Monday, 26 January 2015

गण को महसूस हो अपना तंत्र

आलेख ( 26 जनवरी 2015 के लिए)
गण को महसूस हो अपना तंत्र
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
आज गणतंत्र दिवस है। सभी भारतवासियों का अपना प्यारा और न्यारा पर्व है जो हमें अहसास कराता है कि जो कुछ तंत्र है वह हमारा अपना ही है।
यह अहसास ही वह ताकत है जिसके बूते भारतीय लोकतंत्र अपनी गरिमामय परंपराओं के लिए विश्व स्तर पर जाना और माना जाता रहा है। 
जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा जो कुछ होता है वही गणतंत्र का असली मकसद है।
यह आत्मचिन्तन हमें करने की आवश्यकता है कि गणतंत्र की नींव पड़ने के बाद से लेकर अब तक हम गणतंत्र को कितना परिपक्व महसूस कर पाए  हैं।
सारे भेदभावों और संकीर्णताओं से ऊपर हमारा यह गणतंत्र हमेशा बना रहे, उत्तरोत्तर गर्व तथा गौरव का अहसास कराता रहे, इन्हीं भावनाओं को और अधिक परिपुष्ट करने का दिन है आज का यह गणतंत्र।
प्रत्येक भारतवासी को दिल से यह महसूस होना चाहिए कि तंत्र उसी का है, उसी के अपने लिए है और इसी तंत्र के माध्यम से गणतंत्र और अधिक मजबूती के साथ उभरेगा।
गणतंत्रीय परिपाटियों और व्यवस्थाओं को मजबूती देने का काम हर गण का है और इसमें प्रत्येक देशवासी की सशक्त भागीदारी निभाने की आवश्यकता है।
वह समय चला गया जब हम द्रष्टा ही द्रष्टा होकर सब कुछ देखते रहने के आदी हो गए थे। अब समय बदला-बदला सा है और पूरा का पूरा तंत्र गण की ओर मुखातिब है। अब स्रष्टा होने और कुछ कर दिखाने का वक्त आ गया है।
बहुआयामी प्रयासों के साथ स्वाभिमानी तंत्र का नवीन दौर हमारे सामने है और इसमें न सिर्फ तंत्र बल्कि गण को भी अपने अधिकारों के साथ कत्र्तव्यों का स्पष्ट निर्धारण कर इनके निर्वाह का दायित्व समर्पित भाव से निभाना होगा।
बदले हुए परिवेश में गण और तंत्र दोनों को अपनी जिम्मेदारियों का तहे दिल से अहसास करना होगा तभी भारतीय गणतंत्र और अधिक सुदृढ़, लोक मंगलकारी और बहुआयामी भूमिकाओं से परिपूर्ण बनाया जा सकता है। 
अब पारस्परिक भागीदारी का युग परवान पर है जिसमें एकतरफा संवाद का जमाना लद चुका है। यह समय गण और तंत्र के बीच संतुलन के साथ ही दोनों के मध्य संवाद सातत्य, समन्वय और एक दूसरे के लिए पूरे मन से काम करने का है।
इसी से तय होगा लोकतांत्रिक परंपराओं के उत्कर्ष का नया दौर, जो न केवल भारतवर्ष बल्कि पूरे विश्व में गणतंत्र की नई और सुनहरी साख भी कायम करेगा और प्रेरणा का संचार भी।
गण को तंत्र के प्रति पूरा विश्वास हो तथा तंत्र को भी चाहिए कि वह गण के प्रति अपनी जवाबदेही पूरी पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ पूरी करे।
ऎसा होने पर ही गणतंत्र का आदर्श स्वरूप निखरकर सामने आ पाएगा। इस मामले में तंत्र की जिम्मेदारियां कुछ ज्यादा ही कही जा सकती हैं क्योंकि तंत्र की मौजूदा स्थिति गण के लिए भाग्यनिर्माता, संरक्षक और आश्रयदाता की कुछ ज्यादा कही जा सकती है।
इसलिए परस्पर आश्रित और निर्भरता के भावों की बजाय एकतरफा वजन कहीं नहीं होना चाहिए बल्कि पारस्परिक संतुलन के साथ काम होना चाहिए। यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
दोनों पक्षों को एक-दूसरे के प्रति आदर और श्रद्धा का भाव हो तथा दोनों का ही लक्ष्य जनमंगल और भारत उत्थान हो। सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ....।

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