आलेख ( 22 फरवरी 2015 के लिए)
कामचलाऊ न बने रहें
वरना बुढ़ापा बिगड़ेगा
- डॉ. दीपक आचार्य
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इतिहास में वे लोग अमर होते
हैं जो समाज और देश के लिए कुछ नया और ऎसा उल्लेखनीय करते हैं कि उन्हें बाद में
अर्से तक याद किया जाता है। जबकि अधिकांश लोग हमारी ही तरह उदासीन या कामचलाऊ ही
होते हैं जो पूरी जिन्दगी कुछ नया नहीं कर पाते हैं।
पुरानी फाईलों, परंपराओं और रूढ़ियों पर चलते हुए तरह-तरह के जुगाड़ी दिमाग का इस्तेमाल
करके काम निकालते हैं और धक्कागाड़ी की तरह चलते-चलाते हुए समय गुजार देते हैं। ऎसे
लोगों को समय के साथ ही भुला दिया जाता है।
आजकल हर तरह के बाड़ों और
गलियारों में काम करने वालों की बजाय कामों को एक-दूसरे की ओर खो कर देने वाले और
कामचलाऊ लोगों की भरमार है। इसका मूल कारण यह भी है कि खूब सारे लोग जीवन निर्माण
की प्रतिस्पर्धा से अनभिज्ञ हैं और उन्हें अपने स्थान बनाने के लिए कहीं कोई
संघर्ष नहीं करना पड़ा है इसलिए वे जमाने की हरकतों और जमीनी हकीकत से काफी दूर
हैं।
दूसरी किस्म उन लोगों की है
जिन्हें बिना कुछ मेहनत किए अपने पुरखों की शहादत पर अनुकंपात्मक कुर्सियाँ मिल गई
हैं और इस कारण से इनका पूरा जीवन कामचलाऊ और धकाऊ से अधिक कुछ नहीं हो पाया है।
इसी प्रकार खूब सारे ऎसे भी
हैं जिन्हें किसी न किसी की हरसंभव और यथायोग्य सेवा-चाकरी और समर्पण का पुरस्कार
मिल चुका है और इस वजह से इनके लिए जीवन भर का एक ही मकसद रह गया है और वह है जैसे-तैसे समय गुजारना और कामचलाऊ बने रहकर
द्रष्टा भाव से उदासीनता ओढ़ कर उन लोगों के मजे लेना जो बेचारे संस्थानों और
राज-काज के प्रति वफादार बने रहकर दिन-रात काम करते हैं।
असल में देखा जाए तो जो कुछ चल
रहा है उसके लिए कुछ कर्मयोगी ही जिम्मेदार हैं जो अपने कत्र्तव्य को समाजसेवा और
राष्ट्रीय कत्र्तव्य मानकर चल रहे हैं, अन्यथा क्या से क्या
हो जाए, इस बात को सभी तहेदिल से स्वीकार करते हैं, सार्वजनिक तौर पर कहने का साहस भले ही वे नहीं जुटा पाएं।
ऎसे दासत्व और नालायकियों के
सहारे जी रहे लोग सौ जन्मों में भी सच बोलने का साहस नहीं कर पाते हैं। इन लोगों
के खून में गुलामी के कतरे हैं। जो लोग याचकों की तरह जीते हैं, औरों की दया और कृपा पर जिन्दा हैं तथा जिनका पूरा जीवन ही दूसरों के
भरोसे चलता रहता है, ऎसे पराश्रित लोग ताजिन्दगी परजीवियों
की तरह रहते हैं और अपना अस्तित्व भुला बैठते हैं।
हममें से कितने लोग हैं जो
ईमानदारी से इस सत्य को स्वीकार करने का साहस रखते हैं कि हम न तो अपने फर्ज के
प्रति ईमानदार हैं, न संस्थान, समाज या देश के
प्रति। बल्कि हमें उस रकम से मतलब रह गया है जो महीने में एक बार हमारे खाते में
जमा हो जाती है, हमें उस धन और भोग-विलासिता तथा संसाधनों से
ही सरोकार रह गया है जो हमारे प्रभाव से अतिरिक्त रूप से प्राप्त होता है और जिसके
लिए हम सायास प्रयत्न करने की तलब के शिकार हैं। हमें बिगाड़ने वाले हमारी ही तरह
के खूब लोग हैं जिनकी शक्ल देखकर ही अंदाज लगाया जा सकता है कि ये गलती से इंसान
बन गए हैं।
हममें से कोई बिरले ही होंगे
जो ईश्वर को हाजिर-नाजिर रखकर पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकने की स्थिति में हैं
कि हम जितना पा रहे हैं उतना या उसका आधा ही सही, काम करके दिखा
रहे हैं, अपने कत्र्तव्य कर्म, समाज और
