आलेख (17 फरवरी 2015 के लिए)
उपयोगी है
मेहनत की कमायी ही
- डॉ. दीपक आचार्य
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हर इंसान का स्वप्न होता है कि
जीवन में उसके पास इतनी सम्पत्ति तो हो ही कि भविष्य को लेकर आशंकाएं न रहें और
जीवन सुरक्षित ढंग से चलता रहे।
संतोषी लोगों के अलावा खूब
सारे ऎसे भी होते हैं जिनकी चाहत आम आदमी से काफी ज्यादा होती है और ऎसे लोग अपनी
ही नहीं बल्कि आने वाली सात पीढ़ियों तक की चिन्ता करते हैं और इतना अधिक जमा कर
लेने को आतुर रहते हैं कि उनकी यह इच्छा पूरी हो जाए।
इसके लिए वे शरीर और बुद्धि का
कई गुना अधिक इस्तेमाल करते हैं। इस लक्ष्य को पाने के लिए वे कुछ भी कर गुजरने को
सदैव हर क्षण तैयार रहते हैं चाहे इसके लिए जो रास्ते या माध्यम हैं वे अच्छे हों
या बुरे।
सम्पत्ति के मामले में साफ तौर पर दो तरह के
इंसान देखे जाते हैं। एक वे हैं जो पूरी ईमानदारी से काम करते हैं, जी भर कर परिश्रम करते हैं और उनकी हर कमायी के पीछे पुरुषार्थ की गंध
होती है। ऎसे लोग जीवन भर हर क्षण प्रसन्न रहते हैं और संतोषी जीवन जीते हैं। इन लोगों के पास न संचित कुछ बचता है, न औरों को दिखाने भर के लिए कुछ होता है लेकिन इनके पास मौज-मस्ती का जो
संतोष होता है उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता है।
दूसरी किस्म में वे लोग आते
हैं जिनके पास खूब सारी धन-दौलत, जमीन-जायदाद और सभी प्रकार का
वैभव होता है लेकिन इसमें से इनके उपयोग का कुछ नहीं होता। जो कुछ होता है वह
सिर्फ औरों की नज़रों में अपने आपको वैभवशाली बताने के भ्रम से अधिक कुछ नहीं होता।
इनके पास जो कुछ संचित होता है
उसमें खून-पसीने से कमाया नगण्य होता है लेकिन इसके अलावा दूसरे रास्तों से आया
हुआ इतना कुछ होता है कि इसकी गणना भी नहीं की जा सकती। इन दो प्रकार के लोगों के
जीवन को देखा जाए तो साफ सामने आएगा कि जो लोग परिश्रम करते हैं, अपने कर्म के प्रति निष्ठा और ईमानदारी रखते हैं, वे
लोग मस्ती के साथ संतोषी जीवन जीते हैं जबकि बिना किसी पुरुषार्थ के, गलत रास्तों से और बिना मेहनत के
जमा की गई सम्पत्ति इनके किसी काम नहीं आती बल्कि या तो यह संपदा ठगी में चली जाती
है, चोरी में चली जाती है या नष्ट हो जाती है। लेकिन ऎसा
होने से पहले तक भी इनकी यह सम्पदा इनके जीते जी किसी काम नहीं आती , बल्कि इनके मरने के बाद दूसरे लोग मौज करते हैं।
ऎसे लोगों की संख्या का कोई
पार नहीं है जिन्होंने अपने जीवन में धर्म, कर्म और व्यवहार में
न ईमानदारी बरती, न निष्ठाएं रखीं और न ही अपने कत्र्तव्य
कर्म के प्रति कोई रुचि का भाव रखा। ड्यूटी से जी चुराने वाले, अपने कार्यस्थलों से गायब रहने वाले, मनोरंजन को
कर्मयोग से अधिक मानने वाले, अपने निर्धारित दायित्वों से जुड़े कर्मों को गौण मानकर दूसरे-तीसरे धंधों
में रमे रहने वाले और हराम की तनख्वाह या मजदूरी पाने वाले लोगों के पास अपने नाम
