Monday, 5 January 2015

खो गया आदमी

आज का आलेख ( 5 जनवरी 2015 के लिए)

खो गया आदमी

- डॉ. दीपक आचार्य
941330077
dr.deepakaacharya@gmail.com

ये आदमियों की जात भी बड़ी विचित्र ही है। औरत का अपना आदमी हो सकता है लेकिन आदमियों के भी आदमी होते हैं, यह कितनी अजीब बात है।
आजकल आदमी में इतना पौरुष नहीं रहा कि खुद के बूते जमाने भर में जी कर दिखला सके या कोई पराक्रम कर सके।  इसलिए आदमी अब आधा-अधूरा हो चला है। उसे दूसरे आदमी की जरूरत पड़ती ही है।
अब लोग अपने मकसद में कामयाबी पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं भले ही अपनी अस्मिता को ही क्यों न भुला देनी पड़े।
स्वाभिमानी किस्म के फक्कड़ों को छोड़ दिया जाए तो आजकल हरेक आदमी की पहचान किसी दूसरे आदमी से होने लगी है। आदमी अब खुद का नहीं रहा, वह किसी न किसी का कहा जाने लगा है।
फिर यह जरूरी नहीं कि आज वह जिसका आदमी कहा जाता है, कल भी उसी का बनकर रहेगा ही। इस मामले में कोई स्थायित्व या अनिवार्य बाध्यता नहीं रही। जैसा काम वैसा आदमी।
यहाँ सब कुछ बदल जाता है, अपना जमीर तक भी। इसलिए तो कहा जाने लगा है कि आजकल आदमी का कोई ठिकाना नहीं रहा। बात प्रभावशालियों की हो या सामान्य लोगों की। हर कोई किसी न किसी से बंधा हुआ अनुचर और स्वामीभक्त बना हुआ है।
कोई किसी का आदमी बताया जा रहा है, कोई किसी का आदमी बना हुआ है। हमें अब किसी का आदमी बनने में भी कोई आपत्ति नहीं है और किसी का आदमी बनकर उसके इशारों पर चलने में भी कोई आपत्ति नहीं है।
हम अपनी गरज निकालने के लिए कुछ भी कर सकने को स्वच्छन्द हैं, जब गधों को भी बाप बना सकते हैं तो फिर औरों को भगवान मानने से क्या परहेज।
हमें उन लोगों से क्या गिला-शिकवा जो हमारे लिए कुछ भी क्यों न कहते रहें, आखिर दुनिया में आएं हैं तो अपने उल्लू सीधे करने ही, कोई संन्यासी बनकर सेवा और परोपकार के  लिए थोड़े ही अवतार लिया है। 
फिर आजकल तो हर तरफ कन्वर्जेन्स, सहभागिता और सहकार से लेकर नेगोसिएशन जैसे शब्दों पर जोर दिया जाने लगा है।  आदमियों के जबर्दस्त विस्फोट के बीच कोई कोना ऎसा नहीं बचा है जहां किसी न किसी का कोई न कोई आदमी न हो।  हर कोई किसी न किसी का आदमी बना हुआ समय काट रहा है।
अब लोगों को अपने होने के स्वाभिमान से कहीं ज्यादा दूसरों का आदमी होने का अभिमान परवान पर है। विराटकाय वृक्षों, गहरी अंधेरी गुफाओं और पहाड़ों की माँद में दुबक कर मुफतिया संरक्षण, हराम का खान-पान और आश्रय पाने वाले लोगों की अब कहीं कोई कमी नहीं है भले ही अपनी पहचान को तिलांजलि देकर उन्हें औरों का आदमी क्यों न कहा जाए।
आजकल परायों का आदमी कहलाए जाने का गौरव और गर्व अपने आप में जीवन भर का ऎसा सुकून है जिसमें दूसरों के प्रभाव और नाम का इस्तेमाल कर हम कितनी ही सारी वैतरणियां बड़ी ही मस्ती के साथ पार करते चले जाते हैं।
फिर कौन कहता है कि जिन्दगी भर किसी एक के ही बनकर रह जाओ। ‘बहता पानी-रमता जोगी’ की तरह जब जैसा मौका हाथ लगे, अपने कामधाम और लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए बदलाव लाते रहो। दुनिया में बहुत सारे अवसरवादी लोग यही सब कुछ तो करते हुए उछाले मारकर छलांग भरते हुए दूसरों से कितने आगे निकल गए हैं।
अपने आस-पास ही देख लें, ऎसे लोग हमारे पावन इलाकों को भी धन्य कर ही रहे हैं।  बहुत से ऎसे हैं जिनके लिए इशारों पर नाचने वाले, रुदाली में माहिर खूब सारे लोग ऎसे हैं जिन्हें उनका आदमी कहा जाता है।
धन्य है ये बड़े लोग, जिनके सौभाग्य के बारे में कहना ही क्या। ये अखण्ड सौभाग्यवान तो हैं ही, असंख्य सौभाग्यधारी भी हैं।  फिर बड़ी तादाद में वे लोग भी हैं जो किसी न किसी के लिए काम करने वाले आदमी कहे जा रहे हैं।
अब तो वे लोग दुर्लभ हो गए है। जिनके बारे में कहा जा सकता है कि ये लोग अपनी बुद्धि और कौशल से काम करते हैं, न किसी के आदमी बनने का तुच्छ स्वभाव पाल सकते हैं और न ही किसी के आदमी होने की घटिया मानसिकता को अंगीकार कर सकते हैं। 
आदमियों को संसार में भेजने वाला भगवान भी आदमियों की इस फितरत से खफा है वरना आदमी को सब कुछ शक्तियां और बौद्धिक सामथ्र्य देकर इसलिए नहीं भेजा था कि वह पालतु कुत्तों की तरह किसी न किसी आका के नाम का पट्टा गले में डालकर गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ अपने आपको महान और बड़े लोगों का सान्निध्य पाने वाला मानकर इतराता रहेगा।

आदमी होने की पहचान को भुला कर अपनी आदमियत औरों के कदमों में गिरवी रख देने वाला खुदगर्ज इंसान ही दुनिया और ईश्वर का सबसे बड़ा अपराधी है।

No comments:

Post a Comment