 7 फरवरी 2015 के लिए)
वो पाएँ जो दुर्लभ हो
-  डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

जीने का मजा तब है जब ऎसा कुछ सच्चा और अच्छा किया जाए जो और किसी के बस में न हो। इस दृष्टि से जो कुछ किया जाता है वह अपने आप में अलग ही आनंद देने वाला है।
आमतौर पर हम सभी लोग परंपरा से चली आ रही धाराओं और उपधाराओं में बहते रहने के आदी हो गए हैं और इनकी वजह से हम भी उस भीड़ का हिस्सा मात्र होकर रह गए हैं जो सदियों से आती-जाती रही है लेकिन कोई याद नहीं करता।
 हम सभी लोग नकलची और परंपरावादी होकर जी रहे हैं और सामान्य जिन्दगी के लिए जद्दोजहद करते आ रहे हैं जबकि सामान्य तौर पर जो कुछ हमें प्राप्य है वह किसी न किसी माध्यम से प्राप्त हो ही जाता है।
एक आम से लेकर खास इंसान तक की वृत्तियों को देखा जाए तो यह तथ्य सामने आएगा कि हम हमारा बेशकीमती समय, धन-सम्पत्ति और श्रम उन कार्यों में अधिक से अधिक व्यय करने की लत बना चुके हैं जो हमें सहज ही प्राप्त हो जाया करते हैं।
इस दृष्टि से हमारी सोच और हमारे कर्म पुरातन अवधारणाओं और यथास्थितिवाद को ही व्यक्त करते हैं। बहुधा हम सामान्य कर्मों के लिए अपनी ऊर्जा नष्ट करते रहते हैं जबकि  वे सारे काम बहुत कम परिश्रम में अपने आप हमारे लिए लाभदायी हो सकते हैं।
जो प्रवाह चल रहा है उसका सम्मान करते हुए उपयोग और उपभोग होते रहना चाहिए लेकिन हम इस मामले में सामान्येतर होने का प्रयास करते हैं और बेवजह अपनी सारी शक्ति उन कामों में लगा दिया करते है जिन कामों को आसानी से करना संभव होता है।
मनुष्य जीवन के खूब सारे कामों को देख लिया जाए तो सामने आएगा कि लक्ष्योन्मुखी होते हुए हम जो कुछ प्राप्त करने के लिए लम्बा समय और धन लगाते हैं वह मामूली होता है।
सामान्य जिन्दगी जीते हुए भी हमें कुछ न कुछ उच्चतम लक्ष्यों और सेवा कार्यों की ओर ध्यान देना ही चाहिए क्योंकि जीवन उसी का गिना जाता है जो कुछ अलग हटकर दिखाते हैं।
हालांकि ऎसे लोग बिरले ही  होते हैं जो आम से हटकर कुछ खास करने का प्रयास करते हैं और सफलता के शिखर चूम लेने का माद्दा रखते हैं।
हमारे पूरे जीवन में कई सारे काम ऎसे होते हैं, खूब सारे लक्ष्यों को सामने रखकर किए जाते हैं और जब वह प्राप्त हो जाता है तब अधिकांश लक्ष्यों के बारे में हमें इस बात का पछतावा होता है कि इन कामों के लिए इतनी ज्यादा मशक्कत करने की जरूरत ही नहीं थी, कई मामलों में धन भी गया और धर्म भी, जैसे हालात पैदा हो जाया करते हैं।
दुनिया में भोग, आनंद और सफलता के मामले में गंभीरता से सोचा जाए तो हम जिन्दगी भर कुछ ऎसे विषयों में अपना समय गँवाते हैं जो बाजार में सहज उपलब्ध हैं, इनके लिए ज्यादा परिश्रम या खोजबीन की जरूरत भी नहीं होती।
दुनिया में जो सहज उपलब्ध है, कहीं से खरीदा जा सकता है, उसके लिए बेवजह समय, धन और अपनी शक्ति जाया करना नादानी के सिवा और कुछ नहीं है और हमारी यह मूर्खता ही है जिसका पता तब चलता है जब हम उस लक्ष्य को पा चुके होते हैं जो लक्ष्य दूसरे लोग भी आसानी से प्राप्त कर लिया करते हैं। फिर हमारे द्वारा किए गए परिश्रम और बर्बाद किए गए समय का कोई अर्थ नहीं होता, सब कुछ निरर्थक ही लगता है।
इस परम सत्य को जानते हुए भी हम अपने जीवन के बहुमूल्य वर्षो को यों ही गँवा दिया करते हैं और जब इन विषयों की हकीकत का पता चलता है तब इस बात का पछतावा होता है कि सहज उपलब्ध वस्तुओं या विषयों के लिए इतना लम्बा सफर तय करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी।
इसे हमारी बुद्धिमानी नहीं कहा जा सकता। दुनिया में जो व्यक्ति, वस्तु या विषय सहज उपलब्ध हैं, खरीदे जा सकते हैं उनके लिए समय बर्बाद करना किसी भी प्रकार से न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। चाहे फिर वे किसी भी प्रकार के भोग-विलास और आनंद के उपादान हों या फिर ऎसे कारक, जो आम हैं।

संसार में आने वाला हर इंसान अपने आपमें संप्रभु है और उसे चाहिए कि ऎसे काम करें कि आने वाली पीढ़ियां याद करें, स्वयं भी आनंद में रहे, उपलब्धियों के साथ जीये और दूसरों को भी आनंद देने का सामथ्र्य हो। ऎसा कुछ करें कि जो नया हो, दुनिया के लिए उल्लेखनीय हो।

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