आलेख ( 10 फरवरी 2015 के लिए)
पहले
कर्म, फिर मनोरंजन
-
डॉ. दीपक आचार्य
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dr.deepakaacharya@gmail.com
मनुष्य के रूप
में सफलता और आनंद पाने का एक मात्र मार्ग यही है कि पहले सारे कत्र्तव्य कर्म पूर्ण
कर लिए जाएं, फिर आनंद प्राप्ति के जतन।
यों देखा जाए
तो जो लोग पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अपने कत्र्तव्य कर्म को पूर्ण कर लिया करते हैं
उनके भीतर अपने आप आनंद भाव प्रतिष्ठित रहने लगता है क्योंकि जो आनंद स्व-कर्म में
आता है वह आनंद किसी बाहरी कारक से कभी आ ही नहीं सकता।
कर्म की परिपूर्णता
के आनंद के आगे दुनिया के समस्त आनंद गौण हैं और उनका कोई अस्तित्व नहीं हुआ करता।
आजकल मनोरंजन के खूब सारे संसाधनों और भोग-विलास के लिए सहज उपलब्ध लोगों की इतनी बड़ी
संख्या के बावजूद इसलिए आनंद की प्राप्ति नहीं हो पा रही है क्योंकि उन लोगों का एकमेव
मकसद आनंद पाना ही है चाहे वह किसी भी माध्यम से आए। और इस आनंद प्राप्ति के फेर में
ये लोग कर्तव्य कर्म को गौण मानने लग जाते हैं,
या इनके प्रति पूरी तरह उदासीन होकर रह जाते हैंं।
यही कारण है
कि कर्म को जो लोग गौण मानते हैं उन्हें अपने सम्पूर्ण जीवन में कभी आनंद की प्राप्ति
नहीं हो सकती। चाहे वे कितने ही सारे बड़े, वैभवशाली और महान लोगों के सहारे आनंद पाने
की दिन-रात कोशिशें करते रहें अथवा उन्मुक्त भोग-विलास से जुड़े तमाम प्रकार के साधनों-संसाधनों
और उपकरणों को ही क्यों न प्राप्त कर लें।
कर्महीन तथा
कर्म को द्वितीयक श्रेणी का मानने वाले लोगों के जीवन से आनंद हमेशा दूर ही रहता है
और ऎसे लोगों को मरते दम तक भी उस आनंद, तृप्ति या आत्मसंतुष्टि की प्राप्ति नहीं हो
पाती है जो इच्छित या अपेक्षित होता है।
ऎसे लोग खूब
सारे लोगों, संसाधनों और सुकूनदायी माहौल होने के बावजूद आनंद से दूर रहते हैं और एक
अजीब तरह की कमी इनके जीवन में हमेशा बनी रहती है जिसकी वजह से ये लोग कभी भी भीतर से न तो प्रसन्न रह सकते हैं और न ही औरों को प्रसन्नता दे सकते हैं।
बल्कि ऎसे लोग
जिन्दगी भर अन्दरूनी तनावों और चिड़चिड़ेपन में ही जीते हैं। एक समय बाद ये लोग इस स्थिति
में आ जाते हैं कि न कोई समझ पाते हैं, न इन्हें कोई समझा पाता है। इसका मूल कारण यही है कि आनंद पाने की जी तोड़ कोशिशें
करने और इसके लिए कई सारे मेल-बेमेल समझौतों के बावजूद इन्हें वह प्राप्त नहीं होता
है जो इनके अवचेतन में कल्पनाओं के रूप में संग्रहीत होता है।
यही कारण है
कि दुनिया में खूब सारे लोग ऎसे हैं जो कि सारे जतन करने और हर तरह के लोगों से सम्पर्क,
संसर्ग और निरन्तर मेल-मिलाप के बावजूद खिन्न रहते हैं और वास्तविक प्रेम या आनंद का
अभाव इनके चेहरे से हमेशा पढ़ा जा सकता है।
मनोरंजन हर इंसान
की तासीर है और यह सभी को इच्छित होता है। इससे जीवन निर्वाह के लिए मन-मस्तिष्क और
