Saturday, 31 January 2015

गर्त में ले जाते हैं ये पाताल कूए

आलेख ( 31 जनवरी 2015 के लिए)
गर्त में ले जाते हैं
ये पाताल कूए
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
नई पीढ़ी ने शायद पाताल कूओं का नाम न भी सुना हो लेकिन पुरानी पीढ़ी के लोग इनसे अच्छी तरह परिचित हैं।
पुराने जमाने में कल्पना से भी अधिक बहुत गहरे तक होने वाले कूओं को पाताल कूओं की संज्ञा दी जाती रही है और ऎसे खूब सारे कूए प्राचीन काल में बने और उपयोग में आते रहे।
इन कूओं का अस्तित्व और उपयोग धीरे-धीरे समाप्त होता चला गया। अब इंसानी जिस्म में पाताल कूओं का वजूद सभी स्थानों पर बढ़ता जा रहा है। ये पाताल कूए भी स्वभाव, कर्मयोग और व्यक्तित्व के मामले में भले ही कतई गंभीर न हों, छिछोले और उथले हों, मगर अपने को सौंपे गए तकरीबन हर काम के प्रति पाताल कूओं की ही तरह पेश आते हैं।
कोई सा काम कितना ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, इन पाताल कूओं के लिए कोई मायने नहीं रखता। पाताल कूओं को अपनी संकीर्ण परिधि में रहने और गोले घेरों से निरन्तर प्रतिध्वनित होती रही किसम-किसम की आवाजों में ही रमे रहने की ऎसी आदत हो जाती है कि ये इन परंपरागत दकियानूसी दायरों और रुदाली की आवाजों से ऊपर नहीं उठ पाते।
इन्हें रोजाना कुछ न कुछ नया सुनने, देखने और चर्चा करने को चाहिए ही होता है अन्यथा पाताल कूए मौत की आगोशी ओढ़ लिया करते हैं। पाताल कूए अपने भीतर और बाहर दोनों तरफ की हलचलों के प्रति तीखे कान वाले होते हैं।
ये कुछ करें या न करें, सुनने, देखने और चर्चाओं में रमे रहने की इनकी तलब नाल कटने से ही शुरू हो जाती है।  अपने फर्ज के प्रति चौकन्ने भले न रहें, मगर बाहरी हरकतों और हलचलों का पूरा और अपडेट रिकार्ड इनके पास बरसों तक सुरक्षित रहता है।
जब ये मरते हैं तब भी इनकी आत्मा को इनसे जुदा होने में कष्ट का अनुभव होता है क्योंकि इनके दिमाग में जाने कितनी सारी जंग लगी पुरानी आल्मारियों के कबाड़ की तरह पूरी दुनिया का कचरा भरा होता है।
ये पाताल कूए पूरी दुनिया में विद्यमान हैं। भारत में ऎसे पाताल कूओं की जबर्दस्त भरमार है। ये पाताल कूए गांवों-कस्बों से लेकर नगरों, महानगरों और राजधानियों तक बड़ी संख्या में विद्यमान हैं और बड़े मजे से अपनी चवन्नियां चला रहे हैं।
हर प्रकार के बाड़ों और गलियारों, परिसरों और परिवेश तक में सभी स्थानों पर ये पाताल कूए विद्यमान हैं।  कहने को ये पाताल कूए जमीन से गहरे तक जुड़े हुए हैं मगर जमीनी हकीकत से इनका कभी कोई लेना-देना नहीं रहता।
ये हमेशा अपने अहंकार के गुब्बारों पर सवार होकर आसमान की ऊँचाइयाँ पाने हवा में ही उड़ते रहने के आदी होते हैं। ऎसे पाताल कूओं से हम भी अच्छी तरह वाकिफ हैं लेकिन कुछ कह नहीं पाते हैं क्योंकि पाताल कूओं का आजकल सभी जगह भारी बहुमत है।
किसी को कोई सी बात कहो, कोई सा काम बताओ या किसी भी प्रकार का कितना ही जरूरी कागज पकड़ाओ और इससे जुड़ी कार्यवाही संपादित करने को कहो, ये बड़ी खुशी-खुशी हाँ-जी, हाँ जी करते हुए उस समय बात भी मान लेते हैं, काम भी स्वीकार लेते हैं लेकिन इसके बाद न उस बात का कोई पता चल पाता है, न काम का। और जो कागज दो, वे चले जाते हैं हमेशा-हमेशा के लिए पाताल कूए में। जहाँ एक बार कुछ गिर गया तो फिर दुबारा बाहर निकलने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
हम ऎसे खूब लोगों को जानते हैं जो पाताल कूओं की ही तरह व्यवहार करते हैं, जो काम या कागज उनके हवाले आ जाता है वह जाने किस फाईल, आल्मारी या दराज में हमेशा-हमेशा के लिए दफन हो जाता है।
हर काम और कागज को ये पाताल कूए अपने आगोश में ऎसे छुपा देते हैं जैसे कि इनका अब संसार में कोई काम ही नहीं रह गया हो। एक बार जो कोई इंसान अपने आपको पाताल कूए में तब्दील लेता है फिर जिन्दगी भर उसकी यह तलब बनी रहती है। न उससे कोई काम हो सकता है, न कोई करा सकता है। प्रलोभन और दबाव से करा लिया जाए, यह बात अलग है।
हममेें से खूब सारे लोग इन पाताल कूओं से परेशान हैं। इन पाताल कूओं में न शर्म बची है, न इनमें पानी रहा है। पाताल कूओं की वजह से अब हर तरफ पानी सर के ऊपर से गुजरने लगा है। पाताल कूओं को अपनी इस आदत या गंभीर महामारी से भले कोई फर्क नहीं पड़ता हो, उनकी सेहत पर इसका कोई असर हो न हो, संस्थान, समाज और देश के लिए ये पाताल कूए ऎसे नासूर हैं जो गर्त में ले जाने वाले हैं।
पहले कुछ ही पाताल कूओं का पता रहता था, आज खूब सारे पाताल कूए हर बाड़े में पूरी हैंकड़ी, अकड़ और शान से तने हुए बिराजमान हैं। पाताल कूओं के साथ बर्ताव का दूसरा संकट यह भी है कि ये कुछ लोगों और कुछ फीट के घेरों में ही रहने और बतियाने के आदी हैं और प्रतिध्वनियों के सहारे ही जीने का माद्दा बनाये हुए हैं। इसलिए बाहर से झाँक कर कोई कितना ही खरा-खोटा सुना दे, इन पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
और यही कारण है कि सारे के सारे पाताल कूए बेशर्म, बेपरवाह और हद दर्जे के निर्लज्ज बने हुए पूरी निरंकुशता के साथ बाड़ों में प्रतिष्ठित होकर सुख भोग रहे हैं।  इनकी वजह से जाने कितने लोग रोजाना इन्हें गालियाँ बकते हुए, श्राप देते हुए समाज और देश को सुधारने के जतन में लगे हुए हैं।
अर्से से यह सब देखा-सुना और भुगता जा रहा है। अब बहुत जरूरी हो चला है कि इन सारे के सारे पाताल कूओं पर मिट्टी डाली जाए, भर दिया जाए ताकि सामाजिक और परिवेशीय व्यवस्थों की और अधिक मिट्टी पलीत न होने पाए। यही आज की सच्ची समाज सेवा और देशभक्ति है।

