Friday, 13 February 2015

छोड़ें काजल की कोठरियाँ

आलेख (13 फरवरी 2015 के लिए)
छोड़ें काजल की कोठरियाँ
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
इंसान का जीवन सकारात्मक और श्रेष्ठ कर्मों के लिए हुआ है और ऎसे में हम सभी का परम ध्येय समष्टि और व्यष्टि सभी के लिए उपादेयता भरे और लोकमंगलकारी रचनात्मक गतिविधियाँ ही हैं जिनके लिए जीवन भर कुछ न कुछ ऎसे प्रयास करते रहना चाहिए कि अपनी सर्जनात्मक शक्ति और प्रगतिकारी ऊर्जा का प्रवाह भी बना रहे और समाज, क्षेत्र तथा देश के हित में ऎसा कुछ हमेशा होता रहे जो उल्लेखनीय भी हो और उपयोगी भी। इस दृष्टि से वैयक्तिक प्रतिभाओं और बहुआयामी हुनर का इस्तेमाल समुदाय के लिए होना जरूरी है।
सकारात्मक चिंतन और निरन्तर वैकासिक प्रवाह में स्थान विशेष का अपना महत्त्व होता है। कुछ स्थान सदियों और युगों से अभिशप्त रहे होते हैं जबकि कई सारे क्षेत्र ऎसे भी होते हैं जहाँ नकारात्मक चिन्तन की भावभूमि जर्रे-जर्रे में विद्यमान रहती है और इस दृष्टि से उन स्थान विशेष व क्षेत्रों में रचनात्मकता का प्रवाह बना पाता संभव नहीं हो पाता है चाहे लाख कोशिशें की जाएं।
इसका यह अर्थ कदापि नहीं लिया जाना चाहिए कि हममें क्षमताओं और ऊर्जाओं का किसी भी प्रकार से कोई अभाव है। भरपूर सामथ्र्य होने के बावजूद कई सारे स्थान विशेष ऎसे ही होते हैं जहाँ न आदमी की प्रतिभाओं का कोई मूल्य होता है न ईमानदारी से किए जाने वाले किसी भी लोक कल्याणकारी या सामुदायिक विकास की गतिविधियों का।
इसके पीछे किसी को न तो नासमझ कहा जा सकता है, न अज्ञानी। दोष भूमि विशेष का होता है। जहाँ की भूमि अर्वाचीन काल से किसी न किसी प्रकार से शापित होती है, वहाँ अक्सर काम में मन नहीं लगने, अरुचि होने तथा मन-मस्तिष्क एवं शरीर में मलीनता का प्रवेश हो जाना स्वाभाविक ही है क्योंकि क्षेत्र विशेष की आबोहवा, पानी, अन्न आदि का सीधा प्रभाव दिल और दिमाग पर पड़ता ही है।
इस कुप्रभाव का परिणाम यह होता है कि सामने वालों को न इंसान में प्रतिभा नज़र आती है, न ईमानदारी से किया जाने वाला कोई सा कर्मयोग। फिर मलीन मन-मस्तिष्क वाले लोगों को किसी भी इंसान में अच्छाई कभी भी नज़र नहीं आ सकती क्योंकि उनकी सभी ज्ञानेन्दि्रयों पर मैले चश्मे चढ़े होते हैं, दिमाग में प्रदूषण भरा होता है तथा आभामण्डल नकारात्मक व अभिशप्त आबोहवा से रह-रहकर टकराता हुआ अपनी अस्मिता खो बैठता है।
यही कारण है कि दुनिया भर में आदर, सम्मान और श्रद्धा पाने वाले कर्मयोगी भी किसी अभिशप्त धरा पर आकर या तो उदासीन हो जाते हैं अथवा उनकी कोई कद्र नहीं हो पाती। फिर अभिशप्त स्थानों पर पहले से रहने वाले लोगों का संसर्ग पाकर बिगड़ जाने के खतरे भी हमेशा बने रहते हैं।
दुनिया में खूब सारे क्षेत्र किसी न किसी वजह से वैदिक और पौराणिक काल में अभिशप्त रहे हैं और इनके बारे में पुराणों और लोकगाथाओं में भरपूर जिक्र भी आता है।
