Monday, 2 February 2015

न ढलें, न ढालें

आलेख (  2 फरवरी 2015 के लिए)
न ढलें, न ढालें
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
जो जैसा है वह उसका मौलिक स्वरूप होता है और उसी स्वरूप तथा स्वभाव में जीना उसे अच्छा भी लगता है, सुकून भी देता है। भले ही दूसरे लोगों की निगाह में कोई सा काम त्याज्य या हीन क्यों न हों, जिन लोगों को अपने कर्मों में रस आता है वह अनिर्वचनीय तथा अत्याज्य है और इसी में रमे रहना उन लोगों को पसंद आता है।
जानवरों की ही बात कर ली जाए तो वे भी अपने ही बिरादरी, अपने ही पसंदीदा खान-पान वाले क्षेत्रों और अपने परंपरागत मौलिक स्वभाव के अनुरूप  रहने के आदी हो जाते हैं। इनका स्थान ही परिवर्तन कर दिया जाए तो  ये या तो पागल हो जाएंगे या मर ही जाएंगे।
अच्छा-बुरा और ज्ञान-अज्ञान हो या फिर प्रकाश या अंधेरा, विवेकी मनुष्य के लिए इन सभी बातों का कोई मूल्य होता है, अविवेकी और अज्ञानियों, स्वेच्छाचारियों और उन्मुक्त भोगियों के लिए ये सारी बातें बेमानी ही हैं।
इन मलीनकर्मा लोगों को वही सब अच्छा लगता है जो अपने स्वभाव के अनुरूप करते आ रहे हैं। आम तौर पर आदमी वही करता है जो पुरानी पीढ़ी से संस्कारों में प्राप्त होता है।
कुछ बिरले ही होते हैं जो परंपरागत धाराओं से अलग हटकर कुछ ऎसा नया कर दिखाने का माद्दा अपने में पैदा कर लिया करते हैं कि जिससे पूरी दुनिया अचंभित होकर देखने लगती है।
यों देखा जाए तो सभ्यता और संस्कृति के उत्तरोत्तर विकास के दौर में आज का इंसान पुराने लोगों से क्रमिक रूप से अधिक से अधिक समर्थ, बुद्धिमान और पैदाइशी हुनरमंद है और तरक्की के बीज उसकी आनुवंशिक यात्रा में शामिल होते जा रहे हैं।
इस दृष्टि से हर इंसान को हमेशा ऎसा कुछ करना चाहिए कि जो गुणवत्ता, विश्वमंगल तथा लोक कल्याण के लिहाज से कुछ नया और विशिष्ट ही हो। बहुत सारे लोग ऎसे होते भी हैं जो नया और ताजा करने में विश्वास रखते हैं और इस जिजीविषा के साथ जीते हैं कि दुनिया में आए हैं तो कुछ नया करके जाएं, ताकि पीढ़ियाँ याद रखें और विश्व तथा समुदाय को उनकी देन हमेशा आनंदित व विकसित करती रहे।
आज मौलिकता तो खूब भरी पड़ी है लेकिन सांसारिक विकारों चकाचौंध और स्वार्थ ने आदमी को भीतर से इतना खोखला करके रख दिया है कि वह और कुछ करना चाहता ही नहीं है सिवाय अपने नाम से जमा करते रहने के।
इस मामले में हर तरफ भांति-भांति के लोग हैं जो अपने हिसाब से चलना और चलाना चाहते हैं तथा इसमें दूसरों का हस्तक्षेप उन्हें कतई बर्दाश्त नहीं होता। ये लोग हमेशा इसी भ्रम में जीते हैं कि संसार में वे ही या तो भगवान हैं अथवा भगवान के मनोनीत प्रतिनिधि।
मानवी समुदाय को ध्रुवीकरण कर देखें तो साफ तौर पर दो पक्ष सामने आते हैंं। एक धड़े में वे हैं जो मातृभूमि के लिए कुछ करना चाहते हैं और लोकमंगल के लिए प्रयोगधर्मा व्यक्तित्व को स्वीकार कर लिया करते हैं। ऎसे लोग हमेशा कुछ न कुछ नया और प्रभावी काम करते ही रहते हैं और इन्हें अपने सहकर्मियों, मित्रों तथा आस-पास रहने और जानने वालों से यह स्वाभाविक अपेक्षा हमेशा रहती ही है कि वे उनके कामों में मददगार भले न बन पाएं, कम से कम निंदा और बाधाएं पैदा करने का काम तो नहीं करें। 
