आज
का आलेख ( 9 जनवरी 2015 के लिए)
प्रेम की गंगा
बहाते चलो ...
- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
कोई सा काम हो, इसे करना हम सबकी मजबूरी
है। हमारा पूरा जीवन कर्म आधारित है जिसमें मानसिक और बौद्धिक परिश्रम हर क्षण जरूरी
है।
जीवन निर्वाह से लेकर अपने कर्मयोग को
पूर्ण करने तथा अपने आपको स्थापित कर विशिष्ट पहचान बनाने के लिए कर्म ही वह एकमात्र
माध्यम है। यह कर्म अपने आपमें विराट चिंतन और व्यापक धाराओं का प्रतीक है।
हर व्यक्ति के लिए अपना-अपना कर्मयोग
निर्धारित है। कुछ लोग मन से कर्मयोग को अपनाते हैं, कुछ के लिए यह मजबूरी बन जाता
है जबकि खूब सारे लोगों के लिए न मजबूरी है न आस्था बल्कि इन लोगों का पूरा जीवन इसी
में गुजर जाता है कि आखिर काम है तो करना ही पड़ेगा।
कर्म का संपादन एक अनिवार्यता है । इसे
प्रसन्नता से करें या दुःख से। करना हमें ही है। मनुष्य के लिए कोई सा कर्म असंभव नहीं
है बल्कि हर कर्म वह बड़ी ही कुशलता से कर सकता है।
कर्म के संपादन से लेकर सफलता तक की यात्रा
में कई सारे कारक महत्वपूर्ण हैं। कार्य, कर्ता और माहौल का इस पर खूब प्रभाव पड़ता
है। जहां माहौल ठीक होता है, काम करने वाले सहकर्मियों में आपसी प्रेम, सद्भाव और आत्मीयता
के भाव प्रगाढ़ होते हैं वहाँ कार्य सहज और सरल हो जाता है तथा कार्य का परिणाम भी आशातीत
प्राप्त होता है।
इसके साथ ही कार्य और कार्यस्थलों की
सुगंध ही अपने आप में इतनी मस्त कर देने वाली होती है कि हर कोई इसे देख कर प्रसन्न
ही होता है। आजकल कार्यस्थलों पर आत्मीय और पारिवारिक माहौल खत्म होता जा रहा है, ये
अखाड़े के मैदानों की तरह लगने लगे हैं और खूब सारे लोग ऎसे ही हो गए हैं जो कि हमेशा
अखाड़चियों और धुरंधर पहलवानों या मजबूत लठैतों की ही तरह पेश आते हैं।
कई बाड़ोें और गलियारों में अहं और अस्तित्व
की लड़ाई ने पूरे माहौल का कबाड़ा कर रखा है जबकि कई क्षेत्र ऎसे हैं जहाँ आपसी वैरभाव
और एक दूसरे को नीचा दिखाने, गिराने और अधमरा कर देने की मनोवृत्ति जबर्दस्त तरीके
से हावी है।
जहाँ हर कोई प्रसन्नता के साथ काम करने
को स्वतंत्र होता है वहाँ सुकूनदायी माहौल तो रहता ही है, वहां के कार्य की गुणवत्ता
भी बेहतर होती है। कर्मयोग की सफलता का मूलाधार
कार्मिकों का पारस्परिक प्रेम, सद्भावना और सामूहिक विकास होने पर कार्यस्थल को भी
गौरव प्राप्त होता है और प्रत्येक प्रकार के कर्म को भी।
लेकिन आजकल हो इसका उलटा रहा है। काम
को बिगाड़ने और संबंधों में खटास पैदा कर दूरियां बढ़ाने वाले लोग खूब ज्यादा हैं और
इतने ज्यादा हैं कि वे अपने आपको भी संभाल पाने की स्थिति में अब नहीं हैं।
इनमें खूब सारे लोगों में दूसरों का नुकसान
करने की तलब हावी है और खूब सारे ऎसे हैं जिन्हें लगता है कि वे ही हर जगह हावी रहें
और सारे लोग उनकी सत्ता को स्वीकारें भले ही वे रंगे सियार की तरह ही क्यों न हों।
आजकल यों भी इंसान के भीतर सामर््राज्यवादी मानसिकता के लिए हिंसक वृत्तियाँ हावी होती
जा रही है।
पहले जहां सामाजिक प्राणी समाज और क्षेत्र
के लिए जीता था वहीं अब आदमी असामाजिक होकर आत्मकेन्दि्रत होता जा रहा है। उसके लिए
समाज और क्षेत्र का कोई मूल्य नहीं है बल्कि वह यही चाहता है कि जो कुछ हो वह उसी की
झोली में गिरता रहे।
काम में आए न आए, यह बात दूसरी है। इन
तमाम स्थितियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि पारस्परि प्रेम, आत्मीय भाव और सहकारिता
के साथ सामूहिक विकास की मनोवृत्ति के होने पर ही वैयक्तिक और सामुदायिक आनंद को पाया
जा सकता है जिसकी की आज सर्वाधिक आवश्यकता है।
प्रेमपूर्ण माहौल में कार्य का संपादन
अत्यन्त हल्के-फुल्के माहौल में होता है और सरल तथा सहज प्रवाह बना रहता है जो सभी
को आनंद देता है और काम करने के साथ जीने का अदभुत सुकून भी। आज इसी आनंद की आवश्यकता
है।
जो लोग दुःखी होकर काम करते हैं, औरों
को दुःख देते हैं उन लोगों का पूरा जीवन ही विषादमय हो जाता है, दुःखों और पीड़ाओं का
साया मरते दम तक उन्हें घेरे रहता है। इसके विपरीत प्रेम और आनंद बाँटने वाले लोग खुद
भी आनंदित रहते हैं तथा इनकी मौजूदगी मात्र ही सभी लोगों के लिए आनंद का संचार करने
वाली होती है।
खूब सारे लोग ऎसे होते हैं जिन्हें लोग
दिल से चाहते हैं और सम्मान करते हैं तथा हमेशा इसी कोशिश में रहते हैं कि ऎसे लोगों
का अधिक से अधिक सान्निध्य पाया जाए। माधुर्य संचरित करने वाले ऎसे लोगों को कोई छोड़ना
भी नहीं चाहता।
इसका कारण यही है कि इन लोगों का चित्त
प्रेम, माधुर्य और आनंद से भरा हुआ होता है और इनके माध्यम से इन सुकूनदायी रसों की
सरणियां हमेशा माहौल में बनी रहती हैं। प्रेम और सद्भाव हमेशा अपरिमित ऊर्जा प्रदान
करता है और संसार के प्रत्येक कर्म में श्रेष्ठतम उत्प्रेरक की भूमिका अदा करता है।
इसलिए जहाँ रहें वहाँ प्रेमतत्व से परिपूर्ण
रहें, माधुर्य का संचार करें और आनंद की धाराएं बहाते रहें, यही कर्मयोग, जीवन और लोक
व्यवहार में आशातीत सफलता पाने का महानतम सूत्र है। जो लोग इस परम सत्य को जान लेते
हैं उनका जीवन धन्य हो उठता है।
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