इस स्थिति में किसी भी व्यक्ति को बुरा नहीं ठकराया जा सकता क्योंकि जो लोग श्रेष्ठ होते हैं उनका अपना शुभ्र इतिहास होता है जो उनके साथ चलता है। यों कहें कि उनके आगमन से पूर्व उनकी सुगंध आने लगती है।
ऎसे लोगों के भी अभिशप्त स्थलों में आ जाने में बाद व्यवहार और कर्म में परिवर्तन आ जाए तो उसके दो ही कारण होते हैं। या तो संगी साथियों का कुसंग अथवा उस भूमि विशेष के अन्न-जल का दुष्प्रभाव।
हममें से खूब सारे लोग जीवन में अक्सर ऎसा अनुभव करते ही रहते हैं। इसका यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि हम हमारे व्यक्तित्व, कर्म, व्यवहार या सिद्धान्तों के साथ कोई समझौता करने लग गए हैं। बल्कि स्थानिक प्रभाव ही कहा जाना चाहिए।
इस स्थिति में कोई भी क्षेत्र कितना ही समृद्ध क्यों न हो, उसे सायास त्याग देने में ही भला होता है। कभी भी अभिशप्त क्षेत्रों और शापित लोगों को सुधारने की गलती नहीं की जानी चाहिए। यह अपने आप में हमारी ऊर्जाओं और शक्तियों का सीधा क्षरण और समय की बरबादी ही है, इसका कोई प्रभाव सामने नहीं आने वाला।
  भारतीय परंपरा में इसीलिए स्पष्ट कहा गया है कि जहाँ जिस किसी क्षेत्र में अभिशाप हो, शापितों का निवास हो, सुकून का अभाव हो, उसे त्याग देने में ही भला है। इससे हम स्थान विशेष के अभिशाप से भी बचे रह सकते हैं और उन लोगों से भी दूर हो जाते हैं जो लोग शापित होने की वजह से मलीन मन और नकारात्मक चिंतन भरे दिमाग को ढोते हुए दिन काट रहे हैं।
व्यक्ति और स्थान के बीच यह संघर्ष सदियों से चला आ रहा है। कई बार भूमि भी अपनी ओर खिंचती है तथा भाग्य का फलन करती है। इसी प्रकार भाग्य और कर्म का संघर्ष भी निरन्तर बना रहता है।  लेकिन इन सभी  मिथकों के बीच यह तो निश्चित ही माना जाना चाहिए कि अपनी शुचिता के बरकरार रहते हुए, निरपेक्षता को अपनाए रखने  और निरन्तर कर्मयोग को अंगीकार करने के बावजूद यदि कहीं सुकून का अभाव रहता है तो इसका सीधा सा अर्थ यही निकाला जाना चाहिए कि यह उस स्थान विशेष की भूमि का दोष है जो किसी न किसी वजह से अभिशप्त है और यह उन लोगों के लिए ही अनुकूल है जो स्वयं भी किसी न किसी ग्रह-नक्षत्र या पूर्वजन्म के शाप के कारण वहाँ बने हुए हैं।
अभिशप्त स्थान अपने आप में काजल की कोठरियों से कम नहीं हैं जहाँ विघ्नसंतोषियों की भरमार रहती है, नकारात्मक चिंतन और एक-दूसरे की पीठ में छुरा भौंकने, किसी न किसी प्रकार से लोगों का नुकसान करने और चोट पहुँचाने की भावनाएं हावी होती हैं।
यह स्थितियां इस बात को स्पष्ट करती हैं कि धरा का पुरातन अभिशाप अभी बरकरार है। तरक्की या आत्म आनंद चाहें तो इन अभिशप्त स्थानों को तन-मन से त्याग दें। इसे न दीनता या पलायन की बजाय विवेक कहा जाना ज्यादा उपयुक्त है। ऎसा करने मात्र से हमारी जिन्दगी में आया ठहराव समाप्त हो जाता है और तरक्की की गति तीव्रतर होने लगती है।

यह ऎसा सत्य है जिसे अपना लेने पर जीवन के सारे सुकून अपनी ओर आकर्षित होने लगते हैं और जीने का महा आनंद हमेशा बना रहकर यश, कीर्ति और ऎश्वर्य प्रदान करने लगता है।

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