Sunday, 25 January 2015

कभी न लें श्रेय

आलेख ( 25 जनवरी 2015 के लिए)
कभी न लें श्रेय
-  डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
यश-प्रतिष्ठा और श्रेय सभी लोग लेना चाहते हैं, लेकिन काम करना कोई नहीं चाहता। कुछ बिरले ही ऎसे होंगे जो किसी भी अच्छे कार्य में किसी प्रकार के प्रतिफल या  श्रेय की आकांक्षा नहीं रखते होंगे और श्रेय मिल जाने पर भी इससे स्पष्ट इंकार कर दिया करते हैं।
आजकल हर तरफ प्रचार का व्यामोह जबर्दस्त पसरा हुआ है, हर कोई चाहता है कि उसे बिना कुछ मेहनत किए-कराए लोकप्रियता प्राप्त हो जाए, लोग उसे पूजने लगें और स्वीकारते हुए श्रद्धा के साथ आदर-सम्मान प्रदान करते रहें। और यह आदर-सम्मान अथवा श्रद्धा किसी अवधि तक बंधी नहीं रहे बल्कि मरने तक पूजे जाते रहें और उसके बाद भी लोग याद रखते रहें।
बड़े-बड़े लोगोें में यही कामना होती है जो कि मरने के पहले से लेकर मरने के बाद तक यों ही बरकरार रहती है और खूब सारे लोग इन्हीं प्रकार की इच्छाओं के साथ देह त्याग देते हैं लेकिन भूत-प्रेत के रूप में हमारे इर्द-गिर्द आज भी विद्यमान हैं।
बहुत से ऎसे नाम पिपासु और तस्वीरों के भूखे, चरण स्पर्श करवाते रहने को हर क्षण उतावले रहने वाले लोग, श्रद्धा पाने के मोहताज किसम-किसम के याचक लोग हमारे देखते-देखते स्वर्ग (?) सिधार गए और ऎसे ही ढेरों लोग हमारे आस-पास भी बड़ी भारी संख्या में आज भी पसरे हुए हैं जिन्हें देख-देख कर कभी दया आती है, कभी इनकी हरकतों पर तरस आता है और कभी मूर्खता पर गुस्सा भी।
सभी प्रकार के जीव-जन्तुओं में मनुष्य नाम का एकमात्र कशेरूकी प्राणी ऎसा है जो कि  कशेरूका होते हुए भी अपने स्वार्थ और ऎषणाओं की पूर्ति के लिए इतना अधिक झुक जाता है जितने की अकेशरूकी प्राणी भी नहीं।
इन्हीं इंसानों की भयावह भीड़ में ऎसे लोग भी हैं जो कि श्रेय पाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं भले ही इनका योगदान हो या न हो। अक्सर ऎसे लोग श्रेय लेने के लिए लपकने को तैयार रहा करते हैं जिनकी किसी भी काम की पूर्णता या उपलब्धि में कोई भूमिका नहीं हुआ करती।
ऎसे लोग सभी तरफ गिद्धों की तरह नज़रें गड़ाये बैठे हुए हैं। इन लोगों का जिन्दगी भर का एक सूत्री एजेण्डा यही है कि किस प्रकार ये बिना कुछ किए औरोें के कामों का श्रेय अपने खाते में गिनवा लें अथवा चालाकियों के साथ लूट लें।
इस किस्म के लपकों की संख्या आजकल निरन्तर बढ़ती ही जा रही है।  सब तरफ कामचोर और निकम्मे लोग हैं जो काम कुछ करना नहीं चाहते, लेकिन श्रेय लेने की कला में महारत हासिल है। जो लोग बिना कोई मेहनत किए किसी भी काम का श्रेय पाते हैं उन लोगों के जिन्दगी भर के सारे काम अभिशप्त हो जाते हैं और ऎसे लोगों को अपने मामूली कामों के लिए भी दूसरे लोगों की खुशामद करनी पड़ती है, जाने किस-किस प्रकार के समझौते करने पड़ते हैं और नापाक-नाजायज समीकरण बिठाने को विवश होना पड़ता है।