Friday, 30 January 2015

सम्मानितों से पाएं प्रेरणा

आलेख (30 जनवरी 2015 के लिए)
सम्मानितों से पाएं प्रेरणा
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
हर इलाके में कई सारी बहुआयामी प्रतिभाएं होती हैं जो समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कुछ न कुछ अच्छे कार्यों में रमी रहती हैं और दूसरों से अलग हटकर अपने व्यक्तित्व को निखारती हैं। इन प्रतिभाओं में खूब सारी विशेषताएं होती हैं लेकिन हम उन्हें सामान्य समझ कर उपेक्षित कर दिया करते हैं जबकि ऐसे व्यक्तित्वों से प्रेरणा पाकर हम अपने जीवन को सँवार सकते हैं और हम भी ऐसे काम कर सकते हैं जिनसे हमारा नाम हो, हमारे परिजनों को खुशी हो, हमारे अपने क्षेत्रा को गौरव प्राप्त हो तथा हमारे श्रेष्ठ कर्मों की गौरवशाली परंपराएँ हमेशा विद्यमान रहें। हमारे आस-पास जो हुनरमंद लोग हैं, जिनमें ज्ञान, कर्म या और किसी भी प्रकार की कोई और विलक्षण प्रतिभाएं हैं उन्हें सच्चे मन से स्वीकारें। हमारी स्थिति ऐसी हो गई है कि हम अपने आस-पास की प्रतिभाओं को पहचान नहीं पाते हैं और उनके प्रति उदासीन रहते हैं या सायास-अनायास उपेक्षित कर दिया करते हैं। दरअसल हम आदमी को पहचानने की क्षमता खो चुके हैं और यही कारण है कि उसकी क्षमताओं के प्रति नगण्य भाव बनाए रखते हैं। हमें किसी आदमी की काबिलियत का पता तब चलता है कि जब वह राजमान्य या राज्याश्रित होने लगता है। इसके बाद ही उसकी लोक मान्यता बढ़ने लगती है। इससे पहले लोक मान्य नहीं होता, यह आज के समाज की दुरावस्था का नमूना है। जबकि होना ठीक इसके उलट चाहिए। पहले लोक मान्य हो तब राजमान्य हो।  साल भर में 26 जनवरी, 15 अगस्त और दूसरे खूब सारे मौके ऐसे आते हैं जब किसी न किसी प्रतिभा को सम्मान और अभिनंदन से नवाजा जाता है, पुरस्कृत किया जाता है। पिछले कई वर्षों से यह क्रम बना हुआ है और इसे देखते हुए कोई इलाका ऐसा नहीं बचा होगा जहाँ तादाद सैकड़ा या हजार पार न कर गई होगी। इस स्थिति में यह तो तय माना ही जाना चाहिए कि सभी जगह काबिल और हुनरमंद, लोकमान्य और राजमान्य लोगों की कोई कमी नहीं है। इन प्रतिभाओं का लाभ पाकर हम कुछ न कुछ सीख सकते हैं, हुनर पा सकते हैं और इनके ज्ञान तथा अनुभवों का लाभ पाकर आगे बढ़ सकते हैं, हजारों दूसरों को सीखा सकते हैं और इस प्रकार अपने इलाके, समाज और देश सभी को इतनी तरक्की दे सकते हैं कि जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी। लेकिन  इतनी सारी प्रतिभाओं का समृद्ध भण्डार अपने यहाँ मौजूद होने के बावजूद इनका कोई लाभ हम प्राप्त नहीं कर पाएं तो यह हमारा ही दुर्भाग्य कहा जाएगा। हम सभी का फर्ज है कि अपने इलाके से अब तक सम्मानित हो चुकी सभी प्रकार की हस्तियों का लाभ पाएं और उनसे प्रेरणा प्राप्त कर जीवन को सँवारें तथा सामाजिक विकास के साथ देश का गौरव बढ़ाने के लिए प्रयास करें।
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Thursday, 29 January 2015

मुश्किल है मुर्दों में जान फूँकना

आज का आलेख ( 29  जनवरी 2015 के लिए)
मुश्किल है
मुर्दों में जान फूँकना
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
मुर्दों को साफ तौर पर दो किस्मों में विभक्त किया जा सकता है। एक वे हैं जिनका शरीर वाकई मृत है और अंतिम संस्कार के बाद इनके लौटने की कोई संभावना नहीं होती। इन मुर्दों से किसी को कोई खतरा नहीं होता, लोग इन्हें कुछ समय बाद भूल जाते हैं।
दूसरी किस्म है उन लोगों की जिनमें जान तो होती है लेकिन मुर्दों की तरह ही पड़े रहते हैं। जान होने के बावजूद इन्हें जानदार नहीं कहा जा सकता। ये लोग हमेशा जैसे हैं वैसे ही बने रहना चाहते हैं, कभी नीम बेहोशी में होते हैं, कभी बिजूकों की तरह व्यवहार करते हैं, कभी किसी न किसी मद के मारे मदमस्ती और कभी खुमारी में जीने के आदी हो जाते हैं।
इनकी सबसे बड़ी ख़ासियत यही होती है कि ये न अपनी ओर से कभी कुछ करते हैं, न करने ही देते हैं। यथास्थितिवाद और जड़ता के साथ अंधकार के पहरुओं की तरह हर तरफ ऎसे मुर्दे हममें से हर किसी को देखने को मिल ही जाते हैं।
फिर जहाँ मुर्दें होंगे वहाँ सडान्ध भी होगी और शोक का माहौल भी। हर मुर्दा अपने साथ कोई न कोई सडान्ध या शोकाकुल आभामण्डल स्वाभाविक रूप से रखता ही है। ये नहीं है कि ये मुर्दे हर क्षण यों ही पड़े रहते हों, इन मुर्दों में अक्सर जान भी आ जाती है और ये कभी बोल उठते हैं, कभी रो या चिल्ला उठते हैं और कभी भागने भी लगते हैं।
लेकिन ऎसा होना तभी संभव है जब मुर्दों के लिए कहीं से कोई गुलाब, झुनझुना, सुगंध या प्रलोभन का कोई सा मामला सामने दिखने लगा हो। मुर्दों की दौड़ भी लगनी शुरू हो जाती है यदि कोई बड़ा लाभ या आनंद पाने का मामला हो।
मुर्दों का अपना संसार है, अपने सहचर हैं और अपने-अपने डेरे। मुर्दो का मायावी संसार आजकल सब तरफ फैला हुआ है। जान होते हुए बेजानी में जीने वाले ऎसे आत्म स्वीकृत मुर्दों के कारण ही समाज और देश कई विषमताओं से ग्रस्त है, शोक का माहौल पसरा हुआ है । न आदमी के चेहरों पर कोई मुस्कान तैरती दिखती है, न परिवेश में कोई खिलखिलाहट।
आत्म मुर्दानगी ओढ़ चुके मुर्दों की वजह से कार्य संस्कृति को जबर्दस्त बट्टा लग रहा है वहीं भारतीय स्वाभिमान, ऊर्जा और सामथ्र्य का भी ह्रास होने लगा है। मुर्दों को मरघट पसंद हैं और वे चाहते हैं सब तरफ मरघट ही मरघट पसरे हुए हों ताकि मुर्दों की सत्ता का प्रसार हर किसी को नज़र आ सके। 
आजकल तो इन कृत्रिम मुर्दों के कई-कई चेहरे हमारे सामने आ रहे हैं। इन्हें देखकर लगता है कि जैसे मुर्दों की विचित्र वेशभूषा या नुक्कड़ नाटक की कोई बड़ी भारी प्रतिस्पर्धा हो रही हो।
मुर्दाल रहने वाले सारे के सारे लोग मुर्दों की तरह गमगीन, मायूस और निस्तेज हो जाते हैं और इनकी वजह से परिवेश भी दुर्गन्धियाने लगता है। अधिकांश लोग अपने बारे में कोई न कोई संकीर्ण दायरा तय कर लिया करते हैं।
यही दायरा उनकी सारी अपार संभावनाओं, व्यक्तित्व के विराट स्वरूप और सामर्थ का क्षरण कर इन्हें छोटी सी किसी ऎसी परिधि में बाँध देता है जहाँ ये दिन-रात दौड़-भाग करते हुए अपने आपको तरक्की पसंद इंसान के रूप में विख्यात करने की कोशिशें करते रहते हैं।
यह ठीक वैसा ही है जैसे कि कोई आदमी रोजाना अपने मकान की छत या गाँव-शहर के किसी मैदान में रोज कई-कई चक्कर लगा कर अपने आपको धावक के रूप में प्रतिष्ठत होने का कोई स्वप्न संजोये।
इंसान के लिए कोई दुश्मन नहीं होता। वही अपने आप का शत्रु होता है क्योंकि वह अपने को किसी दायरे में बाँध कर आसमान की ऊँचाइयां पाने के भ्रम में जी रहा होता है। यह वह  अवस्था होती है जिसमें कोई भी यह भेद नहीं कर सकता है कि इंसान जीवित है या मुर्दा।
आजकल मर्दानगी की बजाय मुर्दानगी हावी होने लगी है। कोई सा काम देख लीजियें, आधे आसमाँ पर ही जाकर अटक जाता है सब कुछ। घर-गृहस्थी या खेती-बाड़ी का काम हो या फिर मेहनत-मजूरी या नौकरी से जुड़ा कोई सा काम या धंधा।
 हर तरफ आदमियों की गुणवत्ता में गिरावट आने लगी है, कामचोरी और निकम्मेपन का ग्राफ बढ़ता जा रहा है।  यही कारण है कि आदमी मुर्दों की तरह व्यवहार करने लगा है या फिर ऎसा व्यवहार करने लगा है जैसे कि वेंटीलेटर पर पड़ा-पड़ा अंतिम साँस गिन रहा हो।
चारों तरफ उत्साह, ऊर्जा और उल्लास की बजाय तनाव, विषाद, बीमारी, क्रोध और शोक जैसा माहौल छाने लगा है और इस वजह से कर्मयोग की शक्ति क्षीण होती जा रही है।
समाज और देश को आज सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि उन लोगों में जान फूँकें जो मुर्दों की तरह व्यवहार करने लगे हैं, कुछ करना ही नहीं चाहते, और निस्तेज होते जा रहे हैं। यह काम आज नहीं हो पाया तो ये मुर्दें न मुर्दे रह पाएंगे, न इंसान ही बन पाएंगे। फिर इनकी अंतिम गति भूत-प्रेत की ही होने वाली है, इससे कोई और नहीं बचा सकता।

