Thursday, 29 January 2015

मुश्किल है मुर्दों में जान फूँकना

आज का आलेख ( 29  जनवरी 2015 के लिए)
मुश्किल है
मुर्दों में जान फूँकना
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
मुर्दों को साफ तौर पर दो किस्मों में विभक्त किया जा सकता है। एक वे हैं जिनका शरीर वाकई मृत है और अंतिम संस्कार के बाद इनके लौटने की कोई संभावना नहीं होती। इन मुर्दों से किसी को कोई खतरा नहीं होता, लोग इन्हें कुछ समय बाद भूल जाते हैं।
दूसरी किस्म है उन लोगों की जिनमें जान तो होती है लेकिन मुर्दों की तरह ही पड़े रहते हैं। जान होने के बावजूद इन्हें जानदार नहीं कहा जा सकता। ये लोग हमेशा जैसे हैं वैसे ही बने रहना चाहते हैं, कभी नीम बेहोशी में होते हैं, कभी बिजूकों की तरह व्यवहार करते हैं, कभी किसी न किसी मद के मारे मदमस्ती और कभी खुमारी में जीने के आदी हो जाते हैं।
इनकी सबसे बड़ी ख़ासियत यही होती है कि ये न अपनी ओर से कभी कुछ करते हैं, न करने ही देते हैं। यथास्थितिवाद और जड़ता के साथ अंधकार के पहरुओं की तरह हर तरफ ऎसे मुर्दे हममें से हर किसी को देखने को मिल ही जाते हैं।
फिर जहाँ मुर्दें होंगे वहाँ सडान्ध भी होगी और शोक का माहौल भी। हर मुर्दा अपने साथ कोई न कोई सडान्ध या शोकाकुल आभामण्डल स्वाभाविक रूप से रखता ही है। ये नहीं है कि ये मुर्दे हर क्षण यों ही पड़े रहते हों, इन मुर्दों में अक्सर जान भी आ जाती है और ये कभी बोल उठते हैं, कभी रो या चिल्ला उठते हैं और कभी भागने भी लगते हैं।
लेकिन ऎसा होना तभी संभव है जब मुर्दों के लिए कहीं से कोई गुलाब, झुनझुना, सुगंध या प्रलोभन का कोई सा मामला सामने दिखने लगा हो। मुर्दों की दौड़ भी लगनी शुरू हो जाती है यदि कोई बड़ा लाभ या आनंद पाने का मामला हो।
मुर्दों का अपना संसार है, अपने सहचर हैं और अपने-अपने डेरे। मुर्दो का मायावी संसार आजकल सब तरफ फैला हुआ है। जान होते हुए बेजानी में जीने वाले ऎसे आत्म स्वीकृत मुर्दों के कारण ही समाज और देश कई विषमताओं से ग्रस्त है, शोक का माहौल पसरा हुआ है । न आदमी के चेहरों पर कोई मुस्कान तैरती दिखती है, न परिवेश में कोई खिलखिलाहट।
आत्म मुर्दानगी ओढ़ चुके मुर्दों की वजह से कार्य संस्कृति को जबर्दस्त बट्टा लग रहा है वहीं भारतीय स्वाभिमान, ऊर्जा और सामथ्र्य का भी ह्रास होने लगा है। मुर्दों को मरघट पसंद हैं और वे चाहते हैं सब तरफ मरघट ही मरघट पसरे हुए हों ताकि मुर्दों की सत्ता का प्रसार हर किसी को नज़र आ सके। 
आजकल तो इन कृत्रिम मुर्दों के कई-कई चेहरे हमारे सामने आ रहे हैं। इन्हें देखकर लगता है कि जैसे मुर्दों की विचित्र वेशभूषा या नुक्कड़ नाटक की कोई बड़ी भारी प्रतिस्पर्धा हो रही हो।
मुर्दाल रहने वाले सारे के सारे लोग मुर्दों की तरह गमगीन, मायूस और निस्तेज हो जाते हैं और इनकी वजह से परिवेश भी दुर्गन्धियाने लगता है। अधिकांश लोग अपने बारे में कोई न कोई संकीर्ण दायरा तय कर लिया करते हैं।
यही दायरा उनकी सारी अपार संभावनाओं, व्यक्तित्व के विराट स्वरूप और सामर्थ का क्षरण कर इन्हें छोटी सी किसी ऎसी परिधि में बाँध देता है जहाँ ये दिन-रात दौड़-भाग करते हुए अपने आपको तरक्की पसंद इंसान के रूप में विख्यात करने की कोशिशें करते रहते हैं।
यह ठीक वैसा ही है जैसे कि कोई आदमी रोजाना अपने मकान की छत या गाँव-शहर के किसी मैदान में रोज कई-कई चक्कर लगा कर अपने आपको धावक के रूप में प्रतिष्ठत होने का कोई स्वप्न संजोये।
इंसान के लिए कोई दुश्मन नहीं होता। वही अपने आप का शत्रु होता है क्योंकि वह अपने को किसी दायरे में बाँध कर आसमान की ऊँचाइयां पाने के भ्रम में जी रहा होता है। यह वह  अवस्था होती है जिसमें कोई भी यह भेद नहीं कर सकता है कि इंसान जीवित है या मुर्दा।
आजकल मर्दानगी की बजाय मुर्दानगी हावी होने लगी है। कोई सा काम देख लीजियें, आधे आसमाँ पर ही जाकर अटक जाता है सब कुछ। घर-गृहस्थी या खेती-बाड़ी का काम हो या फिर मेहनत-मजूरी या नौकरी से जुड़ा कोई सा काम या धंधा।
 हर तरफ आदमियों की गुणवत्ता में गिरावट आने लगी है, कामचोरी और निकम्मेपन का ग्राफ बढ़ता जा रहा है।  यही कारण है कि आदमी मुर्दों की तरह व्यवहार करने लगा है या फिर ऎसा व्यवहार करने लगा है जैसे कि वेंटीलेटर पर पड़ा-पड़ा अंतिम साँस गिन रहा हो।
चारों तरफ उत्साह, ऊर्जा और उल्लास की बजाय तनाव, विषाद, बीमारी, क्रोध और शोक जैसा माहौल छाने लगा है और इस वजह से कर्मयोग की शक्ति क्षीण होती जा रही है।
समाज और देश को आज सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि उन लोगों में जान फूँकें जो मुर्दों की तरह व्यवहार करने लगे हैं, कुछ करना ही नहीं चाहते, और निस्तेज होते जा रहे हैं। यह काम आज नहीं हो पाया तो ये मुर्दें न मुर्दे रह पाएंगे, न इंसान ही बन पाएंगे। फिर इनकी अंतिम गति भूत-प्रेत की ही होने वाली है, इससे कोई और नहीं बचा सकता।

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