Wednesday, 11 February 2015

समझें नियति के संकेत

आलेख ( 11 फरवरी 2015 के लिए)
समझें नियति के संकेत
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक की कोई सी गतिविधि हो, घटित होने से पहले प्रकृति कम से कम तीन बार उसका सांकेतिक अहसास किसी न किसी प्रकार से हमें कराती ही है और संभलने का वक्त देती ही है, इसके बाद ही परिवर्तन की शुरूआत होती है।
प्रकृति या विधाता कोई सी अच्छी-बुरी घटना हो, इसे अपने पर नहीं लेते बल्कि उसके लिए उन्हें ही जिम्मेदार मानने का अवसर प्रदान करते हैं जिनसे यह परिवर्तन संबंधित होता है।
प्रकृति में होने वाले मौसमी परिवर्तन हों चाहे किसी भी प्रकार के हों। कोई से भौगोलिक, स्वाभाविक या अस्वाभाविक, सामान्य या असाधारण परिवर्तन हों।
हर मामले में घटना-दुर्घटना या परिवर्तन से पहले आभास हो ही जाता है। यह अलग बात है कि हम उसका अहसास नहीं कर पाते अथवा संकेतों को समझ पाने का माद्दा पैदा नहीं कर पाते।
आमतौर पर होता यह है कि हम संकेतों की अवहेलना कर दिया करते हैं और आभासों के प्रति उपेक्षा का भाव दर्शाते हुए उदासीन बने रहते हैं।  इसके बाद प्रकृति या विधाता का कोई दोष नहीं होता, वे अपना काम नियत समय पर कर ही डालते हैं और यह काम ऎसा है जो कि किसी भी प्रकार से टलने वाला नहीं है, अवश्यंभावी ही है।
कई बार यह संकेत कभी स्वप्न के रूप में सामने आते हैं, कभी शगुन के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। इसी प्रकार मन, मस्तिष्क और शरीर के धरातल पर भी ये संकेत किसी न किसी रूप में सामने आते ही हैं।
हममें से अधिकतर लोग इन संकेतों को समझने की या तो कोशिश ही नहीं करते अथवा अनसुना कर दिया करते हैं। कई बार जब  पितर या ईश्वरीय शक्तियाँ हम पर  किसी वजह से अधिक मेहरबान होती हैं तब  वे बार-बार किसी न किसी उपाय से हमें सतर्क करती हैं अथवा स्पष्ट संकेत देने का प्रयास करती हैं।
इसके बावजूद हम न समझ पाएं तो इसका सीधा सा अर्थ यही है कि जो होने वाला है वह हमारे प्रबल भाग्य की निशानी है और इसी वजह से हम संकेतों को समझ पाने का विवेक हमारे भीतर पैदा नहीं कर पाए हैं।
जीवन की खूब सारी घटनाएं और दुर्घटनाएं ऎसी होती हैं जो घटित तो हो सकती हैं मगर अपने ज्ञान और विवेक से इनका समय पर निराकरण किया जा सकता है। इस दृष्टि से विधाता का विधान कुछ लचीला ही होता है।  जो होना होता है वह होकर ही रहता है लेकिन अपनी बुद्धि और विवेक से हम अच्छे प्रभाव के घनत्व में अभिवृद्धि कर सकते हैं और बुरे प्रभाव के अनिष्ट को कम जरूर किया जा सकता है।
इस लिहाज से संकेतों का महत्त्व स्वयंसिद्ध है। भविष्य को जानने की जिज्ञासा और ज्योतिषीय या आध्यात्मिक उपायों को इसीलिए लोक जीवन में युगों-युगों से अहम स्थान प्राप्त है। इससे भावी को अपने अनुकूल बनाने के उपायों को अमल में लाया जा सकता है या इसके लिए समय से पूर्व अपने आपको तैयार किया जा सकता है।
कोई प्राणी ऎसा नहीं होता जिस तक इन संकेतों की प्राप्ति नहीं होती है। दूसरे प्राणियों के पास इन संकेतों के अनुरूप कुछ करने या न करने के लिए कोई अवसर नहीं होता लेकिन मनुष्य को भगवान ने बुद्धि दी है और वह इसका भरपूर उपयोग करने के लिए स्वतंत्र भी है।
अब हम कोई ध्यान ही न दें, हर संकेत की उपेक्षा करते रहें, तो इसके लिए किसी के पास कोई चारा नहीं है। कोई इंसान यह नहीं कह सकता कि उस तक किसी प्रकार के संकेत नहीं पहुंचे अथवा पूर्वाभास नहीं हो पाया।  
बात पूर्वाभास या संकेतों की ही क्यों करें, जिन विषयों और वस्तुओं को इंसान की जिन्दगी के लिए वज्र्य या हीन कहा गया है उसे भी हम सहर्ष स्वीकारते हैं और आनंद पाते हैं जबकि यह किसी भी प्रकार से हमारे जीवन के लिए उपयोग नहीं कहे जा सकते।
सब कुछ ज्ञान होते हुए भी हम इन बुराइयों को स्वीकार कर ही रहे हैं। यह हमारी अज्ञानता और विवेकहीनता ही कही जा सकती है। जो दृश्यमान और अनुभवातीत है उसी की हम उपेक्षा करने लगते हैं फिर उन विषयों के बारे में चर्चाएं फिजूल ही हैं जिन्हें हम संकेत मानते हैं।
हर संकेत हमारे जीवन के लिए प्रेरणादायी और सकारात्मक परिवर्तन लाने वाला होता है। हमें चाहिए कि जो भी परा संकेत हैं उन पर ध्यान दें तथा उसी के अनुरूप जीवनयात्रा में बदलाव लाने के लिए हमेशा सचेष्ट रहें।
किसी भी संकेत की किसी भी स्तर पर अवहेलना न करें क्योंकि जो संकेत आज हमारी कल्पनाओं में सूक्ष्म रूप में हैं वे किसी न किसी दिन निश्चित रूप से स्थूल रूप में आकार प्राप्त करने वाले हैं ही।

हर संकेत आने वाले समय का चेहरा होता है इसलिए जीवन में किसी न किसी रूप में हम तक पहुंचने वाले प्रत्येक संकेत के प्रति गंभीरता बरतें और अपने भीतर वह क्षमता विकसित करें कि नियति और प्रकृति से आने वाली हर तरंग बिना किसी बाधा के हम तक पहुंचे और हमें समय-समय पर सचेष्ट करती रहे।

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