Wednesday, 28 January 2015

पैसा ही दिखता है कर्म या फर्ज नहीं

आलेख ( 28 जनवरी 2015 के लिए)
पैसा ही दिखता है
कर्म या फर्ज नहीं
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
पैसा हमेशा मेहनत के बाद आता है। वही पैसा लाभकारी है जो पुरुषार्थ से अर्जित हो अन्यथा बिना पुरुषार्थ का प्राप्त हुआ धन हमें धनाढ्यों की श्रेणी में तो रख सकता है लेकिन धन होने का आनंद नहीं दे सकता।
धन होना और धनाढ्य कहलाना आसान है लेकिन धन की प्राप्ति का आनंद और ऎश्वर्य पाना सब के बस में नहीं है। धन-वैभव का असली आनंद वही प्राप्त कर सकते हैं जो कि मेहनत से कमाई करते हैं और जिसमें इनका तन-मन, परिश्रम और समय लगता है।
आजकल लोग धन सम्पन्न तो होते जा रहे हैं लेकिन धन होने की खुशी या आनंद उनके चेहरों से गायब है और हर क्षण यही भय सताता रहता है कि कहीं कुछ चोरी न हो जाए, कमी न पड़ जाए।
अधिकांश धनाढ्य चौकीदारों की तरह जीवन बिताते हैं जिसमें हर क्षण उनका दिमाग इसी चौकीदारी में लगा रहता है कि कहीं कुछ कमी न पड़ जाए।  इस चौकीदारी के नशे में उनके जीवन के सारे आनंद पलायन कर जाते हैं और ये लोग सिर्फ अपने आपको सम्पन्न होने का भ्रम पाले हुए आत्म अहंकार से ग्रस्त होकर जीवन का लक्ष्य भी भुला बैठते हैं और आनंद भी।
धन का होना और उपयोग करना दोनों अलग-अलग बाते हैं। मेहनती और कर्म के प्रति वफादार लोगों के पास धन रहता भी है और वह धन इन्हें आनंदित भी करता है क्योेंकि धन का उपयोग करने के सारे रास्ते इनके लिए अपने आप खुले हुए होते हैं जो कि उदारतापूर्वक धन खर्च कराते हैं ।
अधिकांश धनाढ्य अपने धन को खर्च नहीं कर पाते हैं बल्कि इनके धन पर दूसरे ऎसे लोग मौज उड़ाते हैं जिनमें कमाने-खाने की कुव्वत नहीं होती और ये लोग पूर्वजन्म के किसी लेन-देन के चक्कर में पैदा हो गए होते हैं।
इस अवस्था में यह कहना सही नहीं है कि धनाढ्य सुखी रहते हैं और दूसरे दुःखी। पुरुषार्थ से अर्जित धन ही सुख देता है  जबकि बिना मेहनत से कमाया, चुराया हुआ, डकैती या भ्रष्टाचार करके जमा किया हुआ धन हमेशा दुर्गति और दुःखों के साथ शोक और विनाश का कारण बनता है।
धन-सम्पत्ति के मामले से साफ जान लेना चाहिए कि जो व्यक्ति अपने फर्ज अच्छी तरह निभाता है, अपने कर्मयोग या ड्यूटी के प्रति निष्ठावान रहता है वही असली धनवान है क्योंकि उसके पास उदारता, दूसरों के प्रति मानवीय संवेदनशीलता और सज्जनता है और यही उसका असली धन कहे जा सकते हैं।
अनाप-शनाप दौलत होने के बावजूद उदारता और मानवीय मूल्यों का समावेश न हो तो ऎसे व्यक्ति का दौलतमंद होना किसी काम का नहीं। ये लोग बैंक लॉकर के चौकीदार ही होकर रह जाते हैं जहां द्रव्य तो खूब है पर अपने किसी काम का नहीं।
आजकल हर जगह आदमियों की ऎसी खेप आ गई है जिसे अपने फर्ज और कर्म की कुछ नहीं पड़ी है, कुछ करना नहीं चाहते। चाहते यही हैं कि बैठे-बैठे सब कुछ मिलता रहे, काम धेले भर का कुछ करना न पड़े। ऎसे लोगों की मौजूदगी सब तरफ है। कोई गली-चौराहा, राजमार्ग और सिक्स लेन, सर्कल या चौराहा, कोई सा बाड़ा या गलियारा ऎसा नहीं बचा है जिसमें इस प्रजाति के प्राणी न पाए जाते हों।
इन लोगों से न अपनी निर्धारित ड्यूटी होती है, न मेहनत कर सकते हैं, न किसी को प्रोत्साहन दे सकते हैं, न किसी की बिना पैसे लिए कोई मदद कर सकते हैं। इन लोगों को सब तरफ पैसा ही पैसा दिखता है।
गांधी छाप दिख जाए, सिक्कों की खनक सुन लें तो इनकी आँखें खुलती हैं और कुछ न दिखे तो बेसुध होकर अधमरे से पड़े रहेंगे। मुर्दों की तरह ऎसे पड़े रहेंगे जैसे कि जान ही नहीं बची हो। नीम बेहोशी भले न हो मगर ये ऎसे मरे हुए पड़े रहते हैं जैसे कि किसी गहरी समाधि में खो गए हों। जानबूझकर उदासीन पड़े रहने का स्वाँग कोई सीखे तो इनसे। जो सोये हैं उन्हें तो जगाया भी जा सकता है मगर उन लोगों को कौन जगाए जो सोने का अभिनय करते रहे हों।
तकरीबन सभी स्थानों पर ऎसे लोग विद्यमान हैं जिनके लिए मनुष्य होने का अर्थ ही अर्थसंग्रह होकर रह गया है। पैसा आने की उम्मीद दिख जाए तो घर-बाहर के सारे कामकाज भूलकर लपकों की तरह जुट जाएंगे और कुछ नहीं मिलने वाला हो तब सौ-सौ बहाने बनाकर भी दूर हो जाएंगे।
ऎसे फर्ज और कर्म से हीन लोगों के कारण से ही आज हमारा देश बदनाम है, समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। राष्ट्रीय चरित्र लुप्त होता जा रहा है और उसका स्थान ले लिया जेब चरित्र ने ।
हर कोई देश को खाली कर अपने घर भरने में लगा हुआ है।  जब तक पैसे को देखकर नाचने वाले, कीर्तन करने वाले, इंसानियत को गिरवी रख देने वाले, स्वाँग रचने वाले और सब कुछ करते रहने वाले लोग रहेंगे, इस देश का भगवान ही मालिक रहा है और रहेगा। पहले घर-परिवार, बंधुओं, भगिनियों, समुदाय और देश के प्रति अपने फर्ज को देखें, इनके लिए किये जाने वाले कर्म को देखें और अपने आपको फर्ज व कर्मप्रधान बनाएं, तभी हमारा और देश का भला हो सकता है।

