Friday, 2 January 2015

शीत से बचें बचाएं सभी को

आज का आलेख  (02 जनवरी 2015 के लिए)
शीत से बचें
बचाएं सभी को
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
इन दिनों मौसम अपनी मनमर्जी के पूरे परवान पर है। भयंकर सर्द हवाओं, कंपकंपाती शीत और धुंध के साये से घिरा जनजीवन अपने आप में परिवेश की रूह कंपा रहा है।
मौसम ने बदहवास होकर जो करवट बदली है, उससे अंगड़ाई लेने लगा है पूरा का पूरा माहौल। जीव भी शीत के मारे बेहाल है और जगत भी।
इस विषमता भरे वातावरण में हमारी सबसे पहली प्राथमिकता सिर्फ यह है कि हम अपने आप को इस भीषण सर्दी से बचाएं बल्कि यह है कि इस सर्दी के मारे हमारे आस-पड़ोस का कोई भी इंसान या जानवर दुःखी हो तथा वह इस भयंकर शीत में अपने आप को बचाकर रख सके। उसकी दैनन्दिनी आवश्यकताएं पूरी होने में दिक्कत आए और उसकी सेहत पर सर्दी की वजह से कोई दुष्प्रभाव पड़े।
जिस तरह से ग्लोबलवर्मिंग और ग्लोबल कूलिंग के साये में हम जी रहे हैं, उसे देख यही लगता है कि बचाव हमें ही करना है, इसके उपाय हमें ही ढूंढ़ने हैं।
यह जरूरी नहीं कि हमारे क्षेतर्् के सभी लोग सर्दी से बचाव के लिए ऊनी वस्तर््, चहारदीवारी से घिरे बंद कमरों और गर्माहट के लिए सारे संसाधन अपने पास रखते ही हों।
बहुसंख्य लोग गरीबी, अभावों और विपन्नताओं के अभिशाप से ग्रस्त है और इन लोगों के पास सर्दी से बचाव के कोई साधन उपलब्ध नहीं हैं।
खुले आसमान के नीचे जिन्दगी बसर करना और रामभरोसे दिन-रात गुजारना इनकी नियति ही बन चुकी है। इन हालातों में भीषण सर्दी और ठिठुरन पैदा करने वाली घातक शीत लहर से बचाव के लिए कुछ करना इनके बस में नहीं है।
जिन लोगों के पास सब कुछ है, वे भी शीत के कहर के आगे बेबस हैं, फिर उन लोगों के जीवन पर क्या बीतती होगी, जिनके पास ओढ़ने-पहनने को कपड़े हैं बिछाने को कोई चादर, कम्बल या रजाई, इसकी कल्पना करना भी हर किसी को सिहरा देने वाला है।
बावजूद इन स्थितियों के हम हैं कि अपने ही अपने में उलझे हुए हैं। हमें पास-पड़ोस की फिकर है अपने क्षेतर्् के उन अभावग्रस्त लोगों की जो शीत के मारे कांपते हुए अपने आप को जैसे तैसे जिन्दा रखने को मजबूर हैं।
किसी धार्मिक स्थल में जाएं जाएं, धर्म के नाम पर कोई आडम्बर करें करें मगर आज का असली धर्म यही है कि हमारे आस-पास का कोई प्राणी ऎसा नहीं हो जो सर्दी से बचाव नहीं कर सके।
इसलिए हमारा फर्ज है कि मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों पर चलें और उन लोगों के लिए ऊनी वस्तर््, कंबल और रैनबसेरों में रहने की माकूल व्यवस्था करें, इसके साथ ही हमारे क्षेतर्् में रहने वाले सभी प्रकार के जानवरों का भी पूरा-पूरा ख्याल रखें।
खुद सर्दी से हम अपने आप का कितना बचाव क्यों कर लें, भगवान के घर सेवा और परोपकार का वही पुण्य अपने खाते में दर्ज होगा जो जरूरतमंदों के लिए काम आए।
अपने इलाके के जीवों को हम सर्दी से नहीं बचा पाएं तो हमारा जीना व्यर्थ है। इन्हीं दिनों सर्दी का भीषण प्रकोप खासकर बच्चों और बूढ़ों तथा बीमारों और मूक प्राणियों पर जबरदस्त देखा जा रहा है।
जो लोग व्यवस्थाओं से जुड़े हुए हैं और निगुरे संवेदनहीन बने हुए हैं, उन सभी लोगों को लानत है, जिनके रहते हुए आम लोग सर्दी के मारे तर््स्त हैं।
दुनिया में ऎसे नालायक, खुदगर्ज, आसुरी भावों से भरे-पूरे और संवेदनहीन लोगों को जीने का कोई अधिकार नहीं है जो सर्दी के प्रकोप से ठिठुर रहे लोगों को चुपचाप देखते रहने की आदत बना चुके हैं।
इनमें खूब सारे वे बड़े लोग हैं जो उच्चतम गर्मी देने वाले संसाधनों और हीटरों की गर्मी में कुंडली मारकर दुबके रहने के आदि हो गए हैं।
असल में ये ही वे लोग है जो जमाने के लिए नहीं अपने लिए जीने, मुफतिया माल से पेट भरने और हरामखोरी करने के लिए पैदा हुए हैं।

समाज के प्रति अपने फर्ज आज नहीं निभाएंगे तो फिर कोई मौका हाथ नहीं आने वाला। उन लोगों को मदद दें, ऊनी कपड़े, कम्बल, शॉल और सर्दी से बचाव के सभी संसाधन मुहैया कराएं जो लोग इनसे वंचित रहकर दुःख भोग रहे हैं। वास्तव में यही वह कार्य है जिससे भगवान प्रसन्न होता है।

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