Sunday, 1 February 2015

सच्चे और अच्छे रहें बिगडैलों से दूर रहें

आलेख ( 1 फरवरी 2015 के लिए)
सच्चे और अच्छे रहें
बिगडैलों से दूर रहें
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

बहुत सारे अच्छे लोग होते हैं जो कालान्तर में बिगड़ जाते हैं। कुछ में सुधार की गुंजाईश भी होती है लेकिन खूब ऎसे ही होते हैं जिनके लिए कहा जाता है कि मरने के बाद ही कुत्ते की पूँछ सीधी होनी संभव है लेकिन उसके बाद न पूँछ का कोई उपयोग है, न मूँछ का, और न ही पूरे के पूरे जिस्म का।
अलबत्ता ऎसे लोग दशकों तक चर्चा में रहा करते हैं जब-जब विघ्नसंतोषियों, समाजकंटकों, राष्ट्रद्रोहियों, नाकाराओं और नालायकों का इतिहास खंगाला जाता है।
आदमी जब तक अपने मूल स्वभाव में होता है तब तक बुरा नहीं होता बल्कि उसमें आदमीयत भी उतनी ही भरी-पूरी मात्रा में होती है जितनी की सामान्य आदमी में अपेक्षित होती है।
आदमी के बिगड़ने का मूल कारण परिवेशीय सभ्यता, अप संस्कृति के साथ वे लोग भी है जो पहले से ही निकम्मे, नकारात्मक और विघ्नसंतोषी बने हुए हैं और चाहते हैं कि उनका नुगरा सम्प्रदाय यों ही निरन्तर बना रहे, पसरता रहे ताकि उन्हें अपने लायक कंपनी भी मिल जाए और इन लोगों के भरोसे टाईमपास ही हो जाए।
अक्सर कुछ न करने वाले, इधर-उधर की करने वाले, हराम की खाने-पीने वाले और मुफ्त की तनख्वाह लेकर घर भरने वाले लोगों में से अधिकांश टाईमपास ही होते हैं और इन्हीं बिगडैल लोगों के कारण समाज के उन लोगों के व्यक्तित्व पर घातक प्रभाव पड़ता है जो लोग अपने-अपने हिसाब से अच्छे इंसान के रूप में कोई न कोई काम करते रहते हैं और जिनसे समाज को खूब अपेक्षा होती है।
समाज को लगता है कि ये ही लोग आगे चलकर अपना, परिवार और क्षेत्र का नाम रौशन कर सकते हैं और इसका सीधा फायदा समाज को ही प्राप्त होगा।  लेकिन होता यह है कि कई सारे अच्छे लोग एक समय आने के बाद ऎसे बिगड़ जाते हैं जैसा कोई सोच भी नहीं सकता।
आखिर अच्छे भले आदमी में ये नकारात्मक सोच, हराम की खाने-पीने के अवगुण, हर काम में टाँग अड़ाने और अपने आपको बड़ा दिखाने, अहंकार से भर कर आसमान में उछलने, कोई काम-धाम नहीं कर आवारगी करने, एक के बाद एक काम अपने सर पर ओढ़ते चले जाने, कामों के भार का तनाव, किसी के काम न आने का दुर्गुण और हर मामले में मलीनता से भरपूर बातों के राग अलापने का विचित्र स्वभाव आखिर कहाँ से आ जाता है। 
इस परिवर्तन के मूल में वे लोग होते हैं जो बरसों से अंधेरों में जी रहे होेते हैं, आत्म आनंद भुलाकर दूसरों को परेशान कर दुःखी करने का स्वभाव पाल लेते हैं और कोई काम ऎसा नहीं करते हैं जिसकी वजह से इन्हें इंसान की श्रेणी में रखा जा सके।
निकम्मों व बिना मेहनत के कमाई के आदी लोगों और आत्मकेन्दि्रत व्यक्तियों के कारण ही आज इंसान बदनाम होता जा रहा है। आदमी को बिगाड़ने में सर्वाधिक भूमिका उन लोगों की होती है जो अवधिपार हो चुके होते हैं और उनके पास जिन्दगी गुजारने के लिए फालतू के विचारों, कामों और निन्दाओं में रमे रहकर टाईमपास करने के सिवा कोई चारा नहीं बचा होता है।