Monday, 26 January 2015

गण को महसूस हो अपना तंत्र

आलेख ( 26 जनवरी 2015 के लिए)
गण को महसूस हो अपना तंत्र
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
आज गणतंत्र दिवस है। सभी भारतवासियों का अपना प्यारा और न्यारा पर्व है जो हमें अहसास कराता है कि जो कुछ तंत्र है वह हमारा अपना ही है।
यह अहसास ही वह ताकत है जिसके बूते भारतीय लोकतंत्र अपनी गरिमामय परंपराओं के लिए विश्व स्तर पर जाना और माना जाता रहा है। 
जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा जो कुछ होता है वही गणतंत्र का असली मकसद है।
यह आत्मचिन्तन हमें करने की आवश्यकता है कि गणतंत्र की नींव पड़ने के बाद से लेकर अब तक हम गणतंत्र को कितना परिपक्व महसूस कर पाए  हैं।
सारे भेदभावों और संकीर्णताओं से ऊपर हमारा यह गणतंत्र हमेशा बना रहे, उत्तरोत्तर गर्व तथा गौरव का अहसास कराता रहे, इन्हीं भावनाओं को और अधिक परिपुष्ट करने का दिन है आज का यह गणतंत्र।
प्रत्येक भारतवासी को दिल से यह महसूस होना चाहिए कि तंत्र उसी का है, उसी के अपने लिए है और इसी तंत्र के माध्यम से गणतंत्र और अधिक मजबूती के साथ उभरेगा।
गणतंत्रीय परिपाटियों और व्यवस्थाओं को मजबूती देने का काम हर गण का है और इसमें प्रत्येक देशवासी की सशक्त भागीदारी निभाने की आवश्यकता है।
वह समय चला गया जब हम द्रष्टा ही द्रष्टा होकर सब कुछ देखते रहने के आदी हो गए थे। अब समय बदला-बदला सा है और पूरा का पूरा तंत्र गण की ओर मुखातिब है। अब स्रष्टा होने और कुछ कर दिखाने का वक्त आ गया है।
बहुआयामी प्रयासों के साथ स्वाभिमानी तंत्र का नवीन दौर हमारे सामने है और इसमें न सिर्फ तंत्र बल्कि गण को भी अपने अधिकारों के साथ कत्र्तव्यों का स्पष्ट निर्धारण कर इनके निर्वाह का दायित्व समर्पित भाव से निभाना होगा।
बदले हुए परिवेश में गण और तंत्र दोनों को अपनी जिम्मेदारियों का तहे दिल से अहसास करना होगा तभी भारतीय गणतंत्र और अधिक सुदृढ़, लोक मंगलकारी और बहुआयामी भूमिकाओं से परिपूर्ण बनाया जा सकता है। 
अब पारस्परिक भागीदारी का युग परवान पर है जिसमें एकतरफा संवाद का जमाना लद चुका है। यह समय गण और तंत्र के बीच संतुलन के साथ ही दोनों के मध्य संवाद सातत्य, समन्वय और एक दूसरे के लिए पूरे मन से काम करने का है।
इसी से तय होगा लोकतांत्रिक परंपराओं के उत्कर्ष का नया दौर, जो न केवल भारतवर्ष बल्कि पूरे विश्व में गणतंत्र की नई और सुनहरी साख भी कायम करेगा और प्रेरणा का संचार भी।
गण को तंत्र के प्रति पूरा विश्वास हो तथा तंत्र को भी चाहिए कि वह गण के प्रति अपनी जवाबदेही पूरी पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ पूरी करे।
ऎसा होने पर ही गणतंत्र का आदर्श स्वरूप निखरकर सामने आ पाएगा। इस मामले में तंत्र की जिम्मेदारियां कुछ ज्यादा ही कही जा सकती हैं क्योंकि तंत्र की मौजूदा स्थिति गण के लिए भाग्यनिर्माता, संरक्षक और आश्रयदाता की कुछ ज्यादा कही जा सकती है।
इसलिए परस्पर आश्रित और निर्भरता के भावों की बजाय एकतरफा वजन कहीं नहीं होना चाहिए बल्कि पारस्परिक संतुलन के साथ काम होना चाहिए। यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
दोनों पक्षों को एक-दूसरे के प्रति आदर और श्रद्धा का भाव हो तथा दोनों का ही लक्ष्य जनमंगल और भारत उत्थान हो। सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ....।

Sunday, 25 January 2015

कभी न लें श्रेय

आलेख ( 25 जनवरी 2015 के लिए)
कभी न लें श्रेय
-  डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
यश-प्रतिष्ठा और श्रेय सभी लोग लेना चाहते हैं, लेकिन काम करना कोई नहीं चाहता। कुछ बिरले ही ऎसे होंगे जो किसी भी अच्छे कार्य में किसी प्रकार के प्रतिफल या  श्रेय की आकांक्षा नहीं रखते होंगे और श्रेय मिल जाने पर भी इससे स्पष्ट इंकार कर दिया करते हैं।
आजकल हर तरफ प्रचार का व्यामोह जबर्दस्त पसरा हुआ है, हर कोई चाहता है कि उसे बिना कुछ मेहनत किए-कराए लोकप्रियता प्राप्त हो जाए, लोग उसे पूजने लगें और स्वीकारते हुए श्रद्धा के साथ आदर-सम्मान प्रदान करते रहें। और यह आदर-सम्मान अथवा श्रद्धा किसी अवधि तक बंधी नहीं रहे बल्कि मरने तक पूजे जाते रहें और उसके बाद भी लोग याद रखते रहें।
बड़े-बड़े लोगोें में यही कामना होती है जो कि मरने के पहले से लेकर मरने के बाद तक यों ही बरकरार रहती है और खूब सारे लोग इन्हीं प्रकार की इच्छाओं के साथ देह त्याग देते हैं लेकिन भूत-प्रेत के रूप में हमारे इर्द-गिर्द आज भी विद्यमान हैं।
बहुत से ऎसे नाम पिपासु और तस्वीरों के भूखे, चरण स्पर्श करवाते रहने को हर क्षण उतावले रहने वाले लोग, श्रद्धा पाने के मोहताज किसम-किसम के याचक लोग हमारे देखते-देखते स्वर्ग (?) सिधार गए और ऎसे ही ढेरों लोग हमारे आस-पास भी बड़ी भारी संख्या में आज भी पसरे हुए हैं जिन्हें देख-देख कर कभी दया आती है, कभी इनकी हरकतों पर तरस आता है और कभी मूर्खता पर गुस्सा भी।
सभी प्रकार के जीव-जन्तुओं में मनुष्य नाम का एकमात्र कशेरूकी प्राणी ऎसा है जो कि  कशेरूका होते हुए भी अपने स्वार्थ और ऎषणाओं की पूर्ति के लिए इतना अधिक झुक जाता है जितने की अकेशरूकी प्राणी भी नहीं।
इन्हीं इंसानों की भयावह भीड़ में ऎसे लोग भी हैं जो कि श्रेय पाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं भले ही इनका योगदान हो या न हो। अक्सर ऎसे लोग श्रेय लेने के लिए लपकने को तैयार रहा करते हैं जिनकी किसी भी काम की पूर्णता या उपलब्धि में कोई भूमिका नहीं हुआ करती।
ऎसे लोग सभी तरफ गिद्धों की तरह नज़रें गड़ाये बैठे हुए हैं। इन लोगों का जिन्दगी भर का एक सूत्री एजेण्डा यही है कि किस प्रकार ये बिना कुछ किए औरोें के कामों का श्रेय अपने खाते में गिनवा लें अथवा चालाकियों के साथ लूट लें।
इस किस्म के लपकों की संख्या आजकल निरन्तर बढ़ती ही जा रही है।  सब तरफ कामचोर और निकम्मे लोग हैं जो काम कुछ करना नहीं चाहते, लेकिन श्रेय लेने की कला में महारत हासिल है। जो लोग बिना कोई मेहनत किए किसी भी काम का श्रेय पाते हैं उन लोगों के जिन्दगी भर के सारे काम अभिशप्त हो जाते हैं और ऎसे लोगों को अपने मामूली कामों के लिए भी दूसरे लोगों की खुशामद करनी पड़ती है, जाने किस-किस प्रकार के समझौते करने पड़ते हैं और नापाक-नाजायज समीकरण बिठाने को विवश होना पड़ता है।
जो काम एक मनुष्य की क्षमता में होते हैं उन्हें करना मनुष्य का प्राथमिक फर्ज है और ऎसे में अपने फर्ज को भुनाने के लिए श्रेय पाना कोई अच्छी बात नहीं कही जा सकती, यह सामान्य मानवीय कत्र्तव्यों में आता है। इसलिए उन कामों का भी श्रेय नहीं लेना चाहिए जो हमारे द्वारा सामान्य तौर पर किए जाते हैं।
गीता के बोध वाक्य का अनुस्मरण कर हम सभी को कत्र्तव्य मार्ग को अपनाना चाहिए, फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए। इससे कार्य संपादन में ऊर्जा और उत्साह बना रहता है तथा फल के बारे में निश्चिन्तता होने से न उत्साह के अतिरेक का उन्माद जगता है, न परिणाम को लेकर उद्विग्नता।
इससे हर कोई सभी प्रकार से तनाव मुक्त होकर रह सकता है। और इंसान जब तनावों से दूर रहता है तभी स्वस्थ और मस्त रहता है। इंसानों की एक दिव्य धारा भी है जो लोक मंगल और सामुदायिक उत्थान की गतिविधियों में चुपचाप रमे रहते हैं और न पुरस्कार की सोचते हैं, न परिणाम की।  निरन्तर कर्मशील रहना ही इनका स्वभाव हो जाता है और इसी स्वभाव के सहारे ये लोग आनंद के साथ जीवनयात्रा को पूर्ण करते हैं। 
काम कोई सा हो, जब हम उसे अपना मानकर करते हैं तब हमारे ग्रह-नक्षत्र और दूसरे अच्छे-बुरे प्रभाव असर दिखाते हैं लेकिन जब हम उसे ईश्वरीय मानकर करते हैं तब हमारे अपने सारे कर्म ग्रह-नक्षत्रों और नकारात्मक वृत्तियों से बहुत दूर रहा करते हैं और इनका सौ फीसदी श्रेष्ठतम परिणाम सामने आता है वहीं इनका  कीर्तिमय प्रवाह सदियों तक बना रहता है।
जो भी अच्छा कार्य करें उसका श्रेय भगवान को देते रहें, इससे हमारे कोई काम कहीं रुकेंगे नहीं, अपने आप होते चले जाएंगे।  लेकिन जहाँ किसी उपलब्धि या सफलता को हम अपना मानकर श्रेय लेने की कोशिश करते हैं उसी समय से हमारे कर्म सामान्य धरातल पर आ जाते हैं और हमारे काम भी दूसरों के कामों की तरह कभी रेंग कर चलने लगते हैं, कभी अचानक रूक जाया करते हैं और कभी लंबित होते-होते अवधिपार तक हो जाया करते हैं। 
इस स्थिति में जो लोग मानवीय संवेदनाओं, ईश्वरीय दिव्य तत्वों और संवेदनशीलता से भरे हुए हैं उन सभी को चाहिए कि वे अपने पूरे जीवन में किसी भी काम का किंचित भी श्रेय न लें, चाहे कोई सा काम कितना ही छोटा हो या कितना ही बड़ा।
एक बार जब हम यह संकल्प ग्रहण कर लिया करते हैं तब हमारा या हमारे द्वारा हाथ में लिया गया कोई सा काम कभी नहीं रुकता, यह नॉन स्टॉप पूर्णता की ओर बढ़ता ही चला जाता है।  इसमें कहीं किसी भी मोड़ पर कोई रुकावट आ ही नहीं सकती।
जीवन में जब हम पक्की धारणा के साथ इसे सहज स्वीकार कर लिया करते हैं तब हम स्वयं को ईश्वरीय प्रवाह में अनुभव करने लगते हैं और इससे हमें जो दिव्यता, ईश्वरीय विभूतियां प्राप्त होती हैं, जो असीम आत्म संतुष्टि प्राप्त होती है वह अवर्णनीय ही होती है।

