Saturday, 3 January 2015

धरती पर भार ही हैं संवेदनहीन लोग

आज का आलेख ( 3 जनवरी 2015 के लिए)

धरती पर भार ही हैं
संवेदनहीन लोग
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

किसी भी मनुष्य में यदि संवेदनाओं का अभाव हो तो उसे जिन्दा नहीं माना जा सकता।  ऎसे लोगों का सिर्फ शरीर ही बोझ के रूप में जिन्दा होता है, दिल और दिमाग की खिड़कियां घुटन के मारे मरी हुई होती हैं।
इन लोगों और मुर्दों में सिर्फ एक यही फर्क होता है कि मुर्दे तनिक भी हिल-डुल नहीं सकते लेकिन ये लोग अपने पेट भरने और इन्दि्रयों की वासना शान्त करने के लिए कुत्ते की तरह इधर-उधर भटकते  ही रहते हैं और उनकी यह आदत जिन्दगी भर यों ही बनी रहती है।
मरने के बाद भी उनकी यह आदत अगली योनियों में छूट जाए, इसकी भी कोई गारंटी नहीं होती क्योंकि जीवन में अनैतिक और घातक संस्कार जब एक बार किसी के चित्त पर जम जाते हैं तब उनका निवारण होना बड़ा ही मुश्किल होता है।
संवेदनहीनता के मामले में देखा यह जाता है कि प्रायःतर संवेदनशून्यता उन लोगों में अधिक होती है जो लोग मनुष्य होने के अपने स्वाभिमान और मूल मानवी स्वभाव को भुला देते हैं। ऎसे लोगों में बुद्धिजीवी या अधिक पढ़े-लिखे, प्रभावशाली और बड़े लोगों की तादाद काफी अधिक है जिनके बारे में कहा जाता है कि ये लोग न मेहनतकश होते हैं न समाज और देश के लिए अधिक उपयोगी, बल्कि निर्देशों और उपदेशों के महारथी ही होते हैं। ऎसे स्वनामधन्य लोग हर तरफ पाए जाते हैं। अपने यहाँ भी हैं और दूसरी सभी जगहों पर भी।
होना यह चाहिए कि आदमी ज्यों-ज्यों बड़ा होता जाता है उतना भारी और विनम्र होना चाहिए। लेकिन अब यह सिद्धान्त पुराना हो गया है। आजकल जो जितना बड़ा हो जाता है उसकी चर्बी असीमित होकर बढ़ती जाती है, अकड़ और अधिक जकड़ने लगती है, अहंकार का पारा चढ़कर सातवें आसमान पर जा पहुंचता है और वह अपने आपको दुनिया में सबसे ऊँचा और महान समझने लगता है।
आजकल लोगों की जो खेप आ रही है वह न जमीन से जुड़ी हुई है, न जमीन से जुड़े रहना इन्हें पसंद ही है। हवाआेंं में उड़ने वाले लोग हवाएं बनाते हुए बादलों की तरह आसमान को एक से दूसरे सिरे तक नाप रहे हैं और उन्हें जमीनी हकीकत का पता तक नहीं है।
यह स्थिति कमोबेश सभी स्थानों पर सभी प्रकार के लोगों की है जिन्हें आम से कुछ अधिक और खास होने का सौभाग्य दुर्भाग्य या किसी आकस्मिक दुर्घटना से मिला हुआ है। यही कारण है कि हवाओं से बातें करने वाले लोगों के लिए हवाई किले बनाना और हर बात को हवा में उड़ा देने का शगल गहरे तक पसरा हुआ रहता है। 
आजकल हर तरफ ऎसे हवाई कीट-पतंगों का मायाजाल जगत में फैला हुआ है। कहने को कोई आदमी खजूर की मानिन्द कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए, जब तक उसमेंं मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं की ऊर्जा न हो, तब तक वह जीते जी मुर्दों के समान ही है क्योंकि किसी भी बाहरी या परिवेशीय संवेदना का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 
आजकल आदमी हमेशा उनिंदा रहने लगा है। अच्छे और सज्जनों को छोड़ दिया जाए तो अब स्वार्थी आदमी का जागरण तभी होता है जब कभी कोई सिक्का खनकता है, बिना मेहनत किए अंधेरे में ही गांधीछाप के दर्शन होते हैं या कोई ऎसा कुछ दिख जाता है जिसे देख जीभ लपलता उठे, जिस्म भट्टी सा होने लगे या किसी भी प्रकार का कोई विशेष आकर्षण ही सामने आ जाए।
तब आदमी कुंभकर्ण की तरह जग उठता है और सब कुछ अपने लिए हजम कर जाने की दौड़ शुरू कर दिया करता है। ऎसी स्थितियां न दिखें तो आदमी न खुद जगे, न किसी को जागने ही दे। आज अपने आस-पास, विश्व पटल पर और देश की सीमाओं पर जो कुछ हो रहा है उससे हम बेखबर रहकर अपना पेट, घर और बैंक बेलेंस भरने, जमीनों पर जमीने खरीदने, कब्जा जमाने और अपने पॉवर का दुरुपयोग करने को ही जीवन का लक्ष्य समझ चुके हैं और यही हमारी संवेदनहीनता का सबसे बड़ा कारण है।
जो लोग संवेदनहीन होते हैं वे पाँच साला सा साठ साला पॉवर में रहने तक उसी प्रकार ताकतवर होते हैं जिस प्रकार कोई वर्षो पुरानी आयु वाला मणिधर भुजंग मौज मारता है। लेकिन हर मणिधर सर्प के लिए वह दिन आता ही है जब कभी मणि निकाल ली जाती है।
आज जो लोग संवेदनहीन होकर जी रहे हैं उनके लिए वह दिन आने ही वाला है जब सब कुछ छीन जाएगा तब भिखारियों की तरह औरों की तरफ देखने को विवश होना पड़ेगा। लेकिन इन लोगों को कोई फर्क इसलिए नहीं पड़ता क्योंकि ये पॉवर में होते हैं तब भी भिखारी की तरह हाथ पसार कर सब कुछ जमा करते रहते हैं और रुपया-पैसा, संसाधन और जमीन तलाशते हैं और बाद में भी भीख ही मांगनी है। ऎसे में इन उच्च कुल के भिखारियों की शर्म पहले ही टूटी होती है। 

अपने क्षेत्र में ऎसे खूब भिखारी भी हैं, हद दर्जे के संवेदनहीन भी। इन पर दया करें और इनके भावी जीवन की कल्पना करते हुए ईश्वर को धन्यवाद दें कि उसने हमारी संवेदनाओं और मूल्यों का बरकरार रहने दिया है वरना हम भी इनकी तरह  नालायकों और मुर्दों में ही गिने जाते।

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