आलेख ( 21 फरवरी 2015 के लिए)
अपना धन काम आए
अपने क्षेत्रों में ही
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
इन दिनों इंसानियत पर सबसे
ज्यादा हावी है तो वह है तथाकथित धर्म। धर्म के मर्म और धार्मिक सरोकारों और
महत्त्व से अनभिज्ञ लोग उपासना पद्धतियों
को ही धर्म मान बैठे हैं, रास्तों को ही लक्ष्य मानकर ऎसे जमे हुए हैं कि
मंजिल की तरफ आगे बढ़ना चाहते ही नहीं।
धर्म का सीधा संबंध मानव और
मानव, समुदाय, क्षेत्र तथा देश के
उन पारस्परिक दायित्वों से है जिनमें पग-पग पर मानवीय संवेदना, सेवा, परोपकार, सदाचार,
एक-दूसरे के कष्टों का हरण कर प्रसन्नता भरने और पिण्ड से लेकर
प्रकृति और ब्रह्माण्ड तक में सकारात्मक प्रभाव, सुकून और
आनंद के भाव भरने को ही प्रधानता दी गई है।
जियो और जीने दो से लेकर
तत्त्वमसि और वसुधैव कुटुम्बकम तथा सबै भूमि गोपाल की जैसे विचारों को ध्येय व
लक्ष्य के रूप में स्वीकारा गया है। धर्म इंसान को मर्यादा का पाठ पढ़ाता है और यह
सिखाता है कि उसे किस प्रकार जीना है, किस तरह औरों के लिए
मददगार होना है।
लेकिन इन सारी बातों को हमने
गौण कर लिया है और धर्म को सिर्फ संकीर्णताओं के दायरों में कैद कर दिया है जहाँ
धर्म सार्वजनीन न होकर मत-मतान्तरों और संप्रदायों के दालानाेंं में कैद होकर रह
गया है।
धर्म के नाम पर हो रही
दुर्गति, विकृत समझ या गलत व्याख्याओं का ही परिणाम है कि
आजकल जो कुछ हो रहा है उसे देखने-सुनने पर जी नहीं चाहता कि कोई हमें धार्मिक कहे।
आज के तथाकथित धर्म ने रिलीजियस इण्डस्ट्री का जबर्दस्त स्वरूप पा लिया है जहाँ और
कोई धंधा करने की कुव्वत हो न हो, धर्म के नाम पर कैसी भी
दुकान डाल दो, चल निकलेगी।
बड़े-बड़े मठाधीशों के आश्रमों
और मठों से लेकर मन्दिरों तक यही सब कुछ देखने को मिल रहा है जहाँ भक्त और भगवान
के बीच पैसों और वीआईपी का ही रिश्ता रह गया है। दर्शन करने हों या स्वादिष्ट
प्रसाद पाना हो, लाईन में लगने की विवशता को त्यागना हो या महंगे
गिफ्ट देकर बाबाजी को राजी करना हो, लाखों-करोड़ों रुपए खर्च
कर सत्संग कराना हो या कोई सी कथा।
हर मामले में वीआईपी कल्चर और
मुद्रा राक्षसों का भयावह बोलबाला है। लगता है कि जैसे गरीब आदमी के लिए न भगवान
है,
न सत्संग और कथाएं। धर्म और
भारतीय मनीषा का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि हमारे यहां प्रसाद बिकता है,
हर धार्मिक क्रियाकर्म में दुकानदारी है और धर्म को भुनाने वाले
पोंगे पण्डित, मठाधीश और धंधेबाजों के बूते ही धर्म चलता है।
कथाओं का धंधा ऎसा चल निकला
है जैसे कि कोई मोबाइल फैक्टि्रयाँ ही हों। भगवान के नाम पर भी पैसा लिया जाने लगा
है। जिन कथाओं में रुपयों पैसों और तृष्णाओं को छोड़ने, भगवान को अनन्य भाव से भजने और निष्काम पूजा-पाठ की बातों पर जोर दिया
जाता है, वे लोग ही बिना पैसे लिए कथा करने तक को अधर्म
मानने लगे हैं। और रकम भी कोई छोटी-मोटी नहीं, लाखों से कम
नहीें। लानत है हमारे धर्माधीशों को, जो धर्म को बेचकर
भोगी-विलासी बने हुए हैं और उधर गरीब लोग दो वक्त की रोटी तक को मोहताज हैं।
बात चाहे महामण्डलेश्वरों की
पदवी पर बैठे महान लोगों की हो या साधु-साध्वियाें, गृहस्थों की
हो या दूसरी किस्म के कथावाचकों या किसम-किसम के बाबाजियों और बाजीगरों की। जो लोग
संसार को त्याग बैठे हैं वे भी लाखों - करोड़ों में खेलने को ही संन्यास मानने लगे
हैं।
पता ही नहीं चलता कि ये कौनसा धर्म है जिसमें
ईश्वर को भुलाकर भोग-विलासिता, पैसों और धनाढ्य भक्तों की पूछ
होती हो। आश्रमों के नाम पर बेशकीमती भवन और भूमि चाहिए, ण्यरकण्डीशण्ड
कक्ष और सारी सुविधाएं चाहिएं, जैसे कि आश्रम न हो कर कोई
रिसोर्ट्स ही हों।
ईश्वर हमें क्षमा करें, उनके बंदों के बारे में यह सब साफ-साफ कहना पड़ रहा है। लेकिन सत्य को