Saturday, 24 January 2015

उनके न होने का सुकून

आलेख ( 24 जनवरी 2015 के लिए)
उनके न होने का सुकून
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
सुकून अपने आप में ऎसा शब्द है जिसका संबंध दिल से भी है, दिमाग से भी , शरीर से और परिवेश से भी। इन सभी का सामन्जस्य होने पर ही सुकून की परिपूर्णता की कल्पना की जा सकती है।
इनमें से एक का भी न होना सुकून में काफी हद तक कमी ला देता है और इसका दुष्परिणाम यह सामने आता है कि आधे-अधूरेपन का होना कई मामलों में वैषम्य और विषाद पैदा कर देता है और इसका सीधा असर पड़ता है व्यक्ति, घर-परिवार, समुदाय और क्षेत्र सभी पर।
आमतौर पर व्यक्तियों से ही सुकून का सीधा संबंध होता है क्योंकि जैसा इंसान होता है वैसा ही उसका परिवेश निर्मित होता है और इसी से सब कुछ सीधे-सीधे प्रभावित होता है। विचित्रताओं से भरे इंसान के स्वभाव के बारे में कोई स्पष्ट धारणा कभी नहीं बनाई जा सकती। 
हर इंसान का स्वभाव अपने आप में अलग होता है और उसी के अनुरूप सब कुछ सृजित होता जाता है, ढलता जाता है। इसलिए यह कहा जाए कि सुकून का निर्माता इंसान है और सुकून से संबंधित सभी प्रकार की गतिविधियां उसी पर निर्भर हैं, तो अतिशयोक्ति नहीं होगा।
इंसान अच्छा होने पर माहौल अच्छा ही अच्छा हो जाता है जबकि इंसान खराब होने पर माहौल उसी की तरह बिगड़ने लगता है। कई लोगों के बारे में स्पष्ट धारणा होती है कि ये लोग जहाँ होते हैं वहाँ इनकी मौजूदगी मात्र से माहौल खुशनुमा हो उठता है और जो लोग इनके संपर्क में आते हैं, आस-पास रहते या काम करते हैं वे सभी प्रसन्न रहते हैं और प्रसन्न रहने के आदी हो जाते हैं।
इन लोगों के बारे में सहज स्वीकार्यता होती है कि ये लोग खुश रहते हैं और खुश रखने की कला भी जानते हैं। दूसरी ओर खूब सारे लोग ऎसे होते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि ये जहां कहीं होते हैं वहां का सुख-चैन सब कुछ छीन जाता है, कलह व्याप्त हो जाता है और इनकी मौजूदगी जहां कहीं होती है वहाँ हर प्रकार की समस्याएं अपने आप घर करने लगती हैं।
आजकल विभिन्न बाड़ों में ऎसे लोगों की तादाद बढ़ती ही जा रही है जो लोग नकारात्मक माहौल का सृजन करने में सिद्ध हो गए हैं। इन लोगों में से काफी लोगों के बारे में साफ-साफ कहा भी जाता है कि इनका होना ही अपने आप में कलहकारी है और जहाँ ये होते हैं वहाँ का माहौल हमेशा प्रदूषित ही रहता है।
इन स्थितियों में यह देखा जाए कि विभिन्न स्थलों का माहौल खराब होने के पीछे ये लोग ही जिम्मेदार हैं जो गन्दी मानसिकता, विघ्नसंतोषी गतिविधियों और नकारात्मक कार्यों से  ऎसा कुछ करते रहते हैं जो कि न बाड़ों के लिए अच्छा है न समाज या क्षेत्र के लिए। 
दुर्भाग्य से ऎसे लोग हर स्थान पर हैं और अपनी चवन्नी चला रहे हैं। सज्जनों की उदासीनता का पूरा-पूरा लाभ लेने वाले ये लोग माहौल को खराब करने में कहीं पीछे नहीं हैं। इन लोगों के कुछ समय या कुछ दिन कहीं बाहर रहने की स्थिति में माहौल अपने आप ठीक हो जाता है तथा लोग साफ-साफ यह कहते हैं इनकी गैर मौजूदगी में जैसा सुकून होता है वैसा सुकून इनकी मौजूदगी में कभी  नज़र नहीं आता।
इनके न होने का भी अपने आप में बड़ा सुकून है। अपने आस-पास भी देखें, ऎसे खूब सारे लोग देखने को मिल जाएंगे जिनके न होने की स्थिति में सुकून रहता है और अनुभव भी होता है। ईश्वर इन सभी लोगों को हमसे दूर ही रखे ताकि हम सुकून के माहौल में जी सकें।