की जमीन-जायदाद तो खूब हो जाती है लेकिन ऎसे लोगों की यह सम्पत्ति उनके किसी काम
नहीं आती।
ये लोग मर-मर कर धनसंग्रह करते
हैं और मौत आने तक इसकी चौकीदारी की चिंता में ही घुटते रहते हैं। एक सीधा और साफ
पैमाना यही है कि वही धन काम में आता है जिसे पुरुषार्थ से संचित किया जाए।
बेईमानी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार से
कमायी और ड्यूटी या अपने कर्म को गौण मानकर इकट्ठी की जाने वाली किसी संपदा का
अपने लिए कोई उपयोग नहीं। सिर्फ हम अपने आपको ताजिन्दगी दूसरों की अपेक्षा बड़ा और
समृद्धिशाली मानने या मनवाने का भ्रम पालते या फैलाते रहें।
असली सम्पत्ति हमारे जीवन के
लिए उपयोगी होती ही होती है जबकि हराम की कमाई या कामचोरी के बावजूद मिलने वाला धन
हमारे किसी काम नहीं आने वाला। इस सत्य को देखना हो तो आस-पास झाँक लें। हमें ऎसे
खूब सारे लोग मिल जाएंगे जिन्हें हम धनी मानते हैं लेकिन अपने संचित धन में से एक
धेला भर भी इनके काम नहीं आता।
तब यह मान लेना चाहिए कि इनके
द्वारा अर्जित की गई संपदा पुरुषार्थहीन रास्तों से आयी है। जो धन मेहनत से कमाया
जाता है वह इंसान के काम आए बगैर कभी भी अनुपयोगी पड़ा नहीं रह सकता, उसका जीवन में सदुपयोग होना ही
है।
लक्ष्मी चंचल है और ऎसे में जो
धन हम खून-पसीना बहाकर कमाते हैं वह बिना उपयोग के ठहर ही नहीं सकता। जो अनुपयोगी होकर ठहरी रहती है वह लक्ष्मी न
होकर अलक्ष्मी है और इसका संग्रहीत पड़े रहने के सिवा और कोई उपयोग नहीं हो सकता।
ऎसी लक्ष्मी संग्रहकर्ता की
मृत्यु के बाद ही कैद से मुक्त होकर दुरुपयोग के रास्तों पर चल पड़ती है। फिर इस धन
के चौकीदार कभी भुजंगों का जन्म लेकर कुण्डली मारे बैठे रहते हैं या यह धन व्यसनों
में बर्बाद होने लगता है।
यह भी शाश्वत सत्य ही है कि
पुरुषार्थ के बिना प्राप्त किया गया धन कभी भी दान-पुण्य या सेवा-परोपकार के काम
नहीं आ सकता, इसकी एक ही गति है, और वह है
क्षरण। अलक्ष्मी होने की वजह से कोई भी इसका उपयोग धर्म-कर्म, सेवा या परोपकार में नहीं कर पाता।
हम खूब सारे ऎसे लोगों को
देखते हैं जिनके सामने यह समस्या है कि दौलत तो काफी जमा हो गई है लेकिन इसे खर्च
कहाँ करें। ये लोग लोकेषणा के चक्कर में अच्छे कामों में खर्च करने का मानस अक्सर
बनाते भी रहते हैं मगर ऎसा हो नहीं पाता। और एक न एक दिन वह दिन आना ही है जब सब कुछ
यहीं छोड़कर लौटना होगा।
इसलिए यह जन्म तथा आने वाला
जन्म भी सुधारने की तमन्ना हो तो अपने कत्र्तव्य कर्मों को अच्छी तरह निभाएं और
ईमानदारी के साथ परिश्रम करें, पुरुषार्थी बनें। इस आदत को
त्यागें कि बँधी-बँधायी तो मिल ही रही है, चाहे कुछ करें न
करें। बिना काम किए संचित धन का उपयोग मरते दम तक कभी संभव नहीं। और मरने के बाद
तो इसका कोई अर्थ नहीं। अंतिम समय में ख्याल बना रहे तब भी क्या, सर्पयोनि में भी यह धन किस काम का। पड़े रहो हजार साल तक।
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