आजकल हर तरफ ऎसे लोगों की भरमार है जो खुद न कुछ करते हैं, न किसी को करने ही देते हैं। कोई सा काम कैसे बिगड़े, कोई किस प्रकार दुःखी हो, इसी सोच के इर्द-गिर्द ये लोग चक्कर काटते रहते हैं। ऎसी ही कुछेक गंदी मछलियों और बिगडैल घड़ियालोें की वजह से कई अच्छे-अच्छे संस्थान बदनाम हैं।
जो लोग कोई काम-काम धंधा नहीं कर पाते या किसी काम में जिनका मन नहीं लगता, परायी निंदा और चुगली में आनंद पाते हैं, ताश और फालतू के गेम्स खेलने को ही जिंदगी मान बैठे हैं वे सारे लोग समाज और देश पर सबसे बड़ा भार हैं और उनके बारे में यह तय मान लेना चाहिए कि ये सारे के सारे लोग नाकारा हो चुके हैं और बधियाकरण के योग्य हैं तथा इन सभी से अब समुदाय को कोई अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
इस किस्म के लोग किसी पोर्न साईट से भी अधिक खतरनाक होते हैं और पूरे के पूरे तालाब तक को गंदा कर डालत हैं। जिसे साफ करने में बरसों लग जाते हैं। ऎसे गंदे लोग हमारे आस-पास भी काफी संख्या में हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि ये दो-चार लोग नहीं होते तो आदर्श माहौल होता।
ये सारे के सारे लोग उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जिस दिन इन्हें ऊपर जाने का बुलावा आने वाला हो। लेकिन ये नालायक लोग समाज की उस युवाशक्ति को नाकारा कर दिया करते हैं जो उत्साह से भरकर समाज और देश की सेवा में कुछ करना चाहती है।
इस युवा पीढ़ी को उदासीन और नाकारा बनाने के कोई सबसे बड़े दोषी हैं तो वे निरंकुश गैण्डे और साण्ड हैं जो कभी चाय-काफी की चुस्कियां लेने, कभी ब्रेड-पकौड़ों का स्वाद चखने और कभी ठेठ गांव की अनपढ़ विधवाओं की तरह वैधव्य और शोक भरी बातों में रस लेते हुए जिन्दगी गुजारने को ही जीवन का लक्ष्य समझ बैठे हैं।
ये लोग कभी अपनी बात नहीं करते, जब भी करेंगे दूसरों ही दूसरों की, और इसमें भी प्रशंसा या सराहना का कोई शब्द शामिल नहीं होता। जो कुछ इनके मुँह से निकलता है वह निन्दा होता है या घोर अपशकुनी।
कई बार अच्छे आदमी तब भी बिगड़ जाते हैं जब उनके काम-धंधों या नौकरियों में सम्पर्क में आने वाले लोग किसम-किसम के गुण्डे, बदतमीज, मक्कार, खुदगर्ज, आवारा और हरामखोर हुआ करते हैं।
खूब लोग ऎसे हैं जो इनके संपर्क में आकर न इंसान ही रह पाए हैं न जानवर ही बन पाए बल्कि इनके बारे में कहा जा सकता है कि नरपिशाच और राक्षस ही हैं ये लोग। 
जो लोग अपने आपको सुधारने को इच्छुक हैं, अपनी जिन्दगी को उपलब्धिमूलक बनाना चाहते हैं, संस्थान, समाज या देश के लिए कुछ करना चाहते हैं उन्हें चाहिए कि वे न औराें के कंधे बनें, न बन्दूक और न ही अंधानुचर।

अच्छे बनने के लिए सबसे पहली शर्त यही है कि गंदे लोगों का परित्याग किया जाए, उनके साथ भ्रमण और खान-पान से लेकर सभी प्रकार के व्यवहार बंद कर दिए जाएं और यह प्रयास किया जाए कि न काली जुबान वाले उनके शब्द हमारे कान में पड़ें, न इन मनहूसों के दर्शन हों। इन टाईमपास लोगों की छाया तक से दूर रहने की आवश्यकता है। यह प्रायश्चित किए बगैर हमारा कल्याण संभव है ही नहीं।

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