Wednesday, 4 February 2015

ईश्वर प्रसन्न रहता है परिश्रमी लोगों पर ही

आलेख ( 4 फरवरी 2015 के लिए)
ईश्वर प्रसन्न रहता है
परिश्रमी लोगों पर ही
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

अपने आपको धार्मिक या धर्मान्ध कहने वाले लोगों की कई श्रेणियाँ हैं जो धार्मिक होने या कहलवाने के मोहजाल में फंसे हुए जाने क्या-क्या नहीं कर रहे हैं।
धर्म का आवरण ही ऎसा है कि जाने यह किन-किन विषयों को ढंक कर रहने का सशक्त आवरण बना हुआ है वहीं इनसे जुड़े खूब सारे लोगों को अभयदान दे रहा है।
धर्म का आजकल जो स्वरूप सामने दिख रहा है वह अपने आप में ऎसे अभयारण्य की तरह हो गया है जहाँ कोई कुछ भी कर गुजरे, कोई पूछने वाला नहीं।
धर्म के नाम पर  धर्मान्धता और अधर्म का जो पाखण्ड इस युग में देखा जा रहा है वैसा किसी युग में कभी नहीं देखा गया। धर्म का सीधा संबंध उस सदाचार से है जो मानवीय मूल्यों का पोषक है तथा लोक मंगल और परिवेशीय शांति का सृजन करता है, स्थिरता देता है और सुकून प्रदान करता है।
इस दृष्टि से धर्म कोई या किसी मत-सम्प्रदाय अथवा वैचारिक धाराओं-उपधाराओं का परंपरागत प्रवाह मात्र नहीं है बल्कि धर्म का अर्थ उस आत्म अनुशासन से है जिसमें व्यक्ति सभ्यता, संस्कारों और संस्कृति के दायरों में बंधा रहकर वैश्विक मंगल के लिए हमेशा हर क्षण उद्यत रहता है और वह भी ऎसा कि उसके प्रत्येक कर्म में निष्काम भाव ही छाया होता है।
इस दृष्टि से धार्मिक कहलाने का अधिकारी वही है जो धर्म अर्थात मानवीय मूल्यों और आदर्शों का पालन करता है। उस इंसान को धार्मिक नहीं कहा जा सकता जो कि धर्म का चौला पहन कर अनैतिक और अमर्यादित आचरण करता है तथा विधर्मियों सा व्यवहार करता रहता है।
धार्मिक होने का सीधा संबंध सज्जनता और दिव्यताओं से है तथा जो धार्मिक होता है वह किसी भी परिस्थिति में अधर्माचरण नहीं कर सकता। पुरुषार्थ चतुष्टय में धर्म के बराबर ही कर्म को भी रखा गया है लेकिन हम लोग कर्म भूलते जा रहे हैं और धर्म के नाम पर जाने कैसी-कैसी नौटंकिया करते जा रहे हैं।
कोई अपने आपको कितना ही धार्मिक क्यों न कहता रहे, जब तक उसकी निष्ठा और समर्पण कर्म के प्रति नहीं है, तब तक वह न धार्मिक हो सकता है, न सामान्य इंसान ही।
आजकल धर्म के क्षेत्र में ऎसे-ऎसे लोगों की भरमार है जो कि ऎसे-ऎसे कामों में लिप्त हैं जो कि अधर्म के प्रतीक कहे जाते हैं। असली धार्मिक वहीं कहलाया जा सकता है जो कि कर्मशील हो तथा जिसका कर्म ऎसा हो कि वह सृजन के साथ ताजगी भी दे और आनंद का भी संचार करता रहे।
इस दृष्टि से जो इंसान कर्म करता है वही सच्चा धार्मिक होने या कहलाने का अधिकारी है। खूब सारे लोग ऎसे हैं जो अपने निर्धारित दायित्वों को पूरा करने के प्रति उदासीन रहते हैं, कोई सा काम हो, उसे टालते ही रहते हैं तथा काम टालने या नहीं करने के लिए रोजाना नए-नए बहाने बनाते ही रहते हैं। 
ऎसे लोग कितने ही तिलक-छापे, मालाओं और भभूत का इस्तेमाल करते रहें, रोजाना घण्टों पूजा-पाठ करते रहें या दिन में कितने ही मन्दिरों के चक्कर लगाते रहें, भगवान इनसे हमेशा नाखुश ही रहता है और ऎसे लोगों को ईश्वरीय दण्ड का भागी बनना ही होता है क्योंकि संसार का प्रत्येक कर्म ईश्वरीय है और जो कर्म के प्रति उदासीन या निकम्मा रहता है वह ईश्वर का सामीप्य भी नहीं पा सकता है।
ऎसे लोग आडम्बरी ही होते हैं और इनके हर प्रकार के धार्मिक कृत्य छलावा, झूठ और फरेब से अधिक कुछ नहीं हुआ करते हैं। जो लोग कर्म क्षेत्र में धोखाधड़ी, टालमटोल और बहानेबाजी करते हुए निकम्मेपन का प्रदर्शन करते हैं वे लोग जीवन के उत्तरार्ध में दुःखी रहते हैं क्योंकि इनके द्वारा जो कुछ कमायी की जाती है वह पुरुषार्थहीन ही होती है।
इसलिए जीवन में हमेशा कर्म को प्रधानता देते हुए ईश्वर का स्मरण किया जाना चाहिए तभी ईश्वर हमारे लिए मददगार बनता है और उसकी कृपा या वरदान हमें प्राप्त होता है।

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