Sunday, 18 January 2015

दिल से स्वीकारें हर परिवर्तन को

आज का आलेख ( 18 जनवरी 2015 के लिए )
दिल से स्वीकारें
हर परिवर्तन को
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
परिवर्तन सृष्टि का अटल नियम है जो पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड सभी के लिए लागू होता है और इनमें से कोई भी परिवर्तन से वंचित नहीं है।
हर परिवर्तन नई भूमिका और नवीन सृष्टि की भावभूमि रचता है और  इसका पूर्वापेक्षा बेहतर और परिष्कृत परिणाम ही सामने आता है। मनुष्य का असुरक्षा भय और भविष्य को लेकर उमड़ने-घुमड़ने वाली आशंकाओं का ही परिणाम है कि वह हमेशा यथास्थितिवादी बना रहना चाहता है ताकि अपनी आत्मतुष्टि का वर्तमान ग्राफ यों ही बना रहे।
और यही कारण है कि परिवर्तन से डरने और आशंकित रहने वाले लोग हमेशा वही स्थिति बनाए रखना चाहते हैं जिसमें वर्तमान में जी रहे होते हैं। इस वजह से इंसान जड़ता को ओढ़ लेता है और यही जड़ता उसे वहीं का वहीं बनाए रखती है।
यह वह स्थिति होती है जिसमें भावी आशंकाओं के भय से यथास्थिति भरे वर्तमान को हर कोई बनाए रखना चाहता है ताकि जहां जिस अवस्था में है उससे नीचे गिरे नहीं, कम से कम वहीं बना रहे।
इंसान अपने इसी स्वभाव की वजह से हर परिवर्तन से डरता है। परिवर्तन उसे वर्तमान से और अधिक अच्छा लगेगा तो वह सहर्ष स्वीकार कर लेगा लेकिन इसके लिए भी पहले सौ बार सोचेगा और सभी तरफ से  संतुष्ट होने के बाद ही इसे अपनाएगा।
लेकिन कोई सा परिवर्तन उसे बुरा लगता है अथवा अपने मन में बांधी गई सीमाओं और रेखाओं से अलग महसूस करता है तब वह इसे स्वीकार करने में हिचकता है।
आम तौर पर हर इंसान को यही भ्रम होता है कि दुनिया में सबसे अधिक समझदार प्राणी वही है और उसने जो सोच लिया, कह दिया वही होना चाहिए। मनमाफिक सब कुछ होता रहे तो इंसान प्रसन्न रहता है, थोड़ा सा दांये-बांये हो जाने पर विचलित हो उठता है। जबकि अधिकांश मर्तबा परिवर्तन अपने भले और विकास के लिए होते हैं और उससे माहौल तथा पूरा परिवेश तरक्की पाने लगता है लेकिन यथास्थितिवादी और जड़ लोग हर परिवर्तन को नकारने के लिए सामने हो जाते हैं।
अधिसंख्य लोग ऎसे ही हैं जो परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पाते हैं और परिवर्तन की आहट सुनते ही उनमें खलबली मचने लगती है। मनुष्य दिन रात गपियाते हुए, बेवजह शोर मचाते हुए देश और दुनिया सभी का चिन्तन करता है, सभी के बारे में खुलकर अभिव्यक्ति देता है, अपनी राय बनाता है और उपदेश झाड़ता है लेकिन सीट बदल दी जाए, स्थान बदल दिया जाए तो वह घबरा उठता है, हायतौबा मचा देता है जैसे कि परिवर्तन आने पर उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा और उसके बाद ऎसा कुछ नहीं बचेगा जो उसके लिए होगा।
वैश्विक चर्चाओं में खूब रस ले लेकर बकवास करने का आदी इंसान कुछ मीटर और किलोमीटर परिवर्तन सामने आ जाने पर आपा खो बैठता है, चिल्लपों मचाने लगता है और उन्मादी अवस्था में आकर वह सब कुछ करने लग जाता है जो आम इंसान बहुधा विक्षिप्तावस्था प्राप्त होने पर करने लगता है।
यह मान कर चलना चाहिए कि हर परिवर्तन पहले से और अधिक बेहतर स्वरूप में आता है और कर्मयोग का आनंद भी देता है, मस्ती भी। जो लोग परिवर्तन को हृदय से स्वीकार कर लिया करते हैं वे लोग परिवर्तन से आने वाले सभी प्रकार के सुकून को पाने के हकदार हो जाते हैं और पूरी मौज-मस्ती के साथ जीते हैं जबकि परिवर्तन से जी चुराने वाले और सायास अस्वीकार करने के आदी लोग जिन्दगी भर कुढ़ते ही रहते हैं और ऎसे लोगों के जीवन में बार-बार ऎसा परिवर्तन सामने आता रहता है कि  जो उनके लिए न सुख देने वाला होता है न शांति।
हर परिवर्तन अच्छे के लिए आता है और अच्छा ही अच्छा करता है। इसलिए प्रत्येक परिवर्तन को तहे दिल से स्वीकारें और परिवर्तन से उपजी बयारों के साथ बहते हुए पूरी मद-मस्ती के साथ जीने का माद्दा विकसित करने की आज सर्वाधिक जरूरत है।

दिल से स्वीकारा जाने वाला हर परिवर्तन आनंद देता है जबकि परिवर्तन से भय खाने वाले लोगों का हर दिन आशंकाओं और भ्रमों के कोहरे से ढंका हुआ तनावों और उद्विग्नताओं को जन्म देता है। इसलिए यह जरूरी है कि हर परिवर्तन को स्वीकारें और उसके अनुरूप अपनी अनुकूलताओं को समानान्तर चलाते हुए आगे बढ़ें।

Saturday, 17 January 2015

एक को चुन लें फर्ज या मर्ज

आज का आलेख ( 17 जनवरी 2015 के लिए)
एक को चुन लें
फर्ज या मर्ज
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

जीवन और कर्म एक दूसरे से गहन रूप से जुड़े हुए दो अहम् कारक हैं जो एक दूसरे पर गहरे तक निर्भर हैं। इनका संतुलन होने पर ही सुकूनदायी जीवन की कल्पना की जानी संभव है। इसके बिना जीवन और जगत निरर्थक ही प्रतिभासित होता है।
हर इंसान की अपनी कार्यशैली होती है, हर समूह या समुदाय की अपनी कार्य संस्कृति होती है और इसी पर चलते हुए वह सब कुछ हासिल किया जा सकता है जो कि अपेक्षित होता है।
व्यक्ति और समुदाय के संबंधों को गौर से देखें तो साफ पता चलता है कि ये परस्पर आश्रित ऎसे संबंध हैं जो एक-दूसरे के लिए जीते हैं और एक दूसरे के बिना नहीं चल सकता। कर्म का सीधा संबंध फर्ज से है जो परिश्रम, एकाग्रता और कर्मयोग के विभिन्न प्रकारों से बंधा हुआ है तथा व्यक्ति, स्थान और काल सापेक्ष इसमें परिवर्तन होता रहता है। 
हर व्यक्ति के लिए जीवन में कोई न कोई कर्म निहित ही है और इसी प्रकार फर्ज भी हैं जिन्हें निभाना इंसान की पहली प्राथमिकता है। ये फर्ज ही है जो कि व्यक्ति को समुदाय से बाँधे रखता है और व्यक्ति की समुदाय में पहचान कायम करता है।
जो व्यक्ति एकान्तिकता और अपने स्वार्थों से ऊपर उठकर सामुदायिक और वैश्विक चिंतन को पा लेते हैं, वे जमाने भर के अपने हो जाते हैं, अमर हो जाते हैं। मगर ऎसे लोगों की संख्या धीरे-धीरे घटती ही चली जा रही है।
आजकल लोग व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से कहीं अधिक जोर व्यक्तिगत संपदा के संरक्षण और जमा करने पर दे रहे हैं और यही कारण है कि समझौतों और समीकरणों, चमचागिरी और चापलुसी तथा ऊपर उठने के लिए हद से नीचे तक गिर जाने की लालची मनोवृत्ति के कारण इंसानी मूल्यों का क्षरण हो रहा है और आदमी की विश्वसनीयता व प्रामाणिकता का ग्राफ नीचे गिरता जा रहा है। 
हर इंसान अपने किसी न किसी फर्ज से बंधा हुआ है। जब इंसान पूरी संवेदनशीलता के साथ अपने फर्ज को महत्त्व देता है तब वह आत्मसंतुष्ट और कीर्तिमान हो सकता है। फर्ज वह अप्रत्यक्ष रास्ता है जो स्थायी आत्मतोष और मस्ती देता है जबकि फर्ज के बगैर किए जाने वाले कर्म सफलता तो दे सकते हैं मगर स्थायी सुख और शांति, आत्मतोष और आनंद कभी नहीं।
फर्ज ऎसा प्राथमिक कारक है जो जीवन के हर क्षण को प्रभावित करता है और अपना अच्छा-बुरा प्रभाव छोड़ता है। जहाँ फर्ज के  प्रति पूरी ईमानदारी और कत्र्तव्यनिष्ठा के साथ नैष्ठिक समर्पण का भाव रहता है वहाँ जीवन का आनंद चरम वेग के साथ हिलोरें लेता हुआ प्रतीत होता है और वह सभी कुछ मौज-मस्ती के साथ प्राप्त होता है जो जीवन भर के लिए अभीप्सित होता है।
इसके बिना किसी भी इंसान का जीवन न सुखी-समृद्ध और खुशहाल हो सकता है न वह जमाने को खुशी दे सकता है। इसलिए अपने समग्र जीवन में फर्ज को अहम् स्थान दें और ऎसा यादगार जीवन जीने की कोशिश करें कि आने वाली पीढ़ियाँ हमें श्रद्धा, आदर और सम्मान के साथ याद करें और हमारा अनुकरण भी करें।
दुनिया भर के लोगों को दो तरह से विभक्त किया जा सकता है। एक वे हैं जो पूरी ईमानदारी से अपने हर प्रकार के फर्ज को पूरा करते हैं तथा मानवीय संवेदनशीलता के साथ काम करते हुए जीवन को लोक मंगल का पर्याय बनाते हैं।
दूसरी किस्म में वे लोग आते हैं जिनके लिए फर्ज कोई मायने नहीं रखते, इन लोगों को अपने स्वार्थ से मतलब होता है, दूसरों की पीड़ाओं, जरूरतों या भावनाओं से इनका दूर-दूर तक कोई लेन-देना नहीं होता। ये लोग अपने ही अपने लिए जीते हैं और अपने आपका वजूद कायम रखने के लिए दूसरों को किसी भी हद तक मार डालने या अधमरा कर डालने से भी कोई परहेज नहीं करते।
इन सभी परिस्थितियों के बावजूद यह शाश्वत सत्य है कि सेहत और आनंद का लाभ वे ही प्राप्त कर सकते हैं जो अपने फर्ज के प्रति नैष्ठिक ईमानदार और समर्पित होते हैं क्योंकि इन लोगों का मन फर्ज पूर्ण होने के आनंद की भावभूमि प्राप्त कर लेता है और मनः सौन्दर्य का आनंद पूरे शरीर पर प्रतिभासित होता है।
ऎसे लोग आम तौर पर स्वस्थ और मस्त भी होते हैं। जबकि फर्ज की अवहेलना और उपेक्षा करने वाले लोगों का चित्त हमेशा प्रदूषित ही रहता है और ऎसे लोग मन-मस्तिष्क और शरीर से कभी स्वस्थ नहीं हो सकते, इन लोगों को कोई न कोई मानसिक या शारीरिक अथवा दोनों ही प्रकार की बीमारियाँ हमेशा बनी रहती हैं।
इसके साथ ही फर्ज का अनादर करने वाले लोगों से ग्रह-नक्षत्र और पितर भी कुपित रहते हैं और पूरा जीवन तनावों तथा फालतू की समस्याओं से घिरा रहता है। अपने आस-पास के किसी भी ऎसे आदमी का अध्ययन करें, जो ढंग से अपने फर्ज नहीं निभाता।
फर्ज का आशय सिर्फ कर्मस्थलों पर अपनी निर्धारित ड्यूटी या कार्यों से नहीं है बल्कि घर-परिवार, समाज, क्षेत्र और देश, अपने माता-पिता, पति-पत्नी, बच्चों, नाते-रिश्तेदारों और पड़ोसियों तक के प्रति निभाये जाने वाले फर्ज से है।

