आलेख ( 14 फरवरी 2015 के लिए)
हर क्षण बरसता रहे
प्यार ही प्यार
- डॉ. दीपक आचार्य
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आज 14 फरवरी है। वेलेंटाईन डे के नाम से दुनिया भर में धूम है। अपने यहाँ
भी। पाश्चात्यों में प्रकृति के परिवर्तन
से लेकर जीवन का हर कर्म और भावनाएं, रिश्ते-नाते और व्यवहार
के लिए कोई न कोई दिन निश्चित किया गया है जहाँ पूरे साल भर की उन संबंधों से भरी
भावनाओं और विषयों का घनीभूत स्वरूप किसी ज्वार की तरह पसर जाता है, धूमधड़ाके के साथ दिन और रात गुजार लिये जाते हैं, फिर
अगले दिन से साल भर के लिए उसे याद करने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।
वहाँ संबंधों की बुनियाद दिल
से कहीं अधिक दिमाग और अपनी अनुकूलताओं से जुड़ी है, संबंधों का
व्यवसायिक धरातल है जो सम सामयिक हलचलों के सिवा आगे की कभी नहीं सोचता। संवेदनाओं का जुड़ाव एक निश्चित समयावधि के
दायरे में बंधा हुआ है जहां अवसर आने पर सभी प्रकार इज़हार हो जाता है, फिर उसका कोई चिह्न बाद में ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलता।
आजकल सभी स्थानों पर दो तरह की
धाराएं चल रही हैं। भोगवादी पाश्चात्य मनोवृत्तियां शरीर को प्रधान मानकर चल रही
हैं और उनकी सोच शरीर के आनंद के साथ ही समाप्त हो जाती हैं। भारतीय मनीषा में
आत्मा के संबंधों को तवज्जो दी जाती है जहाँ शरीर और उससे जुड़े तमाम सुख माध्यम हो
सकते हैं, लक्ष्य कभी नहीं।
दोनों प्रकार के संघर्ष में
खूब सारे लोग अपने-अपने मतलब और स्वार्थों तथा आनंद की प्राप्ति के लिए मनमर्जी से
सभी को स्वीकार कर लिया करते हैं। एक धारा पाश्चात्यों के करीब हैं जबकि दूसरी
धारा भारतीय संस्कृति की जड़ों से संतृप्त होकर बहती रही है।
वेलेंटाईन डे का सीधा संबंध
प्रेम और इसके भावपूर्ण इज़हार से है जहां दो ध्रुव परस्पर मिलकर एक-दूसरे के प्रति
सुदीर्घ प्रेम की अभिव्यक्त करते हैं और इस पर सार्वजनीन या वैयक्तिक मोहर लगने
लगती है।
साल भर में बहुत सारे डे आते
हैें जो वैश्विक माहौल में अपने आपको जिंदा रखे हुए हैं। इन्हीं मेंं वेलेन्टाईन
डे भी है जिसके प्रति उन सभी लोगों की श्रद्धा है जिनका विश्वास प्रेम में रहा है
अथवा पाना चाहते हैं। बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो इस दिन को अपने हक में
भुनाने भर के लिए माहौल के साथ खड़े हो जाते हैं।
खूब सारे ऎसे हैं जो प्रेम में
विफलता या धोखा खा जाने के कारण इसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। और बहुत से ऎसे
हैं जो भारतीय संस्कृति और परंपराओं का मर्म समझते हैं और इन्हें पता है कि
भोगवादी पाश्चात्यों का कुप्रभाव कितना आत्मघाती है। इसलिए वे विरोध करते हैं।
वेलेंटाईन डे का समर्थन या
विरोध जिन्हें करना है वे करते रहें। यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न इस बात का है कि प्रेम
या इसका इज़हार सिर्फ एक दिन की बात ही क्यों रहे, यह एक दिन तक
सिमटा क्यों रहे। एक दिन की आयु पाने वाला वेलेंटाईन डे साल भर तक प्रेम की सुगंध को कैसे बरकरार रख सकता
है जबकि प्रेम तत्व हर क्षण से जुड़ा हुआ होना चाहिए। इसे किसी दिन या घण्टों में
