आलेख ( 19 फरवरी 2015 के लिए)
जैसे हैं वैसे रहने दें
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
दुनिया भर में तरह-तरह के लोग
हैं। ‘मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना’ वाली स्थितियों के दौर से हम गुजर रहे हैं। यहाँ
न कोई इंसान को अच्छा-बुरा कहता है, न विचारों को। हर
इंसान अपने-अपने स्वार्थ से संबंधों, व्यक्तियों और विचारों
का विश्लेषण करता है, अपने हक़ में भुनाता है और तभी तक
रिश्तों की डोर थामे रखता है जब तक कोई काम निकालना होता है।
वो दिन हवा हो गए है जब
सच्चाई और यथार्थ की कसौटी पर इंसान को परखा जाता था। अब सबके अपने-अपने सच हैं, अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं और ढेरों तर्क-कुतर्क हैं। जिस बात को मनवाना चाहते हैं उसके पक्ष में खूब
सारे लोगों के झुण्ड जमा हो जाते हैं और मनवा कर ही मानते हैं।
सच्चाई और ईमानदारी के
पक्षधरों को हमेशा अकेले ही रहना है और इस अकेलेपन में उनका कोई संगी-साथी कभी
नहीं होता, सिवाय ईश्वरीय संबल के। इसलिए दुनिया में जहाँ कहीं जो भी लोग
स्वाभिमानी, ईमानदार और नैष्ठिक परिश्रमी हैं उन्हें
ताजिन्दगी इस बात को परम सत्य के रूप में स्वीकार करनी ही चाहिए कि वे अकेले हैं,
अकेले चलना है और ‘एकला चालो’ के ब्रह्मवाक्य को अपनाते हुए पूरी
जिन्दगी गुजारनी है।
इसलिए निर्भय, प्रसन्न और निरपेक्ष होकर मस्ती के साथ जीवनयापन के सारे सूत्रों को सहज
स्वीकार करके चलना चाहिए, इसी में आत्म आनंद भरा हुआ है।
किसी व्यक्ति, वस्तु या संसाधन को अपना मानने की बजाय ईमानदारी और सम्पूर्ण मनोयोग से कत्र्तव्यपरायणता
को अंगीकार करना ही स्वाभिमानी लोगों के लिए श्रेयस्कर है।
इसका एक कारण यह भी है कि हर
आदमी अपने ही चश्मे से दूसरों को देखता है, अपने ही चश्मे के
अनुरूप दुनिया को देखना चाहता है और इसलिए अपने स्वार्थ के रंग-बिरंगे शीशों की आड़
में वह उन्हीं को देखता है जो उसके लिए उपयोगी हैं, कुछ दे
पाने की स्थिति में होते हैं।
कोई बिम्ब कितना ही अच्छा
क्यों न हो, यदि शीशे ही बेईमानी और नालायकियों पर उतर आएं तो
इसका कौन जिम्मेदार। फिर जब आँखों में भी
दोष हो और चश्मों में भी, तब तो सारे कूए में भंग होना
स्वाभाविक ही है।
आजकल अधिकतर कूओं के पानी में
भंग घुली हुई है, और कूओं की मुण्डेर भी भंग से ही बाँधी गई लगती
है। मनोविज्ञान से लेकर इंसान के चित्त तक की टोह ली जाए तो साफ-साफ सामने आएगा कि
जिस इंसान का चित्त प्रदूषित है उसे दूसरे सारे लोगों में कोई न कोई कमी ही नज़र
आएगी। और जिस इंसान का चित्त मलीनताओं से मुक्त है उसे सभी जगह अच्छा ही अच्छा
दिखाई देने लगता है।
दोनों ही किस्मों के लोगों के
कर्म और व्यवहार में चित्त और मस्तिष्क का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होता ही है।
इस स्थिति में सत-असत् और अच्छे-बुरों का
संघर्ष हमेशा चलता ही रहता है। यह युगों से चला आ रहा है और पृथ्वी या मनुष्यों के
रहने तक यों ही चलता रहेगा।
हर युग में अच्छी और बुरी