शरीर को ताजगी भी मिलती है और आनंद भी आता है। यही आनंद हमारे जीवन के तमाम कर्मों
का मूलाधार भी है लेकिन इस मनोरंजन के लिए कत्र्तव्य कर्म को गौण मानकर मनोरंजन को
ही जीवन में प्राथमिकता और प्रधानता देना इंसान की वो सबसे बड़ी भूल कही जा सकती है
जो देर सबेर आत्मघाती स्वरूप में ही सामने आती है और इससे अन्ततोगत्वा ऎसी स्थितियां
पैदा हो जाती हैं कि आदमी के लिए उपलब्ध सभी प्रकार के मनोरंजन भी छीन लिये जाते हैं
और कर्म भी।
इससे जीवन में
किसी न किसी मोड पर आकर गाड़ी अटक ही जाती है और फिर ऎसा स्पीड़ बे्रेकर आ जाता है कि
जिससे न आगे जाया जा सकता है, न पीछे। एक बार
जब इंसान के लिए मनोरंजन ही जीवन का लक्ष्य हो जाता है तब उसे मनोरंजन के लिए व्यक्तियों,
समूहों अथवा खान-पान एवं भोग-विलास के संसाधनों की जबर्दस्त तलब हमेशा बनी रहती है
और यह सब स्थितियाँ उसके लिए नशे की तरह हो जाया करती हैं।
इस स्थिति में
वह इन्हें पाने के लिए व्याकुल बना रहता है और जब इसके लिए सहज में समय उपलब्ध नहीं
हो पाता है अथवा कोई न कोई बाधा आ जाती है तब वह झूठ-फरेब और बहानों का सहारा लेने
लगता है और फिर एक पर एक झूठ बोलते हुए पूरी जिन्दगी उसके लिए झूठ से परिपूर्ण हो जाती
है।
झूठ और बहाने
भी ऎसे-ऎसे कि किसी को यकीन तक नहीं हो पाता कि यह बहाना भर होगा। हर कोई इन बहानों
को सच मानकर मानवीय संवेदनाओं और करुणा में भर ही आता है।
इस स्थिति में
चाहे दोनों पक्ष अपने-अपने हिसाब से कोई न कोई बहाने भले ही बनाते रहें, मगर ईश्वर
की निगाह दिन-रात इन पर लगी होती है। फिर कोई देखे या अनुभव करे न करे, अपनी आत्मा
तो हमारे द्वारा कहे जाने वाले झूठ को अच्छी तरह जानती-समझती है और सच्चाई परखती ही
है।
कई बार मनोरंजन
मात्र के लिए हमारे मुँह से निकलने वाला झूठ भी योगमाया से किसी घड़ी में सही हो जाता
है और तब हमें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। लेकिन हम हैं कि कभी यह नहीं लगता
कि हमें झूठ नहीं बोलना चाहिए, यह कभी आत्मघाती भी हो सकता है।
मनोरंजन का आनंद
मात्र लेने के लिए खूब सारे लोग अपने आत्मीय किसी की भी गंभीर या बीमारी का बहाना बनाते
हैं और कभी कुछ। इनके पास बहानों की कोई कमी नहीं होती। दस जनम भी ले लें तो नए-नए
बहाने तैयार मिलेंगे।
इन सबके बावजूद
सच यही है कि हमें मनोरंजन का शाश्वत आनंद पाना हो तो उसके लिए यह जरूरी है कि जीवन
में मन-वचन और कर्म में शुचिता रखें, पहले कत्र्तव्य कर्म पर ध्यान दें, और उसकी पूर्णता
के बाद ही मनोरंजन की ओर उन्मुख हों।
ऎसा नहीें कर
पाएं तो जीवन में आनंद पाने की कल्पना कभी न करें चाहे अपने पास मनोरंजन और भोग-विलास
के लिए कितने ही परिपुष्ट व समृद्ध व्यक्ति, वस्तुएं हों या फिर संसाधन उपलब्ध क्यों
न हों।
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