Saturday, 31 January 2015

गर्त में ले जाते हैं ये पाताल कूए

आलेख ( 31 जनवरी 2015 के लिए)
गर्त में ले जाते हैं
ये पाताल कूए
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
नई पीढ़ी ने शायद पाताल कूओं का नाम न भी सुना हो लेकिन पुरानी पीढ़ी के लोग इनसे अच्छी तरह परिचित हैं।
पुराने जमाने में कल्पना से भी अधिक बहुत गहरे तक होने वाले कूओं को पाताल कूओं की संज्ञा दी जाती रही है और ऎसे खूब सारे कूए प्राचीन काल में बने और उपयोग में आते रहे।
इन कूओं का अस्तित्व और उपयोग धीरे-धीरे समाप्त होता चला गया। अब इंसानी जिस्म में पाताल कूओं का वजूद सभी स्थानों पर बढ़ता जा रहा है। ये पाताल कूए भी स्वभाव, कर्मयोग और व्यक्तित्व के मामले में भले ही कतई गंभीर न हों, छिछोले और उथले हों, मगर अपने को सौंपे गए तकरीबन हर काम के प्रति पाताल कूओं की ही तरह पेश आते हैं।
कोई सा काम कितना ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, इन पाताल कूओं के लिए कोई मायने नहीं रखता। पाताल कूओं को अपनी संकीर्ण परिधि में रहने और गोले घेरों से निरन्तर प्रतिध्वनित होती रही किसम-किसम की आवाजों में ही रमे रहने की ऎसी आदत हो जाती है कि ये इन परंपरागत दकियानूसी दायरों और रुदाली की आवाजों से ऊपर नहीं उठ पाते।
इन्हें रोजाना कुछ न कुछ नया सुनने, देखने और चर्चा करने को चाहिए ही होता है अन्यथा पाताल कूए मौत की आगोशी ओढ़ लिया करते हैं। पाताल कूए अपने भीतर और बाहर दोनों तरफ की हलचलों के प्रति तीखे कान वाले होते हैं।
ये कुछ करें या न करें, सुनने, देखने और चर्चाओं में रमे रहने की इनकी तलब नाल कटने से ही शुरू हो जाती है।  अपने फर्ज के प्रति चौकन्ने भले न रहें, मगर बाहरी हरकतों और हलचलों का पूरा और अपडेट रिकार्ड इनके पास बरसों तक सुरक्षित रहता है।
जब ये मरते हैं तब भी इनकी आत्मा को इनसे जुदा होने में कष्ट का अनुभव होता है क्योंकि इनके दिमाग में जाने कितनी सारी जंग लगी पुरानी आल्मारियों के कबाड़ की तरह पूरी दुनिया का कचरा भरा होता है।
ये पाताल कूए पूरी दुनिया में विद्यमान हैं। भारत में ऎसे पाताल कूओं की जबर्दस्त भरमार है। ये पाताल कूए गांवों-कस्बों से लेकर नगरों, महानगरों और राजधानियों तक बड़ी संख्या में विद्यमान हैं और बड़े मजे से अपनी चवन्नियां चला रहे हैं।
हर प्रकार के बाड़ों और गलियारों, परिसरों और परिवेश तक में सभी स्थानों पर ये पाताल कूए विद्यमान हैं।  कहने को ये पाताल कूए जमीन से गहरे तक जुड़े हुए हैं मगर जमीनी हकीकत से इनका कभी कोई लेना-देना नहीं रहता।
ये हमेशा अपने अहंकार के गुब्बारों पर सवार होकर आसमान की ऊँचाइयाँ पाने हवा में ही उड़ते रहने के आदी होते हैं। ऎसे पाताल कूओं से हम भी अच्छी तरह वाकिफ हैं लेकिन कुछ कह नहीं पाते हैं क्योंकि पाताल कूओं का आजकल सभी जगह भारी बहुमत है।
किसी को कोई सी बात कहो, कोई सा काम बताओ या किसी भी प्रकार का कितना ही जरूरी कागज पकड़ाओ और इससे जुड़ी कार्यवाही संपादित करने को कहो, ये बड़ी खुशी-खुशी हाँ-जी, हाँ जी करते हुए उस समय बात भी मान लेते हैं, काम भी स्वीकार लेते हैं लेकिन इसके बाद न उस बात का कोई पता चल पाता है, न काम का। और जो कागज दो, वे चले जाते हैं हमेशा-हमेशा के लिए पाताल कूए में। जहाँ एक बार कुछ गिर गया तो फिर दुबारा बाहर निकलने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
हम ऎसे खूब लोगों को जानते हैं जो पाताल कूओं की ही तरह व्यवहार करते हैं, जो काम या कागज उनके हवाले आ जाता है वह जाने किस फाईल, आल्मारी या दराज में हमेशा-हमेशा के लिए दफन हो जाता है।
हर काम और कागज को ये पाताल कूए अपने आगोश में ऎसे छुपा देते हैं जैसे कि इनका अब संसार में कोई काम ही नहीं रह गया हो। एक बार जो कोई इंसान अपने आपको पाताल कूए में तब्दील लेता है फिर जिन्दगी भर उसकी यह तलब बनी रहती है। न उससे कोई काम हो सकता है, न कोई करा सकता है। प्रलोभन और दबाव से करा लिया जाए, यह बात अलग है।
हममेें से खूब सारे लोग इन पाताल कूओं से परेशान हैं। इन पाताल कूओं में न शर्म बची है, न इनमें पानी रहा है। पाताल कूओं की वजह से अब हर तरफ पानी सर के ऊपर से गुजरने लगा है। पाताल कूओं को अपनी इस आदत या गंभीर महामारी से भले कोई फर्क नहीं पड़ता हो, उनकी सेहत पर इसका कोई असर हो न हो, संस्थान, समाज और देश के लिए ये पाताल कूए ऎसे नासूर हैं जो गर्त में ले जाने वाले हैं।
पहले कुछ ही पाताल कूओं का पता रहता था, आज खूब सारे पाताल कूए हर बाड़े में पूरी हैंकड़ी, अकड़ और शान से तने हुए बिराजमान हैं। पाताल कूओं के साथ बर्ताव का दूसरा संकट यह भी है कि ये कुछ लोगों और कुछ फीट के घेरों में ही रहने और बतियाने के आदी हैं और प्रतिध्वनियों के सहारे ही जीने का माद्दा बनाये हुए हैं। इसलिए बाहर से झाँक कर कोई कितना ही खरा-खोटा सुना दे, इन पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
और यही कारण है कि सारे के सारे पाताल कूए बेशर्म, बेपरवाह और हद दर्जे के निर्लज्ज बने हुए पूरी निरंकुशता के साथ बाड़ों में प्रतिष्ठित होकर सुख भोग रहे हैं।  इनकी वजह से जाने कितने लोग रोजाना इन्हें गालियाँ बकते हुए, श्राप देते हुए समाज और देश को सुधारने के जतन में लगे हुए हैं।
अर्से से यह सब देखा-सुना और भुगता जा रहा है। अब बहुत जरूरी हो चला है कि इन सारे के सारे पाताल कूओं पर मिट्टी डाली जाए, भर दिया जाए ताकि सामाजिक और परिवेशीय व्यवस्थों की और अधिक मिट्टी पलीत न होने पाए। यही आज की सच्ची समाज सेवा और देशभक्ति है।

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