Sunday, 22 February 2015

भरोसे काबिल नहीं झूठे और झूठन चाटने वाले

आलेख (20 फरवरी 2015 के लिए)
भरोसे काबिल नहीं
झूठे और झूठन चाटने वाले
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
हर इंसान अपने जीवन में कुछ न कुछ पाना चाहता है। चाहे बात व्यक्तियों की हो, विषयों की या फिर किसी भी प्रकार की चल-अचल संपदा की। इन्हें पाने के दो ही सीधे रास्ते हैं। एक तो यह कि अपनी काबिलियत और पुरुषार्थ से इन्हें हासिल करने का शुचितापूर्ण प्रयास किया जाए।
इस मार्ग से प्राप्त उपलब्धि जीवन भर शाश्वत आनंद प्रदान करती है। दूसरा रास्ता यह है कि अपनी सारी मानवीय संवेदनाओं, नैतिकताओं, आदर्शों और सिद्धान्तों की बलि चढ़ाकर उन तमाम रास्तों को अंगीकार कर लिया जाए जिन्हें इंसान के लिए वर्जित माना गया है।
इन रास्तों को नकारात्मक के साथ ही हीन माना गया है। लेकिन अधिकांश लोगों की फितरत में आजकल यही रास्ता सहज स्वीकार्य और सरल माना जाने लगा है।  हालांकि इस छोटे रास्ते या पिछले दरवाजे से आनंद लुटाने का मार्ग दिखाने वाला यह रास्ता जल्दी सधता है और इसमें कुछ अधिक मेहनत भी नहीं करनी पड़ती है इसलिए अधिकांश लोग इसे ही अपना लेते हैं।
आजकल हर इंसान को लगता है कि समय कम है और ऎसे में जितना अधिक से अधिक अपने नाम कर लिया जाए, संचित हो जाए या लूट लिया जाए, वह श्रेष्ठ है और ऎसा करना ही ये लोग जीवन का चरम और परम लक्ष्य मानते हैं।
पवित्रता के रास्ते होने वाली हर प्राप्ति जीवन भर आत्म आनंद से भरे रखती है जबकि अपवित्र और वज्र्य रास्तों का इस्तेमाल करने के लिए मानवीय संवेदनाएं, नैतिक मूल्य और आदर्श सब कुछ छोड़ने पड़ते हैं और ऎसा करने के लिए धर्म और सत्य का आचरण त्यागना ही पड़ता है।
अधर्म और असत्य का आश्रय ही नापाक इरादों को अपने करीब खींच लाने का सामथ्र्य रखता है और ऎसा करने वालों के लिए जीवन का कोई अर्थ नहीं रह जाता सिवाय अपने आनंद, भोग-विलासिता और संपन्नता पाने के।
इंसान के लिए जब भी सिद्धान्त और आदर्शों से कहीं अधिक लक्ष्य और सफलता के भाव जगने लगते हैं तब उसके लिए कोई सा कर्म अकर्म नहीं रह जाता। सारे कर्म सहज स्वीकार्य कर्म की श्रेणी में आकर अपनी आदत में शुमार हो ही जाते हैं।
जब एक बार कोई मुट्ठी खोल देता है फिर उसके लिए संसार का कोई सा काम न हीन होता है, न अस्वीकार्य। देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप पूरी तरह ढल जाने की मानसिकता पाल लेने वाले लोगों के लिए सारा संसार अपना है, चाहे जिसका उपयोग या उपभोग करें।
कोई भी अपने काम साधने या आनंद पाने के लिए कुछ भी करे, करता रहे, किसी को इससे कोई सरोकार नहीं है लेकिन इसकी वजह से सामाजिक सरोकारों और दायित्वों की पूर्ति के प्रति किसी भी प्रकार की उदासीनता और शिथिलता आने का सीधा सा अर्थ यही है कि व्यक्ति के लक्ष्यों का रूपान्तरण हो चुका है।
इस बदलाव से कई सारे परिवर्तन अपने आप नज़र आने लगते हैं। जो लोग धर्म, ईमानदारी और सच्चाई पर चलते हैं उन लोगों के पास भले ही अनाप-शनाप धन-दौलत या वैभव की कमी दिखे, लेकिन उनके खाते में पाप भी कम ही होते हैं और जो हैं वे पाप भी वही होते हैं जो अनायास हो चुके होते हैं अथवा दूसरों को खुश करने के लिए होने वाले कर्म से।अन्यथा ऎसे लोगों का जीवन शुचितापूर्ण ही होता है और यही शुचिता आत्मतोष और आनंद की प्राप्ति कराती है।