उद्घाटित होना ही है, आज नहीं तो कल। पिछले कुछ समय से हर
तरफ कथाओं का जोर है। हर शहर और कस्बे में साल भर में बीसियों बार भागवत और दूसरी
कथाओं का क्रम बना हुआ है।
बावजूद इसके लोग वहीं के वहीं
हैं, कुछ फरक नज़र नहीं आता। वे लोग भी एक ही किस्म के
होते हैं जो किसी न किसी बहाने कोई न कोई आयोजन करवाने का पक्का सामथ्र्य रखते हैं
और अपने-अपने इलाकों में परम भागवत, सिद्ध, भक्त, समाजसेवी और धार्मिक कहलाते हुए अपने जीवन को
धन्य कर रहे हैं।
बिजनैस और मैनेजमेंट के सारे
फण्डों से लेकर धर्मभीरू लोगों को अपने तरीके से हाँकने की कला कोई सीखे तो
इनसे। भारत के गांवों, कस्बों और शहरों से लेकर महानगरों तक में सालाना लाखों से लेकर अरबों तक
की राशि इन आयातित संत-महात्माओं और कथाकारों को उपकृत करने धार्मिक आयोजनों,
कथाओं आदि में खर्च हो रही है।
इसके बावजूद हर क्षेत्र में
समस्याएं, मांग और गरीबी जस की तस बनी हुई है। आयेाजकों का
समूह भी वही, और सुनने-सुनाने वालों का जमघट भी ठीक हर बार
एक ही तरह का। फिर भी लोगों की न मानसिकता बदली है न धर्म के प्रति समझ ही बन पायी
है।
हर क्षेत्र की अपनी समस्याएं
हैं, मानवीय सेवा क्षेत्रों की तीव्र जरूरतें बनी हुई
हैं, गरीबी और अभावों ने लोगों की जिन्दगी को अभिशप्त बना
डाला है। ऎसे में हर क्षेत्र में स्थानीय जरूरतों को पूरी करने और समस्याओं के
निपटारे के लिए स्थायी समाधान खोजने के प्रयत्न होने चाहिएं और जो पैसा कथाओं,
सत्संगों और दूसरे दिखावटी धार्मिक आयोजनों के नाम पर बाहर जा रहा
है, उसे रोक कर स्थानीय स्तर पर लोकसेवा की स्थायी
गतिविधियों और जरूरतों पर खर्च किए जाने की आवश्यकता है।
लेकिन ऎसा नहीं हो पा रहा है, यह समाज और हर क्षेत्र के लिए दुःखद है। कल्पना करें कि जो स्थानीय पैसा
अस्थायी कामों और आयोजनों के नाम पर बाहर जा रहा है, उसे यदि
स्थानीय स्तर पर खर्च किया जाए तो हर क्षेत्र स्वर्ग ही बन जाए।
बाबाओं, कथाकारों और धार्मिक मठाधीशों को दिए जाने वाले पैसों का कोई उपयोग न समाज
के लिए हो पा रहा है, न देश के लिए। बल्कि यह सारा पैसा उन
लोगों के कब्जे में जा रहा है जो संसार को छोड़कर वैराग्य धारण कर चुके हैं अथवा
कथाओं में माया से दूर रहने की बात करते हैं।
असल में ये लोग ही समाज के
अपराधी हैं जो किसी न किसी बहाने धर्म के नाम पर लोगों से पैसा निकाल कर अपनी झोली
भर लिया करते हैं और समाज वहीं का वहीं ठहरा होता है। हर क्षेत्र में आज स्थायी
गतिविधि, काम और विकास की जरूरत है, हर
क्षेत्र के लोगों के लिए सबसे बड़ा धर्म यही है कि स्थानीय स्तर पर ऎसा कोई
काम-धंधा, सेवाश्रम या धर्मशाला, अन्नक्षेत्र,
अस्पताल, गरीबों की आवश्यकताओं को पूरा करने
के लिए उपयोगी गतिविधियां व संस्थान हों, अभाव ग्रस्तों की
मदद के लिए कोई कोई स्थायी फण्ड हो।
ऎसा नहीं होने से समाज
दुरावस्था का शिकार है, धर्म के नाम पर अधार्मिक गतिविधियां बढ़ती जा रही
हैं और लगता है जैसे गरीबों के लिए धर्म या भगवान नहीं हैं बल्कि उन्हीं के लिए
हैं जो चंदा इकट्ठा करने या करवाने, आयोजन करने करवाने या
धर्म के धंधेबाजों के करीब हैं।
इन स्थितियों में हर क्षेत्र
के लोगों को गंभीरता से सोचकर यह प्रण लेना चाहिए कि उनके क्षेत्र का पैसा उनके
इलाके में ही किसी सेवा या परोपकार के काम में खर्च हो, कहीं बाहर नहीं जाए।
ऎसा होने पर ही समाज और देश
का भला संभव है और धर्म कायम रखा जा सकेगा। धर्म को धंधा नहीं बनाएं बल्कि सेवा का
माध्यम बनाएं और ऎसे काम करें कि जरूरतमन्दों के अभावों को दूर किया जा सके, गरीबी से परेशान लोगों के चेहरों पर मुस्कान लायी जा सके। ऎसा होने पर ही
धर्म का कोई अर्थ है वरना यह अधर्म ही है।
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