आज का आलेख ( 14 जनवरी 2015 के लिए)
आँखें खोलें,
निहारें आसमाँ
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
आज मकर संक्रान्ति है।
लो फिर आ ही गया जागरण और संकल्पों का संदेश लेकर यह मकर संक्रमण।
बहुत हो चुका अब तक इसे मनाने के नाम पर, अब कुछ ऎसा होना चाहिए कि
अबकि बार कुछ नया ही नया हो।
इतिहास रचने वाला हो माधुर्य और आसमान में ऊँची उड़ान भरने के नाम का।
कुछ ऎसा हो कि इस बार की मकर संक्रान्ति पिछली सारी संक्रांतियों से
कुछ अलग करिश्मा दिखाने वाली हो।
हर तरफ माहौल काफी कुछ बदला-बदला सा ही है। परिवेश साफ-सुथरा होने लगा
है और हवाएँ नए जमाने का सुकून पाने की उम्मीद में खुद-बखुद गाने लगी हैं।
उत्तरायण की आहट का शंखनाद क्या हुआ, हर तरफ हवाओं में भीनी-भीनी, मीठी-मीठी
गंध तैर आयी है और लगने लगा है कि अब वाकई उत्तरायण का सूरज झाँकने लगा है।
मकर संक्रांति का यह पर्व मिठास, माधुर्य और उल्लास बांटने के साथ ही
यह भी संदेश दे रहा है कि आसमान को निहारें, रंग-बिरंगी पतंगों का मजा लें, आसमान की
ऊँचाइयों को छूने के लिए जी जान से प्रयास करें और ऎसी प्रतिस्पर्धा के साथ काम करें
कि सभी को आनंद आए, कोई दुःखी या नाराज न होने
पाए।
सूरज से नज़रे चुराने वालों, अंधेरों में रहने के आदी और हमेशरा एयर
कण्डीशण्ड बंद कमरों और गाड़ियों में रहने की तलब पालने वालों से लेकर सभी तरह के इंसानों
के लिए मकर संक्रांति का पर्व सूरज की रोशनी
से सुकून पाने का संदेश दे रहा है।
मकर संक्रांति और सूरज का संबंध सिर्फ उत्तरायण आगमन और सूर्य भगवान
के मकरस्थ होने से ही नहीं जुड़ा है। यह पूरी सृष्टि के लिए है।
जो लोग अंधेरों में जी रहे हैं, लोगों में अंधेरों में रखने के आदी
हो गए हैं या फिर अंधेरों के झण्डाबरदार होकर
अंधेरा कायम रहने का उद्घोष करते हुए आनंदित हो रहे हैं, उन सभी लोगों के लिए यह अवसर
है रोशनी का मार्ग अपनाने का। कम से कम आज के दिन तो सूरज का सीधा सान्निध्य पाने में
काहे की शरम।
कहा भी गया है कि दस वैद्यों के बराबर अग्नि होती है, और दस अग्नियों
के बराबर सूरज। हमारे प्रत्यक्ष और रोज दिखने
वाले देवताओं में या तो पंचतत्व हैं या फिर सूरज और चाँद ही। सूरज की उपासना से बुद्धि, तेज और आँखों की रोशनी
बढ़ती है, चेहरे का लावण्य मुखर होने लगता है और दैहिक, दैविक एवं भौतिक व्याधियों का
शमन होता है।
इतना सब कुछ होने के बावजूद हम लोग सूरज से अपने आपको बचा कर, छिपा
कर चलते हैं, इसमें दोष सूरज का नहीं, हमारा ही है। सूरज तो चाहता है हमारी जिन्दगी
में झाँकना और रौशन करना। हम ही हैं कि किसी न किसी बहाने रोशनी से बचने के आदी हो
गए हैं और कृत्रिम रोशनी में जीना चाहते हैं। हमारे जीवन की तमाम समस्याओं का मूल कारण
अंधेरे में जीने और भटकने की आदत ही है।
इस बार की मकर संक्रांति पर अंधेरों का दामन छोड़कर सूर्य की रश्मियों
में स्नान कर अपने आपको पावन करें और दृढ़ संकल्प के साथ जीवन को रौशन बनाने के लिए
प्रण लें।
यही सब कुछ ही तो कहने आयी है आज की मकर संक्रांति। जीवन भर संक्रमणों
का दौर चलता रहता है लेकिन सूरज की साक्षी में आया संक्रमण का यह दौर अपने आपमें बहुत
कुछ लेकर आया है हमारे लिए, बहुत कुछ कहने आया है हमसे।
अपने आँख-कान के साथ दिमाग और दिल भी खुले रखें और सच्चे मन से संकल्प
ले ही डालें अपने जीवन में रोशनी के आवाहन को।
मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं।
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