Friday, 16 January 2015

सोचते ही न रहें

आज का आलेख ( 16 जनवरी 2015 के लिए)
सोचते ही न रहें
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

आजकल दो ही किस्मों के लोग सभी जगह अधिकांश संख्या में पाए जाते हैं।  इनमें बातें करने वाले भी हैं और सोचने वाले भी।
इन दोनों को टाईमपास इंसान की संज्ञा दी जानी चाहिए। ये खुद कभी कुछ नहीं करते। इनकी भूमिका सभी स्थानों पर उपदेश देने, राय देने और तमाशा देखने तक ही सीमित हुआ करती है।
इस किस्म के लोगों के लिए सभी स्थान अपने हैं। फिर आजकल हर जगह बातूनी और उपदेशकों की जबर्दस्त भरमार है। इंटरनेट और सोशल साईट्स से लेकर सभी स्थानों पर ऎसे-ऎसे लोगों की भरमार है जो और कोई काम करें या न करें, कहीं न कहीं गपियाते, बड़बड़ाते या राय देते हुए जरूर मिल जाते हैं।
ये अपने आपको ईश्वरीय दूत से कम नहीं मानते। इन्हें हमेशा यह भ्रम रहता है कि वे ही दुनिया के सर्वाधिक समझदार और ज्ञानी हैं जिन्हें ईश्वर ने दुनिया की आलोचना करने और लोगों को सुधारने के लिए पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए प्रेरित किया है।
ये लोग गली-कूंचों से लेकर महानगरों तक तक समान अस्तित्व और प्रभावशाली वजूद रखते हैं। हममें से काफी लोग ऎसे हैं जो हमेशा कुछ न कुछ करने का सोचते ही रहते हैं।
हम लोगों का सोचना ही अपने आप में जीवन निर्वाह का सशक्त माध्यम है जिसके बूते हम पूरी जिन्दगी यों ही गुजार देते हैं। सोचने पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। कोई कुछ भी सोच सकता है लेकिन सोच के अनुरूप करना या कर दिखाना सभी के बूते में नहीं होता।
वे लोग ही अपनी सोच को अंजाम दे सकते हैं जो जीने का माद्दा लेकर पैदा होते हैं और संसार को कुछ देना चाहते हैं वरना अधिसंख्य लोग सोचते ही रह जाते हैं।
ऊपर से इन लोगों का पागलपन ये कि वे जो कुछ सोच रहे हैं वैसा ही दुनिया में होना चाहिए, वैसा ही दूसरे लोग अनुकरण और अनुगमन करते हुए नज़र आएं और वे द्रष्टा और निर्णायक की तरफ देखते हुए न्यायाधीश की भूमिका में रहकर अच्छे-बुरे या सफल-असफल का निर्णय कर अपने आपको सर्वोपरि सत्ता के रूप में प्रतिष्ठापित करते हुए अपने आप को औरों से अच्छे सिद्ध करते रहें।
कई बार हम सोचते ही रह जाते हैं और जो विषय या विचार हमारी सोच में होता है उसे कोई दूसरा ही पूरा कर दिखाता है। इस स्थिति में हम अपने आपको इतना विवश पाते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता।
इस स्थिति में हर प्रकार से अफसोस भी होता है और कुछ न कर पाने का मलाल भी जिन्दगी भर बना रहता है। जो लोग सोचकर भी कुछ नहीं कर पाते हैं उनकी जिन्दगी के तनावों का मूल कारण ही यह होता है कि ये लोग सोचते तो खूब हैं लेकिन कुछ कर पाने की दिशा में एक कदम तक आगे नहीं बढ़ाते हैं और इस वजह से इनके अवचेतन में रोजाना इतने सारे विषय और विचार जमा हो जाते हैं कि इन अनुपयेागी रह गए विचारों से सडांध आती है और यही सडांध हमारे मानसिक और शारीरिक विकारों और बीमारियों का कारण बनकर उभरने लगती है जिसका खामियाजा हमें कुछ समय बाद भुगतना पड़ता है।

इस सारी ऊहापोह भरी स्थिति में हमें चाहिए कि जो हम सोच रहे हैं उसे  पूरा करने का प्रयास आरंभ करें। अपनी सोच के क्रियान्वयन के लिए यह जरूरी है कि हम सोच और विषयों के अनुरूप प्राथमिकताएं तय करें, जो सोच हम पूरी कर सकते हैं उसके लिए खुद प्रयास करें जबकि द्वितीयक प्राथमिकता वाले विचारों को समयाभाव के कारण किन्हीं ओर के माध्यम से पूरा कराएं और उन्हें मार्गदर्शन प्रदान करें। तभी हमारी सोच आकार ले पाएगी और हमारा सोचना सार्थक होगा, अपने जीवन की उपयोगिता भी सामने आएगी।

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