जीवन का भरपूर आनंद पाने के इच्छुक लोगों को चाहिए कि अपने सभी प्रकार के फर्ज को पूरी ईमानदारी के साथ निभाएं और ऎसा व्यक्तित्व पैदा करें कि दूसरे लोग भी उनका अनुकरण करते हुए आनंद उपलब्धि की मुख्य धारा के साथ जीवन प्रवाह को और अधिक तीव्र तथा सुकूनदायी बना सकें। चुनना हमें ही है। एक को चुन लें - फर्ज या फर्ज में से

Friday, 16 January 2015

सोचते ही न रहें

आज का आलेख ( 16 जनवरी 2015 के लिए)
सोचते ही न रहें
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

आजकल दो ही किस्मों के लोग सभी जगह अधिकांश संख्या में पाए जाते हैं।  इनमें बातें करने वाले भी हैं और सोचने वाले भी।
इन दोनों को टाईमपास इंसान की संज्ञा दी जानी चाहिए। ये खुद कभी कुछ नहीं करते। इनकी भूमिका सभी स्थानों पर उपदेश देने, राय देने और तमाशा देखने तक ही सीमित हुआ करती है।
इस किस्म के लोगों के लिए सभी स्थान अपने हैं। फिर आजकल हर जगह बातूनी और उपदेशकों की जबर्दस्त भरमार है। इंटरनेट और सोशल साईट्स से लेकर सभी स्थानों पर ऎसे-ऎसे लोगों की भरमार है जो और कोई काम करें या न करें, कहीं न कहीं गपियाते, बड़बड़ाते या राय देते हुए जरूर मिल जाते हैं।
ये अपने आपको ईश्वरीय दूत से कम नहीं मानते। इन्हें हमेशा यह भ्रम रहता है कि वे ही दुनिया के सर्वाधिक समझदार और ज्ञानी हैं जिन्हें ईश्वर ने दुनिया की आलोचना करने और लोगों को सुधारने के लिए पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए प्रेरित किया है।
ये लोग गली-कूंचों से लेकर महानगरों तक तक समान अस्तित्व और प्रभावशाली वजूद रखते हैं। हममें से काफी लोग ऎसे हैं जो हमेशा कुछ न कुछ करने का सोचते ही रहते हैं।
हम लोगों का सोचना ही अपने आप में जीवन निर्वाह का सशक्त माध्यम है जिसके बूते हम पूरी जिन्दगी यों ही गुजार देते हैं। सोचने पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। कोई कुछ भी सोच सकता है लेकिन सोच के अनुरूप करना या कर दिखाना सभी के बूते में नहीं होता।
वे लोग ही अपनी सोच को अंजाम दे सकते हैं जो जीने का माद्दा लेकर पैदा होते हैं और संसार को कुछ देना चाहते हैं वरना अधिसंख्य लोग सोचते ही रह जाते हैं।
ऊपर से इन लोगों का पागलपन ये कि वे जो कुछ सोच रहे हैं वैसा ही दुनिया में होना चाहिए, वैसा ही दूसरे लोग अनुकरण और अनुगमन करते हुए नज़र आएं और वे द्रष्टा और निर्णायक की तरफ देखते हुए न्यायाधीश की भूमिका में रहकर अच्छे-बुरे या सफल-असफल का निर्णय कर अपने आपको सर्वोपरि सत्ता के रूप में प्रतिष्ठापित करते हुए अपने आप को औरों से अच्छे सिद्ध करते रहें।
कई बार हम सोचते ही रह जाते हैं और जो विषय या विचार हमारी सोच में होता है उसे कोई दूसरा ही पूरा कर दिखाता है। इस स्थिति में हम अपने आपको इतना विवश पाते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता।
इस स्थिति में हर प्रकार से अफसोस भी होता है और कुछ न कर पाने का मलाल भी जिन्दगी भर बना रहता है। जो लोग सोचकर भी कुछ नहीं कर पाते हैं उनकी जिन्दगी के तनावों का मूल कारण ही यह होता है कि ये लोग सोचते तो खूब हैं लेकिन कुछ कर पाने की दिशा में एक कदम तक आगे नहीं बढ़ाते हैं और इस वजह से इनके अवचेतन में रोजाना इतने सारे विषय और विचार जमा हो जाते हैं कि इन अनुपयेागी रह गए विचारों से सडांध आती है और यही सडांध हमारे मानसिक और शारीरिक विकारों और बीमारियों का कारण बनकर उभरने लगती है जिसका खामियाजा हमें कुछ समय बाद भुगतना पड़ता है।

इस सारी ऊहापोह भरी स्थिति में हमें चाहिए कि जो हम सोच रहे हैं उसे  पूरा करने का प्रयास आरंभ करें। अपनी सोच के क्रियान्वयन के लिए यह जरूरी है कि हम सोच और विषयों के अनुरूप प्राथमिकताएं तय करें, जो सोच हम पूरी कर सकते हैं उसके लिए खुद प्रयास करें जबकि द्वितीयक प्राथमिकता वाले विचारों को समयाभाव के कारण किन्हीं ओर के माध्यम से पूरा कराएं और उन्हें मार्गदर्शन प्रदान करें। तभी हमारी सोच आकार ले पाएगी और हमारा सोचना सार्थक होगा, अपने जीवन की उपयोगिता भी सामने आएगी।

