आज
का आलेख (10 जनवरी 2015 के लिए)
दुःखी न करें
मातहतों को
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
जो सामाजिकता से रहना जानता है वही सामाजिक
प्राणी कहा जा सकता है। जिसमें सामाजिकता की बजाय असामाजिकता हावी हो, उसे मनुष्य की
श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। चाहे लोग उसे भय के मारे लोकप्रिय कहकर आदर दें अथवा
वे आत्म स्वयंभू हों।
किसी भी आदमी के व्यक्तित्व और कार्यों
के बारे में थाह पाना चाहें तो इसके लिए उसके आस-पास रहने वालों का नीर-क्षीर मूल्यांकन
सबसे बड़ा और प्रभावी पैमाना है।
अक्सर दो तरह के लोग होते हैं। एक वे
हैं जो पद, पैसे और प्रतिष्ठा के मोह तथा अहंकार
में डूबे रहकर जहाँ कहीं होते हैं वहाँ अपने आप को सभी का एकमेव अधीश्वर मानकर चलते
हैं और ऎसा व्यवहार करते हैं जैसे कि पूरी दुनिया उनकी गुलामी के लिए पैदा हुई है।
खासकर कुर्सीनशीन लोगों में यह नशा बुरी
तरह पाया जाता है। अक्सर देखा यह गया है कि चार पायों की कुर्सी या सोफों पर बैठने
वाले लोग इन पर बैठते ही चौपायों का व्यवहार करने लग जाया करते हैं अन्यथा जब तक जमीन
पर रहते हैं तब तक जमीन से जुड़े रहते हैं और उनका जमीर भी कायम रहता है लेकिन थोड़ा
सा जमीन छोड़ देने के बाद आसमान में उड़ते हैं जैसे कि हाइड्रोजन गैस से भरे गुब्बारे।
अब यह दोष आदमी का नहीें, उन चार खंभों
का ही कहा जाना चाहिए जिनकी छाती पर चढ़कर आदमी आदमी नहीं रहता बल्कि गुब्बारा ही होकर
रह जाता है। आजकल ऎसे गुब्बारे हर तरफ खूब संख्या में नज़र आ रहे हैं जो आसमान में उड़ना
और बने रहना भी चाहते हैं और जमीन पर प्रभुत्व कायम रखना भी। आदर्श इंसान उसे कहा जा
सकता है जिसके साथ और पास काम करने वाले और रहने वाले लोग सदैव प्रसन्न रहें, उन्हें
हमेशा यह बोध बना रहे कि उनका अपना कोई है
जो आत्मीय संरक्षक है और हर सुख-दुःख में पूरी मदद करेगा ही।
जिस बाड़े या गलियारे में रहने वाले लोगों
को अपने बोस या अधिकारी के अच्छे, संवेदनशील और सेवाभावी होने का गौरव बोध होता है
वही गलियारे और बाड़े सुकून देते हैं अन्यथा अब खूब सारे क्षेत्र ऎसे हो गए हैं जहाँ
कहीं तो रंग-बिरंगे गुब्बारे हवा में उछलकूद करते हुए इधर-उधर मण्डराते हुए अपने वजूद
को सिद्ध करने की कोशिश में जुटे हुए हैं और कहीं मुँह फुलाये कद्दूओं का जमघट है,
कहीं ऎसे लोगों का वर्चस्व है जो अपने आपको जाने क्या समझने लगे हैं।
मातहतों के लिए अपने से ऊपर के लोगों
का अच्छा और सज्जनता से परिपूर्ण मिलना अपने आपमें सौभाग्य ही कहा जाना चाहिए। जो लोग
किसी न किसी अहंकार में डूबे हुए अपने मातहतों का शोषण करते हैं, दास समझते हैं, बेगार
लेते हैं अथवा उन्हें दुःखी करते हैं वे सारे के सारे लोग सनकी, उन्मादी या अंधेरा
पसन्द ही होते हैं।
ये लोग मनुष्य योनि में नहीं होते तो
भूत-पिशाच, ब्रह्मराक्षस या किसी ऎसी ही योनियों में होते और अपनी हरकतों से जमाने
भर को और अधिक हैरान-परेशान ही करते।
मातहतों अर्थात अधीनस्थों को परेशान करने
वाले लोग अपने घर-परिवार और परिजनों से परेशान रहते हैं अथवा उनकी जन्मकुण्डली में
उन्मादी योग होता है और इसी कारण वे ऎसी हरकतें करते हैं।
मातहतों को जो लोग परेशान करते हैं उनके
बारे में पक्के तौर पर मानना चाहिए कि वे घर-परिवार या अपने खुराफाती मस्तिष्क से परेशान
हैं और ऎसे लोगों को तभी आनंद या सुकून की प्राप्ति हो सकती है जबकि वे दूसरे लोगों
को परेशान करें।
जीवन में सुख और समृद्धि चाहें तो यह
ध्यान रखें कि मातहतों को किसी भी प्रकार परेशान न करें बल्कि ऎसा माहौल पैदा करें
कि अपने अधीनस्थ सभी प्रकार के लोग हमारी वाणी और व्यवहार से प्रसन्न रहें और उन्हें
किसी भी प्रकार से भय या आशंका न हो, तभी हम भी प्रसन्न रह सकते हैं और औरों को प्रसन्न
रख सकते हैं।
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