दूसरी अवस्था में जो लोग अपने आनंद या वैभव के लिए अन्यान्य मलीन मार्गों और हीन व निंदित कर्मों को अपनाते हैं उनका कोई सा कार्य झूठ के बिना पूरा नहीं होता। इन लोगों को तकरीबन हरेक कर्म को पूर्णता प्रदान करने के लिए झूठ का सहारा लेना पड़ता है। और एक बार जब कोई झूठ बोलना आरंभ कर देता है तब उसके लिए झूठ सामान्य दिनचर्या का अहम् हिस्सा बन जाता है जिसके बगैर उसका दिन पूरा ही नहीं हो सकता। इस तरह रोजाना कई-कई बार झूठ बोलना इनके व्यक्तित्व का अंग बन जाया करता है।
हर झूठ जीवात्मा के पापों वाले खाते में जुड़ता चला जाता है और इस तरह इंसान की पूरी जिन्दगी पापों के पहाड़ पर टिकने लगती है। झूठ का आश्रय पाकर सफलता और आनंद का वरण करने वाला इंसान भले ही इस खुशफहमी में रहे कि वह औरों को भ्रमित करने में कामयाब हो गया है तथा झूठ की वजह से आनंद और भोग की प्राप्ति के सारे रास्ते निरापद हो चुके हैं, मगर असल बात यह है कि झूठ की बुनियाद पर किसी को आनंद या भोग अथवा सफलता की प्राप्ति संभव नहीं है, जो क्षणिक आनंद प्राप्त होने लगता है वह मात्र आभासी ही होता है जबकि इसके परिणाम अत्यन्त दुःखदायी ही होते हैं। ऎसे झूठ की असलियत सभी को पता चल जाया करती है।
कई बार झूठ बोलने वाले लोग ऎसे अकल्पनीय झूठ बोल जाते हैं कि किसी को भरोसा ही नहीं होता। झूठ बोल कर अपने आपको शातिर और माहिर समझने वाले लोगों को शायद यह पता नहीं होता कि कई बार बोला गया झूठ और बहाना भी किसी विशेष घड़ी का संयोग पाकर सत्य हो जाते हैं।
हर इंसान के जीवन में ऎसे काफी सारे क्षण आते हैं जब उसके द्वारा सोची या कही गई कोई सी बात सत्य हो ही जाती है। लेकिन जिन लोगों का पूरा जीवन ही झूठ और झूठन के सहारे चल रहा है उन्हें सत्य से क्या लेना-देना। इन लोगों को सदैव प्रत्यक्ष लाभ, भोग और आनंद ही नज़र आते हैं और इनकी प्राप्ति के लिए झूठ बोलना इनके लिए झूठ नहीं होकर सुविधा ही हो गया है।
जो लोग अपने छोटे-मोटे लाभों, भोग, आनंद और स्वार्थों के लिए बड़े-बड़े झूठ का सहारा लेते हैं उन पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता। क्योंकि जब झूठ को अहम अपना संगी साथी बना लेते हैंतब वह अकेला नहीं होता। उसके साथ अविश्वास, स्वार्थ, कुटिलता, मलीनता, असंतोष, उद्वेग, अन्याय, अनाचार, शोषण, कर्महीनता, आत्महीनता, अपराध बोध और दूसरे सभी प्रकार के विकार भी साथ होते हैं जो हर झूठ को परिपुष्ट करते हुए इंसान को ताजिन्दगी भ्रमित रखने में अहम् भूमिका अदा करते हैं।

झूठ का आश्रय पाने वाले लोग अपने मामूली स्वार्थ या आयातित आनंद की प्राप्ति के लिए कभी भी कुछ भी कर सकने वाली स्थिति में होते हैं क्योंकि उन्हें अपने सबसे ताकतवर हथियार के रूप में झूठ पर सबसे अधिक भरोसा होता है। यह भी सच ही है कि झूठ ज्यादा दिन तक नहीं चल पाता, कभी न कभी तो परदे गिरने ही हैं।

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