देश के प्रति फर्ज को अच्छी तरह निभा पा रहे हैं।
जो फर्ज निभाने के प्रति
समर्पित हैं उनके प्रति आदर-सम्मान और श्रद्धा अभिव्यक्त की ही जानी चाहिए। लेकिन
हम जैसे लोगों को क्या कहा जाए जो कि मिनटों के काम घण्टों, दिनों और महीनों तक नहीं करते। कामों को कल ही कल पर टालते चले जाना,
कामों से जी चुराना और मामूली कामों के लिए भी दिन-महीने-साल गुजार
देना यही बताता है कि हम सब कामचलाऊ, टालू और कामढालू से ज्यादा
कुछ नहीं हैं और हमारे भरोसे भारत माता की सेवा की सारी उम्मीदें व्यर्थ हैं। हमें
तो भारतमाता की जय बोलने तक का कोई अधिकार नहीं है।
यह तो गनीमत है कि हमें
अंदरूनी बाड़ों और गलियारों का ही काम मिला है, देश की सरहदों का
जिम्मा होता तो शायद अब तक हमारे कहे जाने लायक न समाज होता , न बाड़े और गलियारे होते और न हमें कोई देशभक्ति के लिए कहने वाला होता।
हर क्षेत्र में निरन्तर
परिवर्तन के दौर चलते रहते हैं। नये लोग आते हैं। उनके प्रति जनमानस में यह
उम्मीदेंं होती हैं कि कुछ कर गुजरने का माद्दा लेकर आए हैं। लेकिन थोड़े दिन
धामधीम और अपनी छवि चमकाने के लिए जोश और होश दोनों का झंझावात पैदा करते हैं और
फिर लहू ठण्डा पड़ जाता है। जाने किन शहदियों छत्तों पर मुग्ध होकर पुरानों की लीक
पर ही चलने लगते हैं।
आजकल नया जोश नौ दिन या नौ माह
से अधिक नहीं रहता। दोष किसे दें, हमारे खून में ही ठण्डक आ गई,
कुछ करना हम चाहते ही नहीं।
हमें अब हमारे फर्ज से कहीं अधिक मतलब प्राप्ति के लक्ष्य की तरफ हो गया है
और इस लक्ष्य के आगे हमारे कर्म, फर्ज और धर्म सब कुछ स्वाहा
होते चले जा रहे हैं।
लगता है कि वह बीज खत्म हो गया
है जो समाज और देश के लिए निरन्तर उत्साह और उल्लास के साथ ऎसा कुछ माहौल बनाता था
कि हर तरफ कर्मयोग की धाराओं से कोई न कोई सुनहरा बिम्ब ऎसा दिखने लगता था कि समाज
और देश कुछ आगे बढ़ता दिखाई देता था।
समाज जीवन और कर्मयोग के चाहे
जिस किसी क्षेत्र में हम हैं, थोड़ी फुरसत निकालें और गंभीरता
से सोचें कि हम समाज या देश के लिए क्या कुछ नया कर पा रहे हैं। हम कितना समय अपने लिए निकाल रहे हैं, कितना समय अपनी निर्धारित ड्यूटी के लिए, और कितना
समय समाज व देश के लिए निकाल पा रहे हैं।
अपनी आत्मा की आवाज को सुनने
का प्रयास करें और फिर तय करें कि हम कितने पानी में हैं। आत्मा की आवाज सुनकर
प्रसन्नता और आत्मतुष्टि हो, तब तो मानें कि जीवन और कर्म दोनों सफल हैं। और
आत्मा की आवाज सुनकर पछतावा हो, ग्लानि का अनुभव हो तब यह
मान कर चलें कि हम कामचलाऊ ही बने रहे, अभी नहीं सुधरे तो
हमने जो हरामखोरी की है, बिना मेहनत के तनख्वाह या मेहनताना
लिया है, उसकी एक-एक पाई निकलने वाली है।
अभी तो बंधी-बध्ांायी रकम और
बैंक बेलेंस, ऎशो आराम तथा भोग-विलासिता के साधन और व्यक्ति,
आलीशान बंगले और एयरकण्डीशण्ड वाहनों का सुख हम भोग रहे हैं लेकिन
गरीबों और जरूरतमन्दों की बददुआओं और हमारे निकम्मेपन से पैदा हुई नकारात्मक
ऊर्जाएं एक न एक दिन परमाण्वीय पुंज के रूप में हमारे सामने होंगी और बरबादी का
ऎसा मंजर दिखाएंगी कि हमारे होश फाख्ता हो जाने वाले हैं।
जो कुछ खोटे कर्म किए हैं, निकम्मापन दर्शाया है, हराम का पैसा लिया है,
लोगों को तंग किया है, समाज और देश का नुकसान
किया है, उसका हिसाब यहीं होने वाला है। भगवान के घर देर है,
अंधेर नहीं। जीवन का उत्तराद्र्ध सारा हिसाब करके ही पूरा होगा। समय
की प्रतीक्षा करें।