Wednesday, 18 February 2015

गर्व से स्वीकारो हम सब टाईमपास हैं

आलेख ( 18 फरवरी 2015 के लिए)
गर्व से स्वीकारो
हम सब टाईमपास हैं
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
कहने और सुनने में भले ही हमें यह बुरा लगे लेकिन ईमानदारी और थोड़ी सी गंभीरता से अपने बारे में सोचें तो यह सच्चाई अपने आप मुखर होने लगेगी कि हम सारे के सारे टाईमपास होते जा रहे हैं।
कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो हममें से बहुसंख्य लोग अपनी आयु का एक-एक दिन व्यर्थ गँवाते ही जा रहे हैं। पिछले कई वर्षों से हमने संस्कारों, सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी तमाम परंपराओं को भुला दिया है और उम्र के बहुत सारे पिछले पड़ावों में हमारी कोई उपलब्धि तक सामने नहीं आ पायी है।
दूसरे लोगों की तरह हम भरपूर समय होने के बावजूद कुछ कर नहीं पा रहे हैं। हम सभी को इस बात का मलाल भी रह रहकर होता है कि कुछ हो नहीं पा रहा। इसके लिए हमारे पास समय नहीं मिलने का कालजयी बहाना बचपन से ही स्वीकारा हुआ है, जिसके आगे दूसरे सारे बहाने गौण हैं।
पिछले कई वर्षों से बहुत से लोग इसी बहाने के सहारे टाईम पास करते हुए बिना कुछ किए चले गए, अब हम भी लाईन में लगे ही हुए हैं, पता नहीं कब गुड़क जाएं।
हमारे पास तमाम इन्दि्रयों को प्रसन्न रखने के लिए सारे इंतजामों के लिए समय है, अस्त-व्यस्त हो चली दिनचर्या के लिए समय है, लूट-खसोट, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, पद के दुरुपयोग, गपियाने, चुगली और निंदा में घण्टों बिता देने का समय है, फालतू पाटों और पेढ़ियों पर बैठकर अनर्गल चर्चाओं के लिए समय है, दिन-रात में कई-कई बार जरूरी काम-धाम छोड़कर चाय की चुस्कियों और कचोरी-समोसे, ब्रेड़-पकौड़ों की तलब पूरी करने के लिए समय है, लेकिन उन कामों के लिए जरा भी फुरसत नहीं है जो हमारे जिम्मे हैं।
हम सारे के सारे लोग भारतमाता की जय, वन्दे मातरम और दूसरे सारे जयघोष लगाते हैं लेकिन न अपने समुदाय या क्षेत्र के लिए उपयोगी बन पाए हैं, न देश के लिए।
हम जो कुछ कमा-खा-पी रहे हैं, मौज-शौक कर रहे हैं, उसमें प्राणियों की दूसरी प्रजातियां भी माहिर हैं और वे भी इनका भरपूर आनंद उठा रही हैं। और हम भी उसी दौड़ में शामिल हो गए हैं। उन प्रजातियों से हम अपने आपको कहाँ अलग देख पा रहे हैं।
हमारा पूरा जीवन चंद लोगों और हमारे संसाधनों से लेकर धन-सम्पत्ति जमा करने में ही लगा हुआ है, जहाँ इसी निन्यानवे के फेर में पड़े रहकर हमें कुछ सूझ पड़ ही नहीं पाती कि हमारी और भी जिम्मेदारियां हैं।
जिस मिट्टी में हम पैदा हुए हैं, जहाँ का खान-पान कर रहे हैं, जिस समाज और देश में रह रहे हैं, उसके प्रति भी हमारे दायित्व हैं और इन्हें हमें ही पूरा करना है।
जिस भारत माता की जय हम साल में सैकड़ों बार चाहे-अनचाहे बोलते रहे है। उस भारतमाता के प्रति भी हमारे फर्ज हैं जिन्हें हमें ही निभाना है। आज तो हम जननी, जन्मभूमि, पिता, गुरु, समाज और अपने बंधुओं-भगिनियों के प्रति एकदम बेपरवाह ही बने हुए हैं।
