Tuesday, 13 January 2015

नाम न लें उनका जो धरा पर भार हैं

आलेख ( 13 जनवरी 2015 के लिए)
नाम न लें उनका
जो धरा पर भार हैं
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

जिस किसी का नाम हम लेते हैं उस तक हमारे विचारों की तरंगे अनचाहे भी जुड़ जाया करती हैं और फिर इसका सीधा सा नुकसान हमें ही उठाना होता है क्योंकि जो लोग समाज और देश के लिए अनुपयोगी और नाकारा होते हैं वे सारे के सारे जमीन पर भार ही हैं।
जो लोग किसी काम के नहीं हैं उन लोगों का नाम कभी नहीं लेना चाहिए। नकारात्मक चिंतन से भरे, शिकायतें करने वाले, औरों को पीड़ा पहुंचाने वाले और षड़यंत्रकारी लोग ऋणात्मक ऊर्जाओं से भरे हुए होते हैं और इन लोगाें का पूरा जीवन ऋणात्मक ही बना रहता है।
ये लोग जहाँ भी रहते हैं वहां का संतुलन बिगाड़ दिया करते हैं और इसका नुकसान उन सज्जनों को भुगतना पड़ता है जो कि सकारात्मक चिंतन और लोक कल्याणकारी दृष्टि से भरे हुए होने के कारण धनात्मक ऊर्जा और दिव्यताओं से परिपूर्ण होते हैं, समाज और देश के लिए जीने-मरने की भावनाएं रखकर कर्मयोग को आकार देते हैं।
समाज, अपने क्षेत्र और देश के लिए नाकारा, विघ्नसंतोषी, बिकाऊ और नालायक लोगों को अपने हाल में जीने दें क्योंकि उनकी मुक्ति इसी में है कि वे जिन गोरखधंधों में रमे हुए हैं वे ही उनकी गति-मुक्ति में निर्णायक भूमिका का निर्वाह करते हैं। और ऎसे में इन लोगों के सुधार या परिमार्जन का कोई सा प्रयास क्यों न किया जाए, निरर्थक ही साबित होता है।
जो लोग न काम के हैं, न काज के, उन लोगों का स्मरण करना भी भगवान का अपमान है क्योेंकि ये लोग मनुष्यता की फ्रेम में स्थान पाने के लायक नहीं होते हैं और इस कारण इन्हें मनुष्य का जिस्म होते हुए भी मानव की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। ये लोग किसी एक जगह दर्शनीय बनाकर शो केस मेें रखने लायक ही होते हैं।
जिन लोगों को जमाना या हम पसंद नहीं करते हैं उन लोगों को अपने मन-मस्तिष्क और विचारों से एकदम बाहर निकाल फेंकना चाहिए और वह भी इस तरह कि दुबारा हमें इनकी याद ही न आए।
इस मामले में हमें जो कुछ करना है वह अंतिम और निर्णायक मानकर ही करना होगा। जो लोग समाज के रचनात्मक कर्मयोग और अच्छे लोगों की निंदा करते हैं, उनके कामों में बाधक बनते हैं तथा किसी न किसी प्रकार से नुकसान पहुँचाने की सोचते हैं, संस्थाओं, घर-परिवार और समुदाय का माहौल बिगाड़ते हैं, उन सभी लोगों को याद करना पूरी तरह छोड़ दें और उन्हें नियति के भरोसे ही छोड़ दें तभी इनके वो सारे संस्कार अच्छी तरह पूरे हो सकते हैं जो अपेक्षित हैं तथा जिसके लिए जमाने भर के लोग भगवान से प्रार्थना करते रहते हैंं।
हमें विरोधी मानने वाले सभी किस्मों के लोगों को इस तरह निकाल फेंकना चाहिए कि फिर उनकी कभी याद तक न आए। ऎसा कर लिए जाने पर हमारे प्रति किए गए अन्याय, शोषण और अनाचार का हिसाब भगवान की ओर से पूरा होने लगता है तथा हमारे चित्त की शांति भी भंग नहीं होती, हमें सिर्फ द्रष्टा भाव से देखना भर होता है। इस द्रष्टा भाव में हमें न इनके हश्र का पाप लगता है न कोई प्रायश्चित करना होता है क्योंकि जो कुछ करता है वह ईश्वर करता है।
ईश्वर इनके कुकर्मों और पापों का दण्ड अपने आप भुगतवाता ही है और वह भी ऎसा कि इन लोगों को जीवन भर याद रहे और मरने के बाद भी जाने कितनी योनियों तक इसका दंश किसी न किसी आकार-प्रकार में भुगते बगैर कोई चारा नहीं होता।

इसलिए उन लोगों को अपने दिमाग और दिल से अंतिम बार पूरी दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ निकाल कर बाहर फेंकियें जो लोग न अपने काम के हैं, न समाज या देश के। ऎसे लोग बेवक्त हमारे जमाने में बेकार पैदा हो गए हैं और उन्हें बेकार ही रहने दीजियें। भूल से भी इनका स्मरण न करें न ऎसा कोई अवसर उपस्थित करें कि इनका स्मरण किया जाए। दुनिया में खूब सारे करोड़ों लोग हैं जिन्हें न हम जानते हैं, न वे हमें जानते हैं। इसी प्रकार रहने का अभ्यास डालने की जरूरत है। हो सके तो इन लोगों के नाम का गरुड़ पुराण वाचन भी करा लीजियें।

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