आलेख ( 16 फरवरी 2015 के लिए)
आनंद और सुकून तभी
जब दिल-दिमाग हों निर्मल
- डॉ. दीपक आचार्य
941330607
dr.deepakaacharya@gmail.com
जीवन के सारे आनंद पाने की
एकमात्र कुंजी यही है कि दिल निर्मल, स्वच्छ और पारदर्शी
हो। इसी प्रकार मस्तिष्क में किसी भी प्रकार का कचरा भरा हुआ न हो। मन और मस्तिष्क में कुटिलता, मलीनता और झूठ भरा हुआ होने पर कोई भी इंसान वास्तविक और शाश्वत आनंद की
प्राप्ति नहीं कर सकता है भले ही उसके पास शारीरिक भोग-विलास और मदमस्ती या आनंद
पाने के लिए कितने ही लोग, उपकरण, साधन-संसाधन
और अनुचरों से लेकर सभी प्रकार की अकूत धन-संपदा और वैभव ही उपलब्ध क्यों न हो।
इन सभी प्रकार के वैभवपूर्ण
विलासिता भरे माहौल से वह आनंद प्राप्त नहीं कर सकता बल्कि जो वह अनुभव करता है वह
मिथ्या आनंद ही है जो लम्बे समय तक नहीं टिक पाता। इसके साथ ही इस आनंद को पाने के
बाद जो स्थितियां सामने आती हैं वह आनंद के मुकाबले कई गुना विषाद और तनाव भर देने
वाली होती हैं।
सच्चे आनंद की अनुभूति के लिए
जरूरी है कि पहले हम तन को शुद्ध करें, मन को साफ-सुथरा
बनाएं और दिमाग में से नकारात्मकता, झूठ-फरेब और बेईमानी भरे
विचारों, तमाम प्रकार की शंकाओं, भ्रमों
और आशंकाओं को पूरी तरह बाहर निकाल कर दिमाग को स्वाभाविक शून्यावस्था में प्रदान
करें।
ईश्वर और आनंद का आभास पाने की
पहली शर्त यही है, तभी जीवन का सुकून और आनंद पाया जा सकता है। इसके
बिना आनंद पाने की कल्पना व्यर्थ है व आनंद उपलब्धि के तमाम प्रकार के प्रयास
निरर्थक ही सिद्ध होते हैं। चित्त में मलीनता और अंधकार का अंशमात्र भी अस्तित्व
होने की स्थिति में हमारे वे सारे प्रयास निष्फल हो जाते हैं जिन्हें हम आनंद
मानकर चलते हैं। आनंद और ईश्वर पाने के लिए सबसे पहले अपनी भावभूमि को पूर्ण
शुद्ध-बुद्ध और पारदर्शी बनाना जरूरी होता है।
यह स्वच्छता, शुचिता और पारदर्शिता जितनी अधिक होगी, उतना आनंद
प्राप्ति जल्द होने की तीव्रतर संभावनाएं होती हैं। ऎसा नहीं होने पर पूरी जिन्दगी
हम चाहे कुछ करते रहें, भोग-विलास और स्वच्छन्दता भरे माहौल
में अपने आपको बनाए रखें और आनंद लूटने के लिए हमेशा चाहे कितने ही बेताब रहें,
तरह-तरह की तलब को पालते रहें और आतुरता के साथ लपक बनाए रखें,
इसका कोई फायदा नहीं है।
यह सब कुछ टाईमपास के सिवा कुछ
नहीं है। जिन लोगों का मन-मस्तिष्क अंधेरों से घिरा होता है वे स्वाभाविक रूप से
झूठे, मक्कार और असत्य ही होते हैं और यही कारण है कि
इनकी कथनी और करनी सब कुछ दोहरा होता है।
झूठ की बुनियाद पर किसी भी
प्रकार का कोई रचनात्मक कर्म आकार नहीं ले सकता। ऎसी बुनियाद हमेशा धराशायी करने
वाली होती है, इसके लिए किसी भूकंप की आवश्यकता भी नहीं होती।
कभी कोई ऎसा क्षण आ ही जाता है जबकि झूठ की नींव पर खड़ा बहुमंजिला महल भरभरा कर
धड़ाम से ऎसा गिर जाता है कि इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