हमें उन लोगों के काम करने और मदद देने में भी नालायकी सूझती है जो लोग हमारे आस-पास रहते हैं, साथ काम करते हैं और जिन लोगों को हमसे अपेक्षाएं हैं। और तो और हम अपनी ड्यूटी भी ढंग से नहीं कर पा रहे हैं। यह अपने आप में राष्ट्रद्रोह से कम नहीं है।
जो कुछ करना चाहते हैं वह खुद ही खुद के लिए या अपनी ही किस्म के खुदगर्जों के अलग-अलग किस्मों के समूहों के लिए।  इन समूहों को गिरोह की संज्ञा देना ज्यादा उपयुक्त होगा। हम राष्ट्रीय चरित्र, राष्ट्रवाद, सार्वजनिक जीवन में शुचिता, संवेदनशीलता, पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे भारी भरकर शब्दों का उच्चारण भले ही करते रहें, जब तक हमारे व्यक्तिगत कर्म लोक मंगलकारी और समाजोन्मुख नहीं होंगे, तब तक इनका उच्चारण तक बेमानी है। 
हमारे जगने से लेकर सोने तक के कर्मों का रोजाना हम हिसाब लगाएं तो हम पाएंगे कि हमारी जिन्दगी का अधिकांश समय बिना किसी काम-काज और उपयोगिता के यों ही गुजर गया। और आदतें ऎसी मजबूत पड़ी हुई हैं कि यही परंपरा चलती रहने वाली है।
इस दृष्टि से हम सारे के सारे टाईमपास ही हैं। यह दिगर बात है कि हमारे निकम्मेपन और नालायकियों पर लोग कुछ टीका-टिप्पणी न करते हों मगर समझते सारे हैं। उनके मौन का अर्थ हमारे कर्म के प्रति स्वीकारोक्ति नहीं है बल्कि सज्जनों का सबसे बड़ा सिद्धान्त यही हो गया है कि वे नालायकों और अभद्र लोगाें से उलझना नहीं चाहते और ‘दुर्जनों से दूरी भली’ के ब्रह्म वाक्य को अपनाकर दूर ही रहा करते हैं, कभी पास आने की कोशिश नहीं करते।
इन्हें अच्छी तरह पता होता है कि जो इंसान अपने कर्म के प्रति वफादार नहीं है, संस्कारों और संस्कृति, समाज या देश सेवा के प्रति वफादार नहीं है, वह किसी का नहीं हो सकता। अपने कुटुम्बियों, सहकर्मियों, समुदाय, क्षेत्रवासियों या देश का भी नहीं। 
ऎसे लोग अपने मामूली स्वार्थ और लोभ-लालच में कुछ भी कर सकते हैं, हर प्रकार के समझौते और समीकरण बिठा सकते हैं और सिद्धान्तों व आदर्शों की बलि चढ़ा सकते हैं।
कई लोगों की पूरी जिन्दगी निकल जाती है, फिर भी कोई उन्हें इंसान के रूप में स्वीकारने को तैयार नहीं होता।  जीना वास्तव में उसी का है जो अपने क्षेत्र, समुदाय और देश के लिए जीते हैं और सेवा तथा परोपकार की भावना से निष्काम कर्मयोग अपनाते हैं।
ऎसे लोगों के लिए छोटे से छोटा काम भी देश की सेवा का अंग होता है।  इन मापदण्डों को आधार मानकर देखें तो हम सभी को लगेगा कि हमारी जिन्दगी भी टाईमपास के सिवा कुछ नहीं है। जहाँ हमें कुछ नहीं करना है।

आज दिन और रात आ-जा रहे हैं, किसी दिन काल भी आ धमकेगा। उस दिन कोई यह कहने वाला नहीं होगा कि यह आदमी काम का था। सारे के सारे यही कहेंगे - टाईमपास, कामचोर और नालायक था, चला गया, चलो अच्छा हुआ। धरती का बोझ कम हुआ। 

No comments:

Post a Comment