आत्माओं का वजूद रहता है, संघर्ष भी बना रहता है। जहाँ किसी एक का घनत्व या
संख्या में अभिवृद्धि हो जाती है वहाँ दैन्य भाव हावी हो जाते है। जबकि जहाँ कहीं
कुछ अच्छाइयों का प्रभाव रहता है वहाँ दैवीय गुणों का अस्तित्व साफ दिखने लगता है।
यह स्थिति सभी प्रकार के
बाड़ों और घरों में विद्यमान रहना स्वाभाविक ही है। आजकल इंसान में नकारात्मक
प्रभावों का घनत्व बढ़ता जा रहा है। इसका मूल कारण भी यही है कि लोगों को अपने जीवन
का चरम लक्ष्य मानवता की बजाय भोग-विलास और धन वैभव हो गया है ।
इस वजह से आदमी इंसानियत की
बजाय उन तमाम रास्तों को अंगीकार कर लेता है जिनसे होकर इनकी प्राप्ति होने लगती
है। इस काम में जल्दबाजी और आतुरता इतनी कि वह जल्द से जल्द इतना कुछ पा लेना
चाहता है जितना और लोग प्राप्त नहीं कर पाते हैं।
सम्पदा और संसाधनों के मामले
में सभी तरफ गलाकाट प्रतिस्पर्धा से प्रभावित होकर इंसान भी अपनी सारी मानवता और
नैतिकता को भुलाकर उन रास्तों की ओर बढ़ता चला जा रहा है जहाँ मानवीय मूल्यों के
सिवा वो सब कुछ है जिसे सहज स्वीकार कर
लिए जाने पर उसे प्राप्ति ही प्राप्ति दिखाई देने लगती है और इस तरह वह भी उन
वैभवशाली लोगों की भीड़ में शामिल हो जाता है जहाँ इंसानियत की बजाय सब कुछ नज़र आता
है।
वर्तमान के इस कड़वे सत्य को
अंगीकार किया जाना हम सभी की मजबूरी है। सज्जनों में हमेशा इस स्थिति को देखकर
उद्वेलन रहता आया है। कारण कि उनकी निगाहों में सृष्टि और व्यक्ति कुछ अलग होने
चाहिएं, इन्हें समुदाय के लिए जवाबदेह होना चाहिए लेकिन ऎसा नहीं होने पर मन में खिन्नता आना
स्वाभाविक है।
इस स्थिति में हम समाजसुधार
की बातें करते हैं, इसके लिए प्रेरणा संचार करने वाले आयोजन करते हैं
और ढेर सारे रचनात्मक कामों में अपनी शक्ति गँवाते हैं। बावजूद इसके हालात जस के
तस बने हुए हैं।
इसका कारण यह है कि जहाँ
इंसान को पैसा, भोग-विलासिता के संसाधन, मुफतिया
बिम्ब और वैभव दिख जाते हैं वह उधर लपकने का आदी होता है और इस अवस्था में उसके
लिए सारे सिद्धान्त और आदर्श बेमानी लगते हैं।
प्रत्यक्ष लाभ को ठुकरा कर
परोक्ष प्रतिष्ठा या अमरता पाना अब कोई नहीं चाहता। इन विषम हालातों में वह समय चला गया जब हमें
समाजसुधार के लिए अपने आपको लगाना चाहिए।
इंसान की फितरत यही है कि जब
तक वह खुद अनुभव नहीं कर लेता तब तक सत्य को स्वीकार नहीं करता। जो जैसे हैं
उन्हें सुधारने में अपना समय, श्रम और सामथ्र्य न गँवाएं बल्कि
उन्हें जो चाहें करने दें, भरपूर छूट दें, एक समय जरूर आता है जब वे कटु अनुभवों के साथ या तो रास्ता बदल लेते हैं
अथवा कूए में गिरकर अपने आपको नियति के हवाले कर दिया करते हैं।
जिन लोगों में सुधार की
गुंजाईश न हो, जो हद से ज्यादा बिगडैल हैं, उन्हें अपने हाल में रहने दें। इन पर बुद्धि, शक्ति,
समय और पैसा खर्च करने की बजाय अपनी ऊर्जा किसी रचनात्मक कर्म में
लगाएं जहाँ से कोई न कोई उपलब्धि सामने आ पाने का पक्का भरोसा हो।
No comments:
Post a Comment