पर मानव का स्वभाव ही ऎसा है कि वह खुद कुछ नहीं करना चाहता, जिंदगी में अधिकांश समय तमाशबीन रहकर चुपचाप देखना चाहता है और नकारात्मक प्रतिक्रियाएं करना चाहता है।
इस स्थिति में जिन लोगों की रुचि कर्मयोग में रमी हुई है उनके लिए एक ही रास्ता है कि बाहर के दरवाजों और गलियों से आने वाली हवाओं पर कान न धरें, चुपचाप अपने काम करते रहें। एक न एक दिन ऎसा आता ही है कि जब कर्मयोग परिपक्व होकर सुगंध बिखेरता है और वह भी किसी सीमित दायरे में नहीं बल्कि दूर-दूर तक।
इस स्थिति में कई बार कर्मयोगियों के मन में भटकाव और पलायन की भी भावनाएं रह-रहकर हिलोरें लेती दिखायी देती हैं। लेकिन इन क्षणिक आवेगों के प्रति पूरी तरह बेपरवाह होकर ही जीवन के लक्ष्यों को पाया जा सकता है।
अपने कर्म के प्रति निष्ठा और मौलिक हुनरों का प्रयोग ही आदमी को सशक्त और समर्थ बनाता हुआ महा आनंद की भावभूमि तक ले जाता है। इस सत्य को हर क्षण जानने का प्रयास करना चाहिए। दूसरे चाहे कुछ करें, करते रहे, यह उनकी मौलिकता है। खुद न उनसे प्रभावित हों, न उनकी तरह बन जाने की कभी कल्पना करें। 
इन स्थितियों में उन लोगों को भी उपेक्षित कर दिया करें जो ताजी हवाओं और सुगंधित कर्मयोग को आकार दे पाने से मुँह मोड़ते हैं और अपनी पुरातन परंपरा में सड़ते हुए जीने के आदी हैं।  ये लोग न कभी सुधर सकते हैं, न इनमें सुधार लाने का माद्दा पैदा करना संभव है क्योंकि एक बार जब कोई इंसान अपने आपको किसी फ्रेम या साँचे में ढाल देता है फिर उससे बाहर निकाल पाना मुश्किल है।
वह जिंदगी भर इसके इर्द-गिर्द रहता है और मरने के बाद भी इसी फ्रेम में रखा रहता है, जहाँ साल भर में दो-चार बार कभी कोई पुष्पांजलि चढ़ा देता है या किसी अज्ञात भय के मारे पितर मानकर श्राद्ध में एक बार बेमन से ही सही, तिलक कर दिया करता है।
 फिर भगवान ने जिन लोगों के भाग्य में कुछ नया और कल्याणकारी काम करने का श्रेय या कर्मयोग की सुगंध लिखी ही नहीं है, उन दुर्भाग्यशालियों को सुधारने और अपने हिसाब से ढालने का काम करना परमात्मा के विधान का खुल्ल्मखुल्ला उल्लंघन ही है।
जो जैसा है वैसा ही स्वीकार न भी कर पाएं तो चलेगा, मगर उन्हें अपने हिसाब से ढालने की कल्पना तो एकदम  त्याग ही देनी चाहिए ।
सार यही है कि अपनी शक्ति अपने कर्म में लगाएं, दूसरों को प्रसन्न रखने के जतन में अपनी ऊर्जा खर्च करने का स्वभाव त्यागें और उन्हें भगवान पर छोड़ दें।  न औरों के हिसाब से ढलें, न दूसरों को अपने हिसाब से ढालने का प्रयास करेंं। यह सत्य आज समझ में आ जाए तो ठीक है, वरना संसार से लौटते समय तो समझ में आ ही जाने वाला है। क्यों न अभी और आज ही सत्य का आश्रय स्वीकार कर लें।

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