बांधना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
सृष्टि में प्रेम तत्व हर पल
पूरे वेेग के साथ बहता रहना चाहिए। यह प्रेम किसी दैहिक संबंधों का नाम नहीं है
बल्कि हमारी आत्मा से जुड़ा प्रत्येक तत्व, व्यक्ति, विषय और स्थान प्रेम धाराओं से सिक्त होना
चाहिए। पर साल भर हम प्रेम न दे पाते हैं, न ले पाते हैं।
हम जिसे प्रेम कहते हैं
वस्तुतः वह दैहिक संबंधों, लाईफ मैनेजमेंट के फण्डों या कि नफे-नुकसान के
संबंधों का पर्याय होकर रह गया है जहाँ हमारा प्रेम तभी तक बरकरार रहता है जब तक
हमारा कोई न कोई मकसद या स्वार्थ पूरा नहीं हो जाता। फिर इसके लिए वेलेंटाईन डे
जैसे मौके अभिव्यक्ति को परिपुष्ट करने का अवसर प्रदान करते हैं।
हर संबंध प्रेम से भरा होना
चाहिए तभी इसमें ताजगी और सुगंध बनी रह सकती है।
एक दिन पर््रेम का इजहार कर दिया जाए, और साल भर तक हमारे
दिलों में प्रेम की ज्योत की बजाय स्वार्थ और लाभ-हानि के समीकरणों का गणित चलता
रहे, इसे प्रेम नहीं कहा जा सकता। फिर प्रेम अपने आपके
परिपूर्ण है। किसी एक से प्रेम होने का अर्थ उसी से प्रेम नहीं होता बल्कि जो लोग
सच्चे अर्थों में प्रेम करते हैं वे सृष्टि के हर प्राणी, स्थान
और परिवेश से प्रेम करने वाले होते हैं। यदि ऎसा है तभी प्रेम वास्तविक है,
अन्यथा हम किसी एक से प्रेम करें और दूसरों से नफरत करने लगें,
औरों के प्रति उदासीन और प्रतिशोधात्मक रवैये का परिचय दें, उसे प्रे्रम की संज्ञा नहीं दी सकती। वहाँ सिर्फ दैहिक भोग और किसी न किसी
प्राप्ति का छिपा हुआ एजेण्डा ही होता है।
इस प्रकार का प्रेम अपने आपमें
कृत्रिम और दोहरे चरित्र का आभास कराता है और ऎसा प्रे्रम समय पाकर मुरझा जाता है।
पर््रेम सिर्फ एक दिन का विषय नहीं है।
जीवन का हर क्षण प्रेम से सराबोर होना चाहिए। प्रेम सिर्फ
प्रेमी-पर््रेमिका के संबंधों तक ही सीमित नहीं है बल्कि हमारे माता-पिता, भाई-बहन, गुरु, शिष्य और हमारे
साथ काम करने वाले सहकर्मियों से लेकर उन सभी के प्रति होना चाहिए जिनके साथ हम
रहते हैं, जिनसे हमारा व्यवहार है।
जिस इंसान के भीतर जितना अधिक
प्रेम तत्व होता है वह उतना ही अधिक संवेदनशील, उदार और मस्त होता
है। पिण्ड से जो सच्चा प्रेम करता है वह समूचे ब्रह्माण्ड से पर््रेम करने वाला
होता है। प्रेम सभी को मुक्त करता है, बांधता कभी नहीं। जो
प्रेम आदमी को बांधकर कुछ देहों तक सीमित कर दे, वह पर््रेम
न होकर वासना है और जो लोग ऎसा करते हैं वे जीवन में भले ही प्रेम की कैसी भी
महानतम व्याख्या क्यों न कर डालें, कितने ही कुछ व्याख्यान
क्यों न दे डालें, कितना ही कुछ लिख क्यों न डालेंं, वे पर््रेम की एबीसीडी भी नहीं जान सकते हैं और पर््रेम के अनुभवों से
वंचित रहते हुए ही अन्ततोगत्वा सिधार जाते हैं।
कर्म, व्यवहार और जीवन निर्माण की धाराओं को इस प्रकार बनाएं कि पर््रेम या
प्रेम का इजहार करने के लिए साल भर में एक बार किसी वेलेंटाईन डे की प्रतीक्षा
नहीं करनी पड़े बल्कि हर दिन वेलेंटाईन डे हो, हर दिन मोहब्बत
का पैगाम देने वाला हो और प्यार बाँटने वाला भी।
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