जो काम एक मनुष्य की क्षमता में होते हैं उन्हें करना मनुष्य का प्राथमिक फर्ज है और ऎसे में अपने फर्ज को भुनाने के लिए श्रेय पाना कोई अच्छी बात नहीं कही जा सकती, यह सामान्य मानवीय कत्र्तव्यों में आता है। इसलिए उन कामों का भी श्रेय नहीं लेना चाहिए जो हमारे द्वारा सामान्य तौर पर किए जाते हैं।
गीता के बोध वाक्य का अनुस्मरण कर हम सभी को कत्र्तव्य मार्ग को अपनाना चाहिए, फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए। इससे कार्य संपादन में ऊर्जा और उत्साह बना रहता है तथा फल के बारे में निश्चिन्तता होने से न उत्साह के अतिरेक का उन्माद जगता है, न परिणाम को लेकर उद्विग्नता।
इससे हर कोई सभी प्रकार से तनाव मुक्त होकर रह सकता है। और इंसान जब तनावों से दूर रहता है तभी स्वस्थ और मस्त रहता है। इंसानों की एक दिव्य धारा भी है जो लोक मंगल और सामुदायिक उत्थान की गतिविधियों में चुपचाप रमे रहते हैं और न पुरस्कार की सोचते हैं, न परिणाम की।  निरन्तर कर्मशील रहना ही इनका स्वभाव हो जाता है और इसी स्वभाव के सहारे ये लोग आनंद के साथ जीवनयात्रा को पूर्ण करते हैं। 
काम कोई सा हो, जब हम उसे अपना मानकर करते हैं तब हमारे ग्रह-नक्षत्र और दूसरे अच्छे-बुरे प्रभाव असर दिखाते हैं लेकिन जब हम उसे ईश्वरीय मानकर करते हैं तब हमारे अपने सारे कर्म ग्रह-नक्षत्रों और नकारात्मक वृत्तियों से बहुत दूर रहा करते हैं और इनका सौ फीसदी श्रेष्ठतम परिणाम सामने आता है वहीं इनका  कीर्तिमय प्रवाह सदियों तक बना रहता है।
जो भी अच्छा कार्य करें उसका श्रेय भगवान को देते रहें, इससे हमारे कोई काम कहीं रुकेंगे नहीं, अपने आप होते चले जाएंगे।  लेकिन जहाँ किसी उपलब्धि या सफलता को हम अपना मानकर श्रेय लेने की कोशिश करते हैं उसी समय से हमारे कर्म सामान्य धरातल पर आ जाते हैं और हमारे काम भी दूसरों के कामों की तरह कभी रेंग कर चलने लगते हैं, कभी अचानक रूक जाया करते हैं और कभी लंबित होते-होते अवधिपार तक हो जाया करते हैं। 
इस स्थिति में जो लोग मानवीय संवेदनाओं, ईश्वरीय दिव्य तत्वों और संवेदनशीलता से भरे हुए हैं उन सभी को चाहिए कि वे अपने पूरे जीवन में किसी भी काम का किंचित भी श्रेय न लें, चाहे कोई सा काम कितना ही छोटा हो या कितना ही बड़ा।
एक बार जब हम यह संकल्प ग्रहण कर लिया करते हैं तब हमारा या हमारे द्वारा हाथ में लिया गया कोई सा काम कभी नहीं रुकता, यह नॉन स्टॉप पूर्णता की ओर बढ़ता ही चला जाता है।  इसमें कहीं किसी भी मोड़ पर कोई रुकावट आ ही नहीं सकती।
जीवन में जब हम पक्की धारणा के साथ इसे सहज स्वीकार कर लिया करते हैं तब हम स्वयं को ईश्वरीय प्रवाह में अनुभव करने लगते हैं और इससे हमें जो दिव्यता, ईश्वरीय विभूतियां प्राप्त होती हैं, जो असीम आत्म संतुष्टि प्राप्त होती है वह अवर्णनीय ही होती है।

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