Thursday, 15 January 2015

करें अभिवादन उत्तरायण के सूरज का

आज का आलेख ( 15 जनवरी 2015 के लिए)
करें अभिवादन
उत्तरायण के सूरज का
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
आज का सूर्योदय उत्तरायण से हुआ है और इसी के साथ ही शुरू हो गए हैं वे दिन जिनमें उत्सवी मंगल का शंखनाद होता है, उल्लास की सरिताएं बहती हैं और तन-मन नई ताजगी के साथ गति पाने लगता है।
उत्तरायण के साथ ही शुरू हो जाता है बहुआयामी जागरण। चेतन और अवचेतन, पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक का जागरण होने लगता है। शीत निष्कि्रयता ओढ़ कर जड़ता थामे बैठे लोगाें को हिलाने और कर्म की ओर उन्मुख करने का संदेश देने आया है यह उत्तरायण।
जो लोग कुछ करना चाहते हैं, जिन्दगी को सुनहरा बनाने के लिए हमेशा उत्साह के साथ परिश्रम करना चाहते हैं और आगे बढ़ना चाहते हैं उनके लिए हर उत्तर देने वाला है यह उत्तरायण।
जो कुछ नहीं करना चाहते, यों ही सुस्त और दरिद्री पड़े रहना चाहते हैं उनके लिए चाहे कितने उत्तरायण आए-जाएं, वे यों ही रहने वाले हैं, उनके बारे में किसी भी प्रकार की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। कुछ साल यहाँ बने रहेंगे, फिर तो आखिर ऊपर लौटना ही है।
इन लोगों के बारे में चर्चा या विचार करना भी निरर्थक ही है क्योंकि हर फसल के साथ नाकारा भूसा, घास-फूस, खरपतवार, बेशर्मी और गाजर घास होती ही है। फिर मनुष्यों की विस्फोटक संख्या में पसरती जा रही फसल भी अछूती क्यों रहे।
जो सोये हुए हैं उन्हें सोने दें, वे खाने-पीने और सोने के लिए ही पैदा हुए हैं। बात उन लोगों की करेें जो जगना चाहते हैं, जगे हुए हैं लेकिन तीव्रता चाहते हैं, आगे बढ़ना और कुछ पाना चाहते हैं। 
जो कुछ करना चाहते हैं उनके लिए ही यह उत्तरायण आया है। इतने बरसों तक हमने उत्तरायण का मर्म न जाना, कोई बात नहीं, जब जगे तब सवेरा, अबकि बार जग जाएं और ऎसे जगें कि दुबारा कोई हमें सुला न सके। 
यह जागरण सिर्फ शरीर का नहीं बल्कि मन, आत्मा और मस्तिष्क से लेकर सब प्रकार का जागरण होना चाहिए तभी रोशनी के कतरे मस्तिष्क की दीवारों से लेकर हृदय के कोने-कोने तक को आलोकित कर नई जिन्दगी और सुकून दे पाएंगे।
उत्तरायण हमेशा मांगलिक उत्सवों का आगाज करता है। यह उत्सव पिण्ड से लेकर परिवेश तक से जुड़े हुए हो सकते हैं। हर अवसर कोई नया उत्सवी पैगाम लेकर ही आता है।
उत्तरायण पूरे छह माह का प्रतिनिधित्व करने वाला महोत्सव है। छह माह किसी की भी जिन्दगी के लिए कम समय नहीं होता। जरूरत इस बात की है कि हम इस समय के मोल को पहचानें, ताजगी और ऊर्जा भरे माहौल का उपयोग करें और कुछ ऎसा करें कि यह उत्तरायण हमारी जिन्दगी का अनमोल समय साबित हो।
उपलब्धियों और आनंद के साथ जीवन भर के लिए सुकून देने वाला हो। ऎसा हो पाए तभी यह उत्तरायण हमारे लिए मंगलदायी है। अन्यथा अब तक जाने कितने उत्तरायण आए और चले गए, हम न कुछ कर पाए, न हमसे हो पाया।
इस बार के उत्तरायण को व्यर्थ न जाने दें, दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ संकल्प लें और बढ़ चलें उस डगर पर जहाँ सुनहरी रोशनी का कोई दरिया अपनी तरफ उमड़ रहा हो। उत्तरायण का सूरज हम सभी को यही संदेश दे रहा है।

आईये उत्तरायण के सूरज की अगवानी करें, पूरे मन से स्वागत करें और सूरज की साक्षी में समय के साथ चलें, आगे बढ़ें और ऎसा कुछ करें कि दुनिया हमें याद रखे और वह भी पूरे आदर-सम्मान और श्रद्धा के साथ।

Wednesday, 14 January 2015

आँखें खोलें, निहारें आसमाँ

आज का आलेख ( 14 जनवरी 2015 के लिए)

आँखें खोलें, निहारें आसमाँ

- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

आज मकर संक्रान्ति है।
लो फिर आ ही गया जागरण और संकल्पों का संदेश लेकर यह मकर संक्रमण।
बहुत हो चुका अब तक इसे मनाने के नाम पर, अब कुछ ऎसा होना चाहिए कि अबकि बार कुछ नया ही नया हो।
इतिहास रचने वाला हो माधुर्य और आसमान में ऊँची उड़ान भरने के नाम का।
कुछ ऎसा हो कि इस बार की मकर संक्रान्ति पिछली सारी संक्रांतियों से कुछ अलग करिश्मा दिखाने वाली हो।
हर तरफ माहौल काफी कुछ बदला-बदला सा ही है। परिवेश साफ-सुथरा होने लगा है और हवाएँ नए जमाने का सुकून पाने की उम्मीद में खुद-बखुद गाने लगी हैं।
उत्तरायण की आहट का शंखनाद क्या हुआ, हर तरफ हवाओं में भीनी-भीनी, मीठी-मीठी गंध तैर आयी है और लगने लगा है कि अब वाकई उत्तरायण का सूरज झाँकने लगा है।
मकर संक्रांति का यह पर्व मिठास, माधुर्य और उल्लास बांटने के साथ ही यह भी संदेश दे रहा है कि आसमान को निहारें, रंग-बिरंगी पतंगों का मजा लें, आसमान की ऊँचाइयों को छूने के लिए जी जान से प्रयास करें और ऎसी प्रतिस्पर्धा के साथ काम करें कि सभी को आनंद आए, कोई  दुःखी या नाराज न होने पाए।
सूरज से नज़रे चुराने वालों, अंधेरों में रहने के आदी और हमेशरा एयर कण्डीशण्ड बंद कमरों और गाड़ियों में रहने की तलब पालने वालों से लेकर सभी तरह के इंसानों के लिए मकर संक्रांति का पर्व सूरज की रोशनी  से सुकून पाने का संदेश दे रहा है। 
मकर संक्रांति और सूरज का संबंध सिर्फ उत्तरायण आगमन और सूर्य भगवान के मकरस्थ होने से ही नहीं जुड़ा है। यह पूरी सृष्टि के लिए है।
जो लोग अंधेरों में जी रहे हैं, लोगों में अंधेरों में रखने के आदी हो गए हैं  या फिर अंधेरों के झण्डाबरदार होकर अंधेरा कायम रहने का उद्घोष करते हुए आनंदित हो रहे हैं, उन सभी लोगों के लिए यह अवसर है रोशनी का मार्ग अपनाने का। कम से कम आज के दिन तो सूरज का सीधा सान्निध्य पाने में काहे की शरम।
कहा भी गया है कि दस वैद्यों के बराबर अग्नि होती है, और दस अग्नियों के बराबर सूरज।  हमारे प्रत्यक्ष और रोज दिखने वाले देवताओं में या तो पंचतत्व हैं या फिर सूरज और चाँद ही।  सूरज की उपासना से बुद्धि, तेज और आँखों की रोशनी बढ़ती है, चेहरे का लावण्य मुखर होने लगता है और दैहिक, दैविक एवं भौतिक व्याधियों का शमन होता है।
इतना सब कुछ होने के बावजूद हम लोग सूरज से अपने आपको बचा कर, छिपा कर चलते हैं, इसमें दोष सूरज का नहीं, हमारा ही है। सूरज तो चाहता है हमारी जिन्दगी में झाँकना और रौशन करना। हम ही हैं कि किसी न किसी बहाने रोशनी से बचने के आदी हो गए हैं और कृत्रिम रोशनी में जीना चाहते हैं। हमारे जीवन की तमाम समस्याओं का मूल कारण अंधेरे में जीने और भटकने की आदत ही है।
इस बार की मकर संक्रांति पर अंधेरों का दामन छोड़कर सूर्य की रश्मियों में स्नान कर अपने आपको पावन करें और दृढ़ संकल्प के साथ जीवन को रौशन बनाने के लिए प्रण लें।
यही सब कुछ ही तो कहने आयी है आज की मकर संक्रांति। जीवन भर संक्रमणों का दौर चलता रहता है लेकिन सूरज की साक्षी में आया संक्रमण का यह दौर अपने आपमें बहुत कुछ लेकर आया है हमारे लिए, बहुत कुछ कहने आया है हमसे।
अपने आँख-कान के साथ दिमाग और दिल भी खुले रखें और सच्चे मन से संकल्प ले ही डालें अपने जीवन में रोशनी के आवाहन को।

मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं।