Wednesday, 28 January 2015

पैसा ही दिखता है कर्म या फर्ज नहीं

आलेख ( 28 जनवरी 2015 के लिए)
पैसा ही दिखता है
कर्म या फर्ज नहीं
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
पैसा हमेशा मेहनत के बाद आता है। वही पैसा लाभकारी है जो पुरुषार्थ से अर्जित हो अन्यथा बिना पुरुषार्थ का प्राप्त हुआ धन हमें धनाढ्यों की श्रेणी में तो रख सकता है लेकिन धन होने का आनंद नहीं दे सकता।
धन होना और धनाढ्य कहलाना आसान है लेकिन धन की प्राप्ति का आनंद और ऎश्वर्य पाना सब के बस में नहीं है। धन-वैभव का असली आनंद वही प्राप्त कर सकते हैं जो कि मेहनत से कमाई करते हैं और जिसमें इनका तन-मन, परिश्रम और समय लगता है।
आजकल लोग धन सम्पन्न तो होते जा रहे हैं लेकिन धन होने की खुशी या आनंद उनके चेहरों से गायब है और हर क्षण यही भय सताता रहता है कि कहीं कुछ चोरी न हो जाए, कमी न पड़ जाए।
अधिकांश धनाढ्य चौकीदारों की तरह जीवन बिताते हैं जिसमें हर क्षण उनका दिमाग इसी चौकीदारी में लगा रहता है कि कहीं कुछ कमी न पड़ जाए।  इस चौकीदारी के नशे में उनके जीवन के सारे आनंद पलायन कर जाते हैं और ये लोग सिर्फ अपने आपको सम्पन्न होने का भ्रम पाले हुए आत्म अहंकार से ग्रस्त होकर जीवन का लक्ष्य भी भुला बैठते हैं और आनंद भी।
धन का होना और उपयोग करना दोनों अलग-अलग बाते हैं। मेहनती और कर्म के प्रति वफादार लोगों के पास धन रहता भी है और वह धन इन्हें आनंदित भी करता है क्योेंकि धन का उपयोग करने के सारे रास्ते इनके लिए अपने आप खुले हुए होते हैं जो कि उदारतापूर्वक धन खर्च कराते हैं ।
अधिकांश धनाढ्य अपने धन को खर्च नहीं कर पाते हैं बल्कि इनके धन पर दूसरे ऎसे लोग मौज उड़ाते हैं जिनमें कमाने-खाने की कुव्वत नहीं होती और ये लोग पूर्वजन्म के किसी लेन-देन के चक्कर में पैदा हो गए होते हैं।
इस अवस्था में यह कहना सही नहीं है कि धनाढ्य सुखी रहते हैं और दूसरे दुःखी। पुरुषार्थ से अर्जित धन ही सुख देता है  जबकि बिना मेहनत से कमाया, चुराया हुआ, डकैती या भ्रष्टाचार करके जमा किया हुआ धन हमेशा दुर्गति और दुःखों के साथ शोक और विनाश का कारण बनता है।
धन-सम्पत्ति के मामले से साफ जान लेना चाहिए कि जो व्यक्ति अपने फर्ज अच्छी तरह निभाता है, अपने कर्मयोग या ड्यूटी के प्रति निष्ठावान रहता है वही असली धनवान है क्योंकि उसके पास उदारता, दूसरों के प्रति मानवीय संवेदनशीलता और सज्जनता है और यही उसका असली धन कहे जा सकते हैं।
अनाप-शनाप दौलत होने के बावजूद उदारता और मानवीय मूल्यों का समावेश न हो तो ऎसे व्यक्ति का दौलतमंद होना किसी काम का नहीं। ये लोग बैंक लॉकर के चौकीदार ही होकर रह जाते हैं जहां द्रव्य तो खूब है पर अपने किसी काम का नहीं।
आजकल हर जगह आदमियों की ऎसी खेप आ गई है जिसे अपने फर्ज और कर्म की कुछ नहीं पड़ी है, कुछ करना नहीं चाहते। चाहते यही हैं कि बैठे-बैठे सब कुछ मिलता रहे, काम धेले भर का कुछ करना न पड़े। ऎसे लोगों की मौजूदगी सब तरफ है। कोई गली-चौराहा, राजमार्ग और सिक्स लेन, सर्कल या चौराहा, कोई सा बाड़ा या गलियारा ऎसा नहीं बचा है जिसमें इस प्रजाति के प्राणी न पाए जाते हों।
इन लोगों से न अपनी निर्धारित ड्यूटी होती है, न मेहनत कर सकते हैं, न किसी को प्रोत्साहन दे सकते हैं, न किसी की बिना पैसे लिए कोई मदद कर सकते हैं। इन लोगों को सब तरफ पैसा ही पैसा दिखता है।
गांधी छाप दिख जाए, सिक्कों की खनक सुन लें तो इनकी आँखें खुलती हैं और कुछ न दिखे तो बेसुध होकर अधमरे से पड़े रहेंगे। मुर्दों की तरह ऎसे पड़े रहेंगे जैसे कि जान ही नहीं बची हो। नीम बेहोशी भले न हो मगर ये ऎसे मरे हुए पड़े रहते हैं जैसे कि किसी गहरी समाधि में खो गए हों। जानबूझकर उदासीन पड़े रहने का स्वाँग कोई सीखे तो इनसे। जो सोये हैं उन्हें तो जगाया भी जा सकता है मगर उन लोगों को कौन जगाए जो सोने का अभिनय करते रहे हों।
तकरीबन सभी स्थानों पर ऎसे लोग विद्यमान हैं जिनके लिए मनुष्य होने का अर्थ ही अर्थसंग्रह होकर रह गया है। पैसा आने की उम्मीद दिख जाए तो घर-बाहर के सारे कामकाज भूलकर लपकों की तरह जुट जाएंगे और कुछ नहीं मिलने वाला हो तब सौ-सौ बहाने बनाकर भी दूर हो जाएंगे।
ऎसे फर्ज और कर्म से हीन लोगों के कारण से ही आज हमारा देश बदनाम है, समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। राष्ट्रीय चरित्र लुप्त होता जा रहा है और उसका स्थान ले लिया जेब चरित्र ने ।
हर कोई देश को खाली कर अपने घर भरने में लगा हुआ है।  जब तक पैसे को देखकर नाचने वाले, कीर्तन करने वाले, इंसानियत को गिरवी रख देने वाले, स्वाँग रचने वाले और सब कुछ करते रहने वाले लोग रहेंगे, इस देश का भगवान ही मालिक रहा है और रहेगा। पहले घर-परिवार, बंधुओं, भगिनियों, समुदाय और देश के प्रति अपने फर्ज को देखें, इनके लिए किये जाने वाले कर्म को देखें और अपने आपको फर्ज व कर्मप्रधान बनाएं, तभी हमारा और देश का भला हो सकता है।

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