Saturday, 17 January 2015

एक को चुन लें फर्ज या मर्ज

आज का आलेख ( 17 जनवरी 2015 के लिए)
एक को चुन लें
फर्ज या मर्ज
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

जीवन और कर्म एक दूसरे से गहन रूप से जुड़े हुए दो अहम् कारक हैं जो एक दूसरे पर गहरे तक निर्भर हैं। इनका संतुलन होने पर ही सुकूनदायी जीवन की कल्पना की जानी संभव है। इसके बिना जीवन और जगत निरर्थक ही प्रतिभासित होता है।
हर इंसान की अपनी कार्यशैली होती है, हर समूह या समुदाय की अपनी कार्य संस्कृति होती है और इसी पर चलते हुए वह सब कुछ हासिल किया जा सकता है जो कि अपेक्षित होता है।
व्यक्ति और समुदाय के संबंधों को गौर से देखें तो साफ पता चलता है कि ये परस्पर आश्रित ऎसे संबंध हैं जो एक-दूसरे के लिए जीते हैं और एक दूसरे के बिना नहीं चल सकता। कर्म का सीधा संबंध फर्ज से है जो परिश्रम, एकाग्रता और कर्मयोग के विभिन्न प्रकारों से बंधा हुआ है तथा व्यक्ति, स्थान और काल सापेक्ष इसमें परिवर्तन होता रहता है। 
हर व्यक्ति के लिए जीवन में कोई न कोई कर्म निहित ही है और इसी प्रकार फर्ज भी हैं जिन्हें निभाना इंसान की पहली प्राथमिकता है। ये फर्ज ही है जो कि व्यक्ति को समुदाय से बाँधे रखता है और व्यक्ति की समुदाय में पहचान कायम करता है।
जो व्यक्ति एकान्तिकता और अपने स्वार्थों से ऊपर उठकर सामुदायिक और वैश्विक चिंतन को पा लेते हैं, वे जमाने भर के अपने हो जाते हैं, अमर हो जाते हैं। मगर ऎसे लोगों की संख्या धीरे-धीरे घटती ही चली जा रही है।
आजकल लोग व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से कहीं अधिक जोर व्यक्तिगत संपदा के संरक्षण और जमा करने पर दे रहे हैं और यही कारण है कि समझौतों और समीकरणों, चमचागिरी और चापलुसी तथा ऊपर उठने के लिए हद से नीचे तक गिर जाने की लालची मनोवृत्ति के कारण इंसानी मूल्यों का क्षरण हो रहा है और आदमी की विश्वसनीयता व प्रामाणिकता का ग्राफ नीचे गिरता जा रहा है। 
हर इंसान अपने किसी न किसी फर्ज से बंधा हुआ है। जब इंसान पूरी संवेदनशीलता के साथ अपने फर्ज को महत्त्व देता है तब वह आत्मसंतुष्ट और कीर्तिमान हो सकता है। फर्ज वह अप्रत्यक्ष रास्ता है जो स्थायी आत्मतोष और मस्ती देता है जबकि फर्ज के बगैर किए जाने वाले कर्म सफलता तो दे सकते हैं मगर स्थायी सुख और शांति, आत्मतोष और आनंद कभी नहीं।
फर्ज ऎसा प्राथमिक कारक है जो जीवन के हर क्षण को प्रभावित करता है और अपना अच्छा-बुरा प्रभाव छोड़ता है। जहाँ फर्ज के  प्रति पूरी ईमानदारी और कत्र्तव्यनिष्ठा के साथ नैष्ठिक समर्पण का भाव रहता है वहाँ जीवन का आनंद चरम वेग के साथ हिलोरें लेता हुआ प्रतीत होता है और वह सभी कुछ मौज-मस्ती के साथ प्राप्त होता है जो जीवन भर के लिए अभीप्सित होता है।
इसके बिना किसी भी इंसान का जीवन न सुखी-समृद्ध और खुशहाल हो सकता है न वह जमाने को खुशी दे सकता है। इसलिए अपने समग्र जीवन में फर्ज को अहम् स्थान दें और ऎसा यादगार जीवन जीने की कोशिश करें कि आने वाली पीढ़ियाँ हमें श्रद्धा, आदर और सम्मान के साथ याद करें और हमारा अनुकरण भी करें।
दुनिया भर के लोगों को दो तरह से विभक्त किया जा सकता है। एक वे हैं जो पूरी ईमानदारी से अपने हर प्रकार के फर्ज को पूरा करते हैं तथा मानवीय संवेदनशीलता के साथ काम करते हुए जीवन को लोक मंगल का पर्याय बनाते हैं।
दूसरी किस्म में वे लोग आते हैं जिनके लिए फर्ज कोई मायने नहीं रखते, इन लोगों को अपने स्वार्थ से मतलब होता है, दूसरों की पीड़ाओं, जरूरतों या भावनाओं से इनका दूर-दूर तक कोई लेन-देना नहीं होता। ये लोग अपने ही अपने लिए जीते हैं और अपने आपका वजूद कायम रखने के लिए दूसरों को किसी भी हद तक मार डालने या अधमरा कर डालने से भी कोई परहेज नहीं करते।
इन सभी परिस्थितियों के बावजूद यह शाश्वत सत्य है कि सेहत और आनंद का लाभ वे ही प्राप्त कर सकते हैं जो अपने फर्ज के प्रति नैष्ठिक ईमानदार और समर्पित होते हैं क्योंकि इन लोगों का मन फर्ज पूर्ण होने के आनंद की भावभूमि प्राप्त कर लेता है और मनः सौन्दर्य का आनंद पूरे शरीर पर प्रतिभासित होता है।
ऎसे लोग आम तौर पर स्वस्थ और मस्त भी होते हैं। जबकि फर्ज की अवहेलना और उपेक्षा करने वाले लोगों का चित्त हमेशा प्रदूषित ही रहता है और ऎसे लोग मन-मस्तिष्क और शरीर से कभी स्वस्थ नहीं हो सकते, इन लोगों को कोई न कोई मानसिक या शारीरिक अथवा दोनों ही प्रकार की बीमारियाँ हमेशा बनी रहती हैं।
इसके साथ ही फर्ज का अनादर करने वाले लोगों से ग्रह-नक्षत्र और पितर भी कुपित रहते हैं और पूरा जीवन तनावों तथा फालतू की समस्याओं से घिरा रहता है। अपने आस-पास के किसी भी ऎसे आदमी का अध्ययन करें, जो ढंग से अपने फर्ज नहीं निभाता।
फर्ज का आशय सिर्फ कर्मस्थलों पर अपनी निर्धारित ड्यूटी या कार्यों से नहीं है बल्कि घर-परिवार, समाज, क्षेत्र और देश, अपने माता-पिता, पति-पत्नी, बच्चों, नाते-रिश्तेदारों और पड़ोसियों तक के प्रति निभाये जाने वाले फर्ज से है।

जीवन का भरपूर आनंद पाने के इच्छुक लोगों को चाहिए कि अपने सभी प्रकार के फर्ज को पूरी ईमानदारी के साथ निभाएं और ऎसा व्यक्तित्व पैदा करें कि दूसरे लोग भी उनका अनुकरण करते हुए आनंद उपलब्धि की मुख्य धारा के साथ जीवन प्रवाह को और अधिक तीव्र तथा सुकूनदायी बना सकें। चुनना हमें ही है। एक को चुन लें - फर्ज या फर्ज में से

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