आनंद की प्राप्ति संसाधनों या
व्यक्तियों से नहीं होती बल्कि आनंद अपने आप में मन का विषय है और जिनका मन
पारदर्शी और स्वच्छ है उन्हें आनंद की प्राप्ति शीघ्र होने लगती है, इसके लिए न उन्हें झूठ बोलने की आवश्यकता होती है, न
औरों को भ्रमित करने की।
यही स्थिति ईश्वर की प्राप्ति
के लिए भी जरूरी है। यों कहा जाए कि ईश्वर और आनंद एक-दूसरे के पर्याय हैं, तो कोई गलत नहीं होगा। जहाँ ईश्वर के आगमन का अहसास होने लगता है वहाँ
ईश्वरीय विभूति होने की वजह से मुदिता, निरपेक्षता और
निर्भयता के साथ आनंद का आगमन अपने आप होने लगता है अथवा जहाँ आनंद का आभास होना
शुरू हो जाता है वहाँ ईश्वर स्वयं चलकर आने लगता है और हृदय में प्रतिष्ठित हो
जाता है।
इसलिए ईश्वर या आनंद में से
किसी एक को पाने के लिए ही प्रयास कर लिया जाए तो दोनों की प्राप्ति सहज ही संभव
हो जाया करती है। फिर जब ईश्वर और आनंद की प्रतिष्ठा जिसके चित्त में हो जाती है
उसके लिए जीवन का कुछ भी कर्म शेष नहीं रह जाता है, कर्तापन का
भाव मिट जाता है और जो कुछ होने लगता है वह स्वतः ही होने लगता है। हर कर्म यहां
आकर ईश्वरीय हो जाता है जिसमें आशातीत सफलता का मार्ग कभी अवरूद्ध नहीं हो सकता।
आम तौर पर हम लोग व्यक्तियों, विषयों, संसाधनों और बाहरी माया के वशीभूत होकर जिसे
आनंद पाना समझते हैं, यही सबसे बड़ा भ्रम है जो कुछ समय
पश्चात अपने आप टूटता ही है और फिर वह उसी अनुपात में खिन्नता और दुःखों का अहसास
कराता है।
आनंद को बाहर से प्राप्त नहीं
किया जा सकता। यह मन का विषय है जिसे मन के भीतर जाकर ही पाया जा सकता है। सभी
प्रकार के आनंद का स्रोत भीतर ही है लेकिन हम कस्तूरी मृग की तरह उसे बाहर ढूँढ़ने
के लिए पागलपन की हद तक इधर-उधर डोलते फिरते हैं और अन्ततोगत्वा निराश होकर बैठना
ही पड़ता है।
आनंद प्राप्ति के सच पर
गंभीरता से विचार किया जाए तो साफ-साफ पता चलेगा कि इसके लिए दिल और दिमाग में
पवित्रता, पारदर्शिता और खुलापन लाया जाना नितान्त जरूरी है।
ऎसा होने पर ही भीतर के द्वारों में हम प्रवेश पाकर उस अजस्र आनंद के स्रोत को
ढूँढ़ निकालने में कामयाब हो जाते हैं जिसके लिए आम लोग पागलों की तरह एक-दूसरे के
पीछे पड़े रहते हैं और अपना समय बर्बाद करते हैं।
कई बार मोहावस्था, मूढ़ावस्था और माया के वशीभूत होकर हम मोहांध, कामांध
और मदांध हो जाया करते हैं। ऎसा होना ऋषियों से लेकर आज तक के हम सभी लोगों के लिए
स्वाभाविक है क्योंकि महाठगिनी माया से कोई बच नहीं सका है लेकिन हमारे आस-पास के
लोगों और घटनाओं से हम थोड़ा सा भी सबक ले लें तो हम आनंद और ईश्वर दोनों को इसी
जन्म में प्राप्त करने का सामथ्र्य प्राप्त कर सकते हैं। पर इसके लिए अंधे मोह का
त्याग जरूरी है। जो ऎसा कर पाते हैं वे स्वयं आनंदमय होकर शुद्धोहम्, बुद्धोहम् और सच्चिदानंदोहम् का उद्घोष करने का सामथ्र्